Monday, April 27, 2026

कालीबाड़ी: वो प्राचीन शक्तिपीठ जहां PM मोदी ने किए दर्शन

थंथनिया कालीबाड़ी: उत्तर कोलकाता की 323 साल पुरानी शक्ति पीठ

उत्तर कोलकाता के बিधान सड़क पर स्थित थंथनिया कालीबाड़ी मां सिद्धेश्वरी काली को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर बंगाल के तांत्रिक और भक्ति परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

मां सिद्धेश्वरी काली को दस महाविद्याओं में से एक माना जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यहां हालही की पूजा अर्चना के बाद इस मंदिर के इतिहास में नई रुचि जागृत हुई है।

मंदिर की स्थापना और प्राचीन इतिहास

सन 1703 में यानी बंगला साल 1110 में एक तांत्रिक साधक उदय नारायण ब्रह्मचारी ने इस मंदिर की स्थापना की थी। उस समय यह क्षेत्र कोलकाता के औपचारिक निर्माण से बहुत पहले का था।

सुतानुती और गोबिंदपुर के घने जंगलों में स्थित इस श्मशान भूमि पर उदय नारायण ब्रह्मचारी ने मां सिद्धेश्वरी काली की मिट्टी की मूर्ति को स्वयं तैयार किया। उन्होंने मिट्टी की दीवारों और खजूर के पत्तों की छत से एक सरल संरचना बनाई।

घने जंगलों में स्थित इस मंदिर की घंटियों की आवाज दूर तक सुनाई देती थी। घंटियों से निकलने वाली थन-थन की आवाज ही इस मंदिर और इस क्षेत्र का नाम निर्धारित करने का कारण बनी।

थंथनिया नाम की उत्पत्ति इसी अद्भुत ध्वनि से हुई है। मंदिर के अंदर के संगमरमर की पट्टिकाओं और मंदिर के शिलालेख इस बात की पुष्टि करते हैं।

आधुनिक मंदिर संरचना का निर्माण

सन 1803 से 1806 तक, यानी बंगला साल 1210 से 1213 तक एक व्यापारी शंकर चंद्र घोष ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया। उन्होंने मंदिर को वर्तमान रूप में स्थापित किया और इसके पास एक अष्टचाल आकार का पुष्पेश्वर शिव मंदिर भी जोड़ा।

घोष परिवार आज भी इस मंदिर के वंशागत पुजारी के रूप में अपनी सेवा प्रदान कर रहा है। मंदिर के ऐतिहासिक रिकॉर्ड और आंतरिक दस्तावेज मूल मंदिर और वर्तमान संरचना के बीच स्पष्ट अंतर करते हैं।

मां सिद्धेश्वरी काली की मूर्ति और विशेषताएं

मां सिद्धेश्वरी काली की मूर्ति चार भुजाओं वाली मिट्टी की बनी हुई है। यह मूर्ति भगवान शिव के ऊपर खड़ी दक्षिणा काली के पारंपरिक रूप को दर्शाती है। हर साल इस मूर्ति को लाल और काले रंग से फिर से रंगा जाता है।

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कालीबाड़ी: वो प्राचीन शक्तिपीठ जहां PM मोदी ने किए दर्शन 2

मां को चांदी और सोने के गहनों से सजाया जाता है। स्थानीय श्रद्धालुओं का मानना है कि मां सिद्धेश्वरी काली अत्यंत शक्तिशाली हैं और तांत्रिक परंपराओं में जागृत शक्तियों का प्रतीक हैं।

मां की पूजा अर्चना में प्राचीन रीति-रिवाज का कड़ाई से पालन किया जाता है। अमावस्या की रातों और काली पूजा के दौरान पशु बलि दी जाती है।

यह परंपरा आज भी जारी है और पूरी प्राचीन रीति से निभाई जाती है। मां को प्रसाद के रूप में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों भोजन अर्पित किए जाते हैं।

श्री रामकृष्ण परमहंस का संबंध

श्री रामकृष्ण परमहंस का इस मंदिर से गहरा संबंध रहा है। 1852 से 1855 तक जब वह झामापुकुर में निवास करते थे, वह इस मंदिर में बार-बार आते थे। मां सिद्धेश्वरी काली की भक्ति में वह भक्तिपूर्ण भजन गाते थे।

वह श्रद्धालुओं को सांत्वना देते थे और आध्यात्मिक प्रवचन देते थे। श्री रामकृष्ण ने एक प्रसिद्ध उक्ति दी जो मंदिर की दीवारों पर अंकित है। शंकर घोष के पोते स्वामी सुबोधानंद श्री रामकृष्ण परमहंस के सीधे शिष्य बने।

“शंकरेर हृदय माझे काली विराजे” यह बंगला भाषा की पंक्ति का अर्थ है शंकर के हृदय में काली का निवास होता है। यह उक्ति काली और शिव के अभिन्न संबंध को दर्शाती है। मंदिर के अंदर इस बंगला पंक्ति को सुंदर तरीके से खुदवाया गया है।

वार्षिक पूजा और परंपराएं

थंथनिया कालीबाड़ी तांत्रिक शक्त परंपरा का पालन करता है। यहां साल भर विशेष पूजाएं आयोजित की जाती हैं। कार्तिक अमावस्या को काली पूजा का आयोजन किया जाता है।

ज्येष्ठ महीने में फलहारिणी अमावस्या को विशेष पूजा होती है। कौषिकी और रतंती अमावस्या के दिन भी महत्वपूर्ण पूजाएं संपन्न होती हैं।

प्रति मंगलवार और शनिवार को भी नियमित पूजा का विधान है। इन अवसरों पर सैकड़ों श्रद्धालु मंदिर में इकट्ठा होते हैं। विशेषकर पूजा के दिनों में भीड़ काफी बढ़ जाती है।

भक्त दूर-दूर से यहां आते हैं और मां का आशीर्वाद लेते हैं। मंदिर का वातावरण पूरी तरह भक्ति और श्रद्धा से सराबोर रहता है।

आधुनिक समय में मंदिर की प्रासंगिकता

323 वर्षों के लंबे इतिहास के बाद भी थंथनिया कालीबाड़ी कोलकाता की आध्यात्मिक चेतना का जीवंत प्रतीक बना हुआ है। यह मंदिर तांत्रिकता, भक्ति और बंगाल की प्राचीन विरासत को एक साथ दर्शाता है।

घने जंगलों से लेकर औपनिवेशिक काल तक और फिर शहरी विकास के दौरान भी यह मंदिर अपनी गरिमा बनाए रहा है। आज की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में बिधान सड़क के व्यस्त वातावरण के बीच यह मंदिर शांत और शक्तिशाली बना हुआ है।

कोलकाता में आने वाले पर्यटकों के लिए यह मंदिर एक आवश्यक गंतव्य है। यहां आकर श्रद्धालु मां सिद्धेश्वरी काली का आशीर्वाद लेते हैं और अपने मन को शांति से भर जाते हैं। इस मंदिर की यात्रा का अनुभव वास्तव में अविस्मरणीय होता है और श्रद्धालुओं के आत्मा को गहरा प्रभाव डालता है।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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