अयोध्या
अयोध्या के नव निर्मित राम मंदिर में भगवान राम का पवित्र और दिव्य धनुष कोदंड अब स्थापित हो गया है। 286 किलोग्राम वजनी यह धनुष सनातन परंपरा, भक्ति, इतिहास और राष्ट्रीय गौरव के संगम का प्रतीक माना जा रहा है।
पंचधातु से बना आठ फीट लंबा भव्य धनुष
यह कोदंड पंचधातु से बनाया गया है, जिसमें सोना, चांदी, तांबा, जस्ता और लोहा शामिल हैं। धनुष की लंबाई आठ फीट और चौड़ाई ढाई फीट है। इसकी अनुमानित लागत करीब 1.25 करोड़ रुपए बताई गई है।
कांचीपुरम की 48 महिला कारीगरों ने किया निर्माण
तमिलनाडु के कांचीपुरम की 48 महिला कारीगरों ने इस भव्य कोदंड को अत्यंत सूक्ष्मता और श्रद्धा के साथ तैयार किया। इस उत्कृष्ट कृति को वास्तविक रूप देने में लगभग आठ महीने का समय लगा, जिससे इसका शिल्प और भी विशेष बन गया।
सैन्य पराक्रम की झलकियों से सजा कोदंड
इस धनुष पर देश के सैन्य पराक्रम से जुड़े दृश्य बेहद बारीकी से उकेरे गए हैं। इसमें कारगिल युद्ध से जुड़े चित्र भी शामिल हैं, जो भारतीय सशस्त्र बलों के साहस, बलिदान और राष्ट्र गौरव की भावना को दर्शाते हैं।
राउरकेला से शुरू हुई भव्य शोभा यात्रा
कोदंड को अयोध्या तक भव्य शोभा यात्रा के माध्यम से लाया गया। यह शोभा यात्रा सनातन जागरण मंच और विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित की गई थी। यात्रा इस वर्ष 3 जनवरी को ओडिशा के राउरकेला से प्रारंभ हुई।
ओडिशा के 30 जिलों से होकर गुजरा धनुष
राउरकेला से निकली यह शोभा यात्रा ओडिशा के सभी 30 जिलों से होकर गुजरी। यात्रा के दौरान अलग अलग स्थानों पर श्रद्धालुओं ने कोदंड के दर्शन किए। इस पूरी यात्रा ने धार्मिक श्रद्धा और सांस्कृतिक एकता का व्यापक संदेश दिया।
पुरी के जगन्नाथ मंदिर में हुआ दर्शन
शोभा यात्रा 19 जनवरी को ओडिशा के ऐतिहासिक जगन्नाथ मंदिर, पुरी पहुंची। वहां कोदंड को दर्शन के लिए रखा गया। जगन्नाथ धाम में दर्शन के बाद यह पवित्र धनुष अयोध्या की ओर आगे बढ़ा और यात्रा जारी रही।
22 जनवरी को अयोध्या पहुंचा कोदंड
पुरी से आगे की यात्रा पूरी करने के बाद कोदंड 22 जनवरी को अयोध्या पहुंचा। राम मंदिर में इसके आगमन को सनातन आस्था, भक्ति और ऐतिहासिक स्मृति से जुड़े महत्वपूर्ण क्षण के रूप में देखा गया।
हजारों श्रद्धालुओं ने किए दर्शन
अयोध्या पहुंचने से पहले रास्ते में हजारों लोगों ने कोदंड के दर्शन किए। श्रद्धालुओं के लिए यह केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं रहा, बल्कि भगवान राम की मर्यादा, सनातन संस्कृति और सामूहिक आस्था का जीवंत स्वरूप बन गया।
संस्कृति और आस्था का बड़ा प्रतीक
विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोगों ने इसे सनातन संस्कृति और श्रद्धा का उदाहरण बताया है। इससे पहले 233 वर्ष पुरानी संस्कृत वाल्मीकि रामायण की पांडुलिपि भी रामलला को अर्पित की गई थी, जिसे अयोध्या के राम कथा कुंज में रखा गया।

