Sunday, March 8, 2026

पश्चिम एशिया में युद्ध का असर, शेयर बाजार में तेज बिकवाली, सोने चांदी ने लगाई छलांग

बाजार

मार्च 2006 की शुरुआत भारतीय शेयर बाजार के लिए झटके वाली रही। पश्चिम एशिया में अमेरिका इजरायल और ईरान के बीच युद्ध और टकराव बढ़ने की खबरों ने निवेशकों का भरोसा डगमगाया। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की चर्चा से घबराहट और बढ़ी।

खुलते ही सेंसेक्स निफ्टी फिसले, प्री ओपनिंग में भारी गिरावट

दलाल स्ट्रीट पर असर तुरंत दिखा। कारोबार शुरू होते ही सेंसेक्स और निफ्टी में 3 फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज हुई।

प्री ओपनिंग सत्र में सेंसेक्स करीब 4000 अंक तक टूट गया, जबकि निफ्टी लगभग 900 अंक तक नीचे चला गया।

एनर्जी सेक्टर पर सबसे ज्यादा दबाव

इस गिरावट में सबसे ज्यादा दबाव एनर्जी सेक्टर के शेयरों पर देखा गया। निवेशकों ने जोखिम वाले सौदों से दूरी बनाते हुए बिकवाली बढ़ाई, जिससे बाजार की कमजोरी और गहरी हुई। युद्ध से जुड़ी अनिश्चितता के बीच संस्थागत और रिटेल दोनों तरफ सतर्कता दिखी।

एशियाई संकेत कमजोर, निक्केई टॉपिक्स गिरे, हैंग सेंग फ्यूचर्स सुस्त

वैश्विक बाजारों से भी सहारा नहीं मिला। जापान का निक्केई 225 और टॉपिक्स करीब 2 फीसदी गिर गए।

उधर हैंग सेंग फ्यूचर्स ने भी कमजोर शुरुआत का संकेत दिया, जिससे एशिया भर में जोखिम भावना दबाव में नजर आई।

कच्चे तेल में उछाल, ब्रेंट क्रूड 78 डॉलर के पार

भूराजनीतिक तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज हुआ। ब्रेंट क्रूड 78 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच गया। तेल आपूर्ति पर आशंकाओं ने बाजार की चिंता बढ़ाई, खासकर उन देशों के लिए जो आयात पर निर्भर हैं।

होर्मुज की सप्लाई चिंता, महंगाई का दबाव और सोना चांदी में तेजी

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सप्लाई रुकने की आशंका ने चिंता को और गहरा किया, जिससे भारत में महंगाई दबाव बढ़ने की संभावना जताई गई। निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर बढ़े और इसी माहौल में सोना और चांदी की कीमतों में तेजी देखी गई।

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Samudra
Samudra
लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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