Wednesday, April 29, 2026

Indo-Bangladesh border fencing: कोलकाता HC ने TMC को लगाई फटकार

Indo-Bangladesh border fencing: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान कई स्थानीय और सांस्कृतिक मुद्दों जैसे एसआईआर, मछली, झालमुड़ी, बांग्ला बनाम बाहरी और महिला आरक्षण की चर्चा के बीच सीमा सुरक्षा और घुसपैठ का मुद्दा प्रमुखता से उभरकर सामने आया।

भाजपा के शीर्ष नेताओं ने चुनावी रैलियों में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए, जिससे यह विषय राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया।

भाजपा के आरोप, घुसपैठ और बाड़बंदी में देरी

प्रधानमंत्री Narendra Modi और गृहमंत्री Amit Shah समेत भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि राज्य की Trinamool Congress सरकार घुसपैठियों को संरक्षण दे रही है।

उनका कहना है कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी का काम राज्य सरकार की ओर से जमीन उपलब्ध न कराने के कारण अटका हुआ है।

केंद्र के अनुसार, पश्चिम बंगाल में करीब 70–80 किलोमीटर क्षेत्र ऐसा है जहां जमीन न मिलने से फेंसिंग का काम लंबित है, जबकि नदी और दलदली इलाके अलग चुनौती बने हुए हैं।

टीएमसी का पलटवार

Indo-Bangladesh border fencing: इन आरोपों के जवाब में मुख्यमंत्री Mamata Banerjee और उनकी पार्टी ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय सीमा की सुरक्षा पूरी तरह केंद्र सरकार और सीमा सुरक्षा बल की जिम्मेदारी है।

उनका तर्क है कि अगर घुसपैठ हो रही है तो इसकी जवाबदेही दिल्ली की सरकार पर आती है, न कि राज्य प्रशासन पर।

बाड़बंदी में भौगोलिक और सामाजिक चुनौतियां

भारत-बांग्लादेश सीमा की कुल लंबाई लगभग 4,096 किलोमीटर है, जिसमें से 2,216 किलोमीटर हिस्सा अकेले पश्चिम बंगाल में आता है।

इस सीमा का लगभग 26% हिस्सा अब भी बिना बाड़ के है। कई क्षेत्रों में नदियां, दलदली जमीन और घनी आबादी बाड़बंदी में बड़ी बाधा बनती हैं।

अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार सीमा के बिल्कुल नजदीक बसे गांवों के कारण फेंसिंग करना और भी जटिल हो जाता है। इसके अलावा, स्थानीय लोगों के विरोध और भूमि अधिग्रहण में देरी भी इस प्रक्रिया को धीमा करती है।

हाई कोर्ट की सख्ती

Calcutta High Court ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार पर कड़ी नाराजगी जताई है।

अदालत की डिवीजन बेंच मुख्य न्यायाधीश Sujoy Paul और न्यायमूर्ति Partha Sarathi Sen ने पाया कि आदेश के बावजूद बाड़बंदी के लिए जमीन सौंपने में कोई खास प्रगति नहीं हुई।

कोर्ट ने राज्य के एक अधिकारी पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाते हुए 15 दिन के भीतर राशि जमा करने का निर्देश दिया।

अधूरी रिपोर्ट और धीमी प्रगति पर जताई नाराजगी

अदालत ने यह भी कहा कि 127 किलोमीटर से अधिक भूमि का अधिग्रहण और मुआवजा प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद केवल 8 किलोमीटर जमीन ही सीमा सुरक्षा बल को सौंपी गई है।

राज्य सरकार की ओर से पेश रिपोर्ट को अदालत ने अधूरी और गोलमोल बताते हुए खारिज कर दिया, क्योंकि वह शपथ पत्र पर दाखिल नहीं की गई थी। अदालत ने इस लापरवाही को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला माना।

राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंता

जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि सीमा पर कंटीले तार लगाना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा से जुड़ा अहम कदम है।

इससे घुसपैठ, तस्करी, नकली मुद्रा और सीमा पार आतंकवाद जैसी गतिविधियों पर रोक लगाने में मदद मिलती है।

केंद्र सरकार ने भी अदालत से आग्रह किया है कि राज्य को जल्द से जल्द जमीन सौंपने का निर्देश दिया जाए, ताकि फेंसिंग का कार्य पूरा हो सके।

अगली सुनवाई और सख्त निर्देश

Indo-Bangladesh border fencing: हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह तय समय सीमा के भीतर विस्तृत शपथ पत्र दाखिल करे, जिसमें जिलेवार जानकारी दी जाए कि जमीन सौंपने के लिए क्या कदम उठाए गए।

अदालत ने साफ चेतावनी दी है कि अब और देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और इस मुद्दे पर सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।

पश्चिम बंगाल में सीमा सुरक्षा का मुद्दा केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रशासनिक समन्वय और स्थानीय चुनौतियों का जटिल मिश्रण है।

केंद्र और राज्य के बीच जिम्मेदारी को लेकर जारी खींचतान के बीच सबसे जरूरी है कि बाड़बंदी का कार्य समय पर पूरा हो, ताकि घुसपैठ और अवैध गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सके।

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