Saturday, August 8, 2026

Lenskart की भारतीयता पर उठे गंभीर सवाल, क्यों हिन्दू विरोधी है Lenskart ?

Lenskart

Lenskart पर उठे विवाद ने केवल एक कंपनी की ग्रूमिंग नीति को मुद्दा नहीं बनाया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या विदेशी पूंजी से नियंत्रित भारतीय यूनिकॉर्न सचमुच भारतीय सभ्यता, प्रतीकों और धार्मिक पहचान का सम्मान कर सकते हैं।

कंपनी की आलोचना इसलिए नहीं हो रही कि वह किसी समुदाय से खुले तौर पर नफरत करती है। आरोप इससे गहरा है। सवाल यह है कि विदेशी निवेश, ESG मानकों और पश्चिमी DEI ढांचे में बंधी कंपनियां भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों को स्वतंत्रता से स्वीकार ही नहीं कर पातीं।

Made in India के दावे पर सवाल

Peyush Bansal ने कहा था कि उन्हें गर्व है कि Lenskart भारत में बना है और भारतीयों के लिए है। सुनने में यह पंक्ति आकर्षक लगती है, लेकिन कंपनी की संरचना, पूंजी और आपूर्ति व्यवस्था को देखने पर यह दावा गंभीर जांच के घेरे में आ जाता है।

Lenskart का भारत वाला प्लांट वर्ष 2023 में खुला। उससे पहले कंपनी का चीन के साथ जॉइंट वेंचर था और वह व्यवस्था आज भी जारी है। फ्रेम, कच्चा माल और सप्लाई चेन का बड़ा हिस्सा चीन से जुड़ा हुआ बताया जाता है।

भारत में मौजूद फैक्ट्री को लेकर यह आरोप है कि वहां बड़े पैमाने पर निर्माण नहीं, बल्कि अधिकतर असेंबलिंग होती है। ऐसे में Made in India और भारतीयों के लिए बने ब्रांड का दावा केवल मार्केटिंग भाषा बनकर रह जाता है।

कंपनी पर संस्थापकों की सीमित हिस्सेदारी

Lenskart के स्वामित्व ढांचे को देखने पर भारतीय नियंत्रण को लेकर और गंभीर प्रश्न उठते हैं। Peyush Bansal की हिस्सेदारी 10.28 प्रतिशत, Neha Bansal की 7.74 प्रतिशत, Amit Chaudhary की 0.98 प्रतिशत और Sumeet Kapahi की 0.96 प्रतिशत बताई जाती है।

चारों संस्थापकों की कुल हिस्सेदारी लगभग बीस प्रतिशत बैठती है। इसका अर्थ है कि शेष बड़ा हिस्सा विदेशी निवेशकों और वैश्विक पूंजी संस्थानों के प्रभाव में है। यही वह बिंदु है जहां कंपनी की भारतीयता का दावा कमजोर दिखने लगता है।

SoftBank जापान से आता है। Temasek सिंगापुर से जुड़ा है। ADIA अबू धाबी का निवेशक है। KKR न्यूयॉर्क से आता है और Fidelity बोस्टन से जुड़ा है। इस पूंजी संरचना में भारतीय ग्राहक से अधिक विदेशी निवेशक निर्णायक दिखते हैं।

ESG और DEI की असली भूमिका

विदेशी निवेशक सामान्य निवेश से पहले ESG नियमों का पालन देखते हैं। ESG का अर्थ Environmental, Social और Governance है। इसे पर्यावरण, सामाजिक और शासन से जुड़ा स्कोरिंग सिस्टम बताया जाता है, लेकिन व्यवहार में यह पश्चिमी वैचारिक ढांचे से संचालित होता है।

ESG को न्यूयॉर्क और एम्स्टर्डम जैसे वैश्विक वित्तीय केंद्रों में विकसित किया गया। निवेश किसे मिलेगा और किस कंपनी को स्वीकार्य माना जाएगा, यह तय करने में ऐसे मानक बड़ी भूमिका निभाते हैं। भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ इसमें प्राथमिक आधार नहीं होता।

