Thursday, April 30, 2026

कुपवाड़ा: 1990 में मजहबियों ने तोड़ा था मंदिर, अब वहां भूमिपूजन

कुपवाड़ा में कश्मीरी पंडितों को मिली पुश्तैनी जमीन

जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में स्थित लोलाब क्षेत्र के चांदिगाम में कश्मीरी पंडितों ने अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक अहम हिस्सा वापस हासिल किया है।

यह वही स्थल है जहां दशकों पहले मंदिर और आश्रम हुआ करता था। भाजपा जम्मू कश्मीर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इसकी जानकारी साझा की।

विस्थापन के बाद मिली वापसी

1990 के दशक में मजहबी आतंकवाद और असुरक्षा के माहौल में कश्मीरी पंडित परिवारों को घाटी छोड़नी पड़ी थी।

दशकों तक अपने पुश्तैनी स्थलों से दूर रहने के बाद यह वापसी उनके लिए केवल जमीन की प्राप्ति नहीं बल्कि आस्था और पहचान से पुनः जुड़ने का प्रतीक बन गई है।

यह घटनाक्रम उन परिवारों के लिए गहरा भावनात्मक महत्व रखता है जिन्हें जबरन विस्थापित होना पड़ा था।

इस्लामी कट्टरपंथियों ने किया था मंदिर पर हमला

कश्मीरी हिन्दू नामक फेसबुक पेज पर दी गई जानकारी के अनुसार 1990 में इस्लामी कट्टरपंथियों ने इस मंदिर और आश्रम पर कब्जा कर लिया था। उन्होंने इस धार्मिक स्थल को लूटा, आग लगाई और पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था।

अब उसी पवित्र जमीन पर भूमि पूजन संपन्न हुआ है और शीघ्र ही यहां भव्य मंदिर और आश्रम का निर्माण किया जाएगा।

स्थानीय स्तर पर उत्साह का माहौल

स्थानीय स्तर पर इस पहल को लेकर काफी उत्साह देखा जा रहा है। इसे सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक पुनर्स्थापन की दिशा में सकारात्मक कदम माना जा रहा है।

केंद्र सरकार के प्रयासों से विस्थापित समुदायों के पुनर्वास और उनके अधिकारों की बहाली की उम्मीदें मजबूत हुई हैं। यह पहल धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की बहाली का प्रतीक बन गई है।

स्थायी पुनर्वास के लिए जरूरी कदम

इस तरह की पहलों को स्थायी और व्यापक बनाने के लिए सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना होगा। रोजगार के अवसर और बुनियादी सुविधाओं का प्रबंध भी समान रूप से आवश्यक है।

इन व्यवस्थाओं के बिना लौटने वाले परिवार स्थायी रूप से नहीं बस पाएंगे और सामान्य जीवन जीने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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