परिसीमन
प्रस्तावित परिसीमन के बाद देश में लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़कर 816 हो जाएंगी। इसका फॉर्मूला सरल है, जिस राज्य के पास अभी जितनी सीटें हैं उसमें 50 प्रतिशत की वृद्धि कर दी जाएगी। उत्तर प्रदेश की 80 सीटें 120 होंगी और तमिलनाडु की 39 सीटें 59 हो जाएंगी।
जनसंख्या अनुपात से परे है मौजूदा सीट वितरण
असली समस्या यह है कि सीटों का बंटवारा कभी जनसंख्या के सही अनुपात पर नहीं हुआ। राजस्थान की आबादी 6.85 करोड़ है जबकि तमिलनाडु की 7.76 करोड़। बावजूद इसके राजस्थान को केवल 25 सीटें मिली हैं और तमिलनाडु को 39। जनसंख्या के अनुपात में राजस्थान को अभी भी 35 सीटें मिलनी चाहिए थीं।
परिसीमन के बाद यह खाई और चौड़ी होगी। तमिलनाडु को 59 सीटें मिलेंगी जबकि राजस्थान केवल 38 पर सिमट जाएगा, जबकि जनसंख्या के हिसाब से उसे 52 सीटें मिलनी चाहिए। यह आधा अधूरा परिसीमन महज तुष्टिकरण की राजनीति का नतीजा है।
1971 से जमी हुई व्यवस्था, 2026 तक का विस्तार
मौजूदा सीटें 1971 की जनगणना के आधार पर तय हुई थीं। 1976 में इंदिरा सरकार ने इन सीटों को फ्रीज कर दिया। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 2001 में इस रोक को 2026 तक के लिए और बढ़ा दिया।
दक्षिण के तर्क को सामान्य वर्ग पर क्यों नहीं लागू किया गया
इस फ्रीजिंग के पीछे तर्क दिया जाता है कि दक्षिण भारत ने जनसंख्या नियंत्रण नीति को गंभीरता से अपनाया, इसलिए उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व घटना उचित नहीं। लेकिन यही तर्क देश के सामान्य वर्ग पर लागू क्यों नहीं होता। इंदिरा गांधी की थोपी हुई जनसंख्या नियंत्रण नीति को सबसे ईमानदारी से सामान्य वर्ग ने ही अपनाया।
सामान्य वर्ग ने हम दो हमारे दो की नीति को अपनाकर अपनी जनसंख्या घटाई। दूसरी ओर मजहबी समुदायों ने इस नीति की परवाह किए बिना अपनी संख्या बढ़ाई। अब जब परिसीमन की बात आती है तो सिद्धांत बदल दिया जाता है और कहा जाता है कि जिसकी जितनी संख्या उसकी उतनी हिस्सेदारी।
सामान्य वर्ग के जनसांख्यिकीय क्षरण की 50 वर्षीय योजना
यह विरोधाभास महज नीतिगत चूक नहीं बल्कि एक सुनियोजित प्रक्रिया का हिस्सा लगता है। इंदिरा गांधी ने 1971 की जनगणना को राज्यवार फ्रीज किया पर वर्गों के स्तर पर फ्रीजिंग कभी लागू नहीं की गई। सामान्य वर्ग को जनसंख्या नियंत्रण में झोंककर उसकी संख्या घटाई गई और अब उसी का नुकसान उसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व में भुगतना पड़ रहा है।
हर वोट बराबर नहीं रहा तो लोकतंत्र का अर्थ क्या
उत्तर भारत के राज्यों में जनसंख्या के अनुपात में सीटें न बढ़ाना वहां के मतदाताओं के साथ सीधा अन्याय है। दक्षिण भारत का एक वोट अधिक भार रखता है जबकि राजस्थान जैसे राज्यों के मतदाताओं का वोट कमजोर पड़ जाता है। जब वोट का मूल्य ही बराबर नहीं तो लोकतांत्रिक समानता का दावा खोखला है।
यह राज्यों के नागरिकों के मताधिकार में असमानता का मामला है। जो नागरिक संख्या में कम सीटों का प्रतिनिधित्व करते हैं उनकी राजनीतिक आवाज स्वाभाविक रूप से कमजोर हो जाती है। यह संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है।
धर्म की रक्षा करने वाले उत्तर को ही दंड
उत्तर भारत की तथाकथित काऊ बेल्ट हर धार्मिक आंदोलन में सबसे आगे रही है और केंद्र में तीन बार हिंदुत्व की सरकार बनवाने में निर्णायक भूमिका निभाई है। दूसरी ओर दक्षिण के अधिकांश राज्य कम्युनिस्ट, मिशनरी और खाड़ी देशों के प्रभाव में रहे। हिंदुत्व की राजनीति को दक्षिण में कभी वह समर्थन नहीं मिला जो उत्तर ने दिया।
फिर भी परिसीमन में उत्तर भारत के राज्यों को घाटे का सौदा थमाया जा रहा है। जिन राज्यों ने वैचारिक और चुनावी समर्थन दिया उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कटौती का सामना करना पड़ रहा है।
उत्तर के राज्य असली मुद्दे से क्यों मुंह फेरे हैं
इस अन्याय की नींव कांग्रेस ने रखी थी, लेकिन भाजपा की यथास्थितिवाद की प्रवृत्ति और सुधार से बचने की आदत ने इसे जारी रखा। उत्तर के राज्यों को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, पर वे जाति और वर्ग के उलझनों में फंसे हुए हैं।
नारी शक्ति वंदन जैसी योजनाएं भी स्वाभाविक राजनीति को खत्म करने के औजार बन सकती हैं। इनकी आड़ में ऐसा परिसीमन लाया जा सकता है जो उत्तर भारत के मतदाताओं की राजनीतिक ताकत को स्थायी रूप से कमजोर कर दे।