ESG के भीतर DEI नाम की व्यवस्था छिपी रहती है। DEI का अर्थ Diversity, Equity और Inclusion है। इसका निर्माण अमेरिकी समाज की ऐतिहासिक समस्याओं, अश्वेत अल्पसंख्यकों के संघर्ष, लैंगिक भेदभाव और LGBTQ अधिकारों की पृष्ठभूमि में हुआ।

यह ढांचा भारत के लिए बनाया ही नहीं गया था। भारत की सभ्यता, धार्मिक विविधता, बहुसंख्यक परंपराओं और सामाजिक संरचना को समझे बिना वही पश्चिमी मॉडल भारतीय कंपनियों पर लागू किया जाता है। यहीं से सांस्कृतिक टकराव शुरू होता है।

बिंदी और तिलक को जोखिम मानने वाली सोच

DEI के पश्चिमी ढांचे में कार्यस्थल पर हिजाब को विविधता और समावेश का सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। इसी प्रकार पगड़ी को भी धार्मिक पहचान के रूप में स्वीकार्यता मिलती है। यह सब अल्पसंख्यक पहचान की सुरक्षा के दायरे में रखा जाता है।

समस्या तब खड़ी होती है जब वही ढांचा बिंदी, तिलक, कलावा और कड़े जैसे हिंदू प्रतीकों को बहुसंख्यक धर्म की निशानी मानकर देखता है। पश्चिमी DEI में बहुसंख्यक पहचान को सुरक्षा की आवश्यकता वाला पक्ष नहीं माना जाता।

पश्चिमी विमर्श में बहुसंख्यक वर्ग को अक्सर उत्पीड़क और अल्पसंख्यक वर्ग को संरक्षित श्रेणी माना जाता है। भारत जैसे देश में यह सीधी नकल खतरनाक हो जाती है, क्योंकि यहां बहुसंख्यक पहचान भी सभ्यतागत दमन और उपेक्षा का लंबा अनुभव रखती है।

ग्रूमिंग पॉलिसी किसके लिए बनती है

जब Lenskart जैसी कंपनी HR ग्रूमिंग पॉलिसी बनाती है तो सवाल उठता है कि वह नीति भारतीय कर्मचारी और भारतीय सांस्कृतिक भावनाओं के लिए बनती है या विदेशी निवेशकों, ESG एजेंसियों और वैश्विक पूंजी के दबाव को संतुष्ट करने के लिए।

कंपनी दस बिलियन डॉलर के IPO की दौड़ में है। ऐसे समय में उसकी प्राथमिकता ग्राहक की बिंदी, कलावा या कड़ा नहीं, बल्कि विदेशी निवेशक, बाजार मूल्यांकन, नियामकीय मंजूरी और वैश्विक वित्तीय छवि बन जाती है।

भारतीय ग्राहक एक चश्मा खरीदता है, लेकिन विदेशी निवेशक सैकड़ों मिलियन डॉलर लगाते हैं। जब आर्थिक शक्ति का यह अंतर सामने आता है तो यह समझना कठिन नहीं रह जाता कि कंपनी किसकी बात अधिक ध्यान से सुनती है।

ग्राहक नहीं, निवेशक बनते हैं पहली प्राथमिकता

Lenskart का पहला ग्राहक भारतीय उपभोक्ता नहीं दिखता। उसकी पहली प्राथमिकता SoftBank, ADIA, Temasek, KKR, Fidelity और एम्स्टर्डम की ESG एजेंसियां बन जाती हैं। यही एजेंसियां तय करती हैं कि कंपनी वैश्विक निवेश के योग्य है या नहीं।

भारतीय उपभोक्ता भावनात्मक रूप से ब्रांड को अपना मानता है, लेकिन नीति दस्तावेज, HR फ्रेमवर्क और पूंजी संरचना कुछ और कहानी बताते हैं। वहां भारतीयता विज्ञापन में दिखती है, निर्णय प्रक्रिया में नहीं। यही इस विवाद का मूल बिंदु है।

सरकार और नियामकों पर भी सवाल

यह मानना कठिन है कि सरकार को इन प्रवृत्तियों की जानकारी नहीं है। मंत्रालयों और नियामक संस्थाओं को यह समझना चाहिए कि विदेशी पूंजी किस प्रकार धीरे धीरे सभ्यतागत पहचान को कॉर्पोरेट नीतियों से बाहर करती जाती है।

