राजेश खन्ना बायोग्राफी: 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरुआत में भारतीय फिल्म उद्योग में एक ऐसा दौर आया जिसने स्टारडम की परिभाषा ही बदल दी।
सिनेमाघर केवल फिल्म देखने की जगह नहीं रह गए थे, बल्कि वे किसी उत्सव या मेले की तरह लगने लगे थे।
जब उनकी कोई फिल्म रिलीज होती थी, तो सिनेमाघरों के बाहर हजारों लोग घंटों तक कतार में खड़े रहते थे। टिकटें कई हफ्ते पहले ही बिक जाती थीं।
प्रशंसकों की दीवानगी इतनी ज्यादा थी कि युवतियाँ उन्हें अपने खून से लिखे प्रेम पत्र भेजती थीं। कुछ ने तो उनकी तस्वीरों से शादी करने तक की बातें कही थीं।
कई बार जब...
सदानंदन मास्टर के कटे पैरों और वी.एस. अच्युतानंदन को पद्म विभूषण की राजनीति: रक्तरंजित बलिदानों का अपमान और सत्ता का 'मास्टरस्ट्रोक'
लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर...
सिलीगुड़ी कॉरिडोर: सिलीगुड़ी के पास स्थित चिकन नेक यानी सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत के लिए केवल एक भौगोलिक हिस्सा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक जीवनरेखा है।
लगभग...