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आईआईटी बॉम्बे के एक ग्रेजुएट सोहम नायक की पोस्ट ने सोशल मीडिया पर कामकाजी युवाओं और भर्ती प्रक्रिया को लेकर नई बहस छेड़ दी है। दावा है कि नौकरी तलाशने के दौरान उन्हें ऐसी इंटर्नशिप पेशकश मिली, जिसमें मौजूदा वेतन का केवल दसवां हिस्सा दिया जा रहा था।
नायक ने बताया कि एक एचआर प्रतिनिधि ने पहले उनसे वर्तमान वेतन पूछा। वेतन बताने के बाद उन्हें 3 से 6 महीने की इंटर्नशिप अवधि का प्रस्ताव दिया गया। इसके बाद पूर्णकालिक नौकरी देने की बात कही गई, लेकिन इंटर्नशिप भुगतान बहुत कम था।
समान काम को इंटर्नशिप बताने पर सवाल
नायक के अनुसार यह प्रस्ताव इसलिए भी चौंकाने वाला था, क्योंकि भूमिका कोई जूनियर पद नहीं थी और न ही कार्यक्षेत्र अलग था। उनका कहना था कि वही काम, जिसे वे रोज करते हैं, उसे इंटर्नशिप का नाम देकर 90 प्रतिशत कम लागत में लेने की कोशिश की गई।
उन्होंने कहा कि वे 16 दिन से बेरोजगार थे और आर्थिक स्थिति भी आसान नहीं थी, फिर भी उन्होंने प्रस्ताव तुरंत ठुकरा दिया। नायक ने लिखा कि यह उनके लिए सबसे आसान इनकार था, क्योंकि अपनी कीमत का दसवां हिस्सा स्वीकार करना आगे की वैल्यू तय कर देता है।
सोशल मीडिया पर बंटी राय
नायक की पोस्ट पर सोशल मीडिया में मिली जुली प्रतिक्रियाएं आईं। कई लोगों ने उनके फैसले का समर्थन किया और कहा कि कंपनियों को प्रोबेशन या इंटर्नशिप के नाम पर कुशल पेशेवरों से कम वेतन में पूरा काम लेने की प्रवृत्ति छोड़नी चाहिए।
एक यूजर ने लिखा कि फ्रेशर्स के लिए प्रोबेशन या इंटर्नशिप चल सकती है, लेकिन भुगतान शहर और खर्च के हिसाब से उचित होना चाहिए। उनके अनुसार 30 हजार से 50 हजार रुपये तक की राशि और भोजन या यात्रा सहायता जैसी सुविधा होनी चाहिए।
दूसरे पक्ष के कुछ यूजर्स ने मौजूदा नौकरी बाजार की कठिनाई का हवाला दिया। एक टिप्पणी में कहा गया कि इस बाजार में जो अवसर मिले, उसे स्वीकार करना पड़ सकता है, क्योंकि आगे चलकर उम्मीदवार को कभी न कभी समझौते की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
कई लोगों ने नायक के आत्मसम्मान वाले रुख को सही बताया। एक यूजर ने लिखा कि अगर कौशल है, तो अच्छे पैकेज पर आगे बढ़ने के अवसर मिल सकते हैं। स्टार्टअप्स में भी कई बार पिछली सैलरी से अधिक प्रतिभा के आधार पर भर्ती होती है।
अस्पष्ट अनुबंधों से बचने की सलाह
कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने अस्पष्ट शर्तों वाले अनुबंध स्वीकार नहीं करने की सलाह दी। उनका कहना था कि बहुत कम वेतन का प्रस्ताव देने वाली कंपनियां बाद में और कटौती या भुगतान टालने जैसे रास्ते भी निकाल सकती हैं, इसलिए उम्मीदवारों को सावधान रहना चाहिए।
मामले पर सोहम नायक से प्रतिक्रिया मांगी गई है। उनके जवाब के बाद स्थिति और साफ हो सकती है। फिलहाल यह मामला नौकरी बाजार, वेतन मूल्यांकन, इंटर्नशिप संस्कृति और पेशेवर आत्मसम्मान को लेकर ऑनलाइन चर्चा का बड़ा विषय बन गया है।
दो साल से हाइक नहीं, सिर्फ बड़ा पदनाम मिला
एक अन्य मामले में इंदौर के एक पेशेवर अपूर्व चतुर्वेदी ने अपने मित्र की स्थिति साझा की है। उनके अनुसार उनका मित्र मार्केटिंग क्षेत्र में काम करता है और सालाना 7 लाख रुपये कमाता है, लेकिन दो वर्षों से उसकी सैलरी में कोई वृद्धि नहीं हुई।
चतुर्वेदी ने बताया कि इन दो सालों में उनके मित्र की जिम्मेदारियां तीन गुना बढ़ गईं। इसके बावजूद कंपनी ने वेतन वृद्धि नहीं दी। कंपनी की ओर से यह तर्क दिया गया कि कर्मचारी को बेहतर पदनाम दिया गया है, इसलिए उसे अलग से हाइक नहीं मिली।
पदनाम किराया नहीं भरता
चतुर्वेदी ने अपनी पोस्ट में कहा कि फैंसी पदनाम वेतन वृद्धि का विकल्प नहीं हो सकता। उनके अनुसार बेहतर पदनाम दिखने में अच्छा लग सकता है, लेकिन इससे घर का किराया, रोजमर्रा का खर्च और आर्थिक सुरक्षा पूरी नहीं होती।
इस पोस्ट ने भी कामकाजी लोगों के बीच बड़ी चर्चा पैदा की। कई कर्मचारियों ने कहा कि भारतीय कंपनियों में कई बार प्रमोशन के नाम पर सिर्फ जिम्मेदारियां बढ़ा दी जाती हैं, जबकि वेतन उसी स्तर पर रोक दिया जाता है। इससे कर्मचारियों में असंतोष बढ़ता है।
काम का बोझ बढ़ा, वेतन स्थिर रहा
इस मामले में मुख्य सवाल यह है कि जब कर्मचारी की भूमिका, जिम्मेदारी और कंपनी के लिए योगदान बढ़ता है, तो उसका आर्थिक मूल्यांकन क्यों नहीं होता। केवल नया पदनाम देकर वेतन वृद्धि टालना कर्मचारियों के लिए लंबे समय में नुकसानदायक माना जा रहा है।
सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे कार्यस्थल की आम समस्या बताया। उनका कहना था कि कंपनियां बेहतर पदनाम देकर कर्मचारी को रोके रखने की कोशिश करती हैं, लेकिन वास्तविक सम्मान वेतन, कार्य संतुलन और स्पष्ट विकास प्रक्रिया से ही दिखता है।