SEBI ने DRHP को मंजूरी दे दी, लेकिन हिंदू पहचान, धार्मिक प्रतीकों और भारतीय सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की रक्षा के लिए कोई स्पष्ट नियम दिखाई नहीं देता। IPO, टैक्स, GST और आर्थिक सुर्खियां इस पूरे समीकरण में अधिक महत्वपूर्ण बन जाती हैं।

सरकार भी बड़े IPO, निवेश, बाजार विस्तार और वैश्विक आर्थिक छवि चाहती है। ऐसे ढांचे में कर्मचारी का कलावा, कड़ा, तिलक या बिंदी छोटी चीज बना दी जाती है। आर्थिक विकास की भाषा में सांस्कृतिक सुरक्षा हाशिए पर चली जाती है।

समस्या केवल Lenskart तक सीमित नहीं

यह मामला केवल Lenskart का नहीं है। भारत के कई यूनिकॉर्न इसी ढांचे में चलते हैं। Swiggy, Zomato, Ola, Meesho और Zepto जैसी कंपनियों की पूंजी संरचना, ESG रिपोर्ट और HR प्रशिक्षण नीतियों को इसी दृष्टि से देखने की आवश्यकता है।

जिन कंपनियों में विदेशी पूंजी साठ से अस्सी प्रतिशत तक स्वामित्व या निर्णायक प्रभाव रखती है, वहां पश्चिमी मूल्य धीरे धीरे नीति का हिस्सा बन जाते हैं। भारत में कारोबार होता है, लेकिन मानक, प्रशिक्षण और वैचारिक भाषा बाहर से आती है।

भारत में निर्मित होना एक नारा बन जाता है। भारतीयों के लिए होना एक मार्केटिंग अभियान बन जाता है। असली सच्चाई कंपनी के नीति दस्तावेजों, निवेशक अपेक्षाओं, ESG रिपोर्टों और HR मैनुअल में लिखी होती है।

पांच हजार साल की पहचान बनाम IPO

बिंदी केवल सौंदर्य प्रसाधन नहीं है। कलावा केवल धागा नहीं है। कड़ा केवल धातु नहीं है। ये प्रतीक भारतीय सभ्यता, धार्मिक स्मृति और सामाजिक पहचान से जुड़े हैं। लेकिन IPO के पीछे भागती कंपनियों के लिए ये प्रतीक अप्रासंगिक बना दिए जाते हैं।

पांच हजार साल की सभ्यतागत निरंतरता को कॉर्पोरेट ग्रूमिंग नीति के एक छोटे नियम से बाहर किया जा सकता है। यही आधुनिक बाजारवाद का सबसे कठोर पक्ष है, जहां संस्कृति को तभी स्वीकार किया जाता है जब वह निवेशक एजेंडे से टकराती नहीं।

अल्पसंख्यक तुष्टीकरण वैश्विक मंचों पर प्रशंसा पाता है। एम्स्टर्डम और न्यूयॉर्क की एजेंसियां उसे समावेश कहती हैं। लेकिन हिंदू प्रतीकों की रक्षा की बात आते ही वही ढांचा चुप हो जाता है या उसे बहुसंख्यक प्रभुत्व का संकेत बताने लगता है।

स्वतंत्र राष्ट्र के सामने असली चुनौती

भारत स्वयं को स्वतंत्र राष्ट्र कहता है, लेकिन कॉर्पोरेट नीतियों, विदेशी पूंजी, ESG स्कोरिंग और DEI प्रशिक्षण के माध्यम से एक वैचारिक निर्भरता भीतर तक उतर चुकी है। यह निर्भरता कानून से नहीं, निवेश और बाजार मूल्यांकन से चलती है।

Lenskart विवाद इसलिए गंभीर है क्योंकि यह केवल एक बिंदी का सवाल नहीं है। यह तय करेगा कि भारत की कंपनियां भारतीय समाज के सांस्कृतिक प्रतीकों को सम्मान देंगी या विदेशी निवेशकों की स्वीकार्यता के लिए अपनी सभ्यतागत जड़ों को ही जोखिम मानेंगी।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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