छात्र राजनीति का उभार
जंतर मंतर पर छात्रों, विशेषकर छात्राओं के एक वर्ग द्वारा अभद्र भाषा, गालियों और आपत्तिजनक नारों ने पूरे आंदोलन के वातावरण को प्रभावित किया। इसके बावजूद इस घटनाक्रम का एक सकारात्मक पक्ष भी सामने आया कि लंबे समय बाद देश में छात्र राजनीति की वापसी की संभावनाओं का संकेत दिखाई दिया।
छात्र राजनीति अपने मूल स्वरूप में कभी भी नकारात्मक व्यवस्था नहीं रही। विद्यालयों और महाविद्यालयों में यदि छात्रों की किसी समस्या का समाधान नहीं होता था तो छात्र नेता लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराते थे। कठिन प्रश्नपत्र आने पर सामूहिक वॉकआउट और प्रशासन के सामने अपनी बात रखने जैसी परंपराएं छात्र नेतृत्व का हिस्सा हुआ करती थीं।
देश के बड़े आंदोलनों की आधारशिला रही छात्र शक्ति
वर्ष 1974 का जयप्रकाश नारायण आंदोलन छात्र राजनीति की सबसे बड़ी मिसाल माना जाता है। उस आंदोलन में अनेक छात्र संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। गोविंदाचार्य संगठनात्मक भूमिका में सक्रिय थे, जबकि अरुण जेटली, विजय गोयल, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे अनेक नेता छात्र राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचे।
उस दौर में विभिन्न छात्र संगठनों की अपनी अलग पहचान थी। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को अपेक्षाकृत अनुशासित और संस्कारित छात्रों का संगठन माना जाता था। वहीं एनएसयूआई, एआईएसएफ, एसएफआई तथा समाजवादी युवजन सभा जैसे संगठनों की कार्यशैली अधिक आक्रामक और आंदोलनकारी मानी जाती थी।
छात्रसंघ चुनावों ने दिए संघर्षशील नेता
छात्रसंघ चुनाव नेतृत्व निर्माण की महत्वपूर्ण प्रक्रिया हुआ करते थे। पहले कक्षा प्रतिनिधियों का चुनाव होता था और वही प्रतिनिधि आगे छात्रसंघ अध्यक्ष का चयन करते थे। इससे लोकतांत्रिक नेतृत्व विकसित होता था और अनेक संघर्षशील छात्र सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ते थे।
हालांकि समय के साथ इन चुनावों में केवल राजनीतिक दल ही नहीं बल्कि आपराधिक गिरोह और स्थानीय माफिया भी रुचि लेने लगे। कई निर्वाचित छात्र नेता बाहरी प्रभाव में आकर रंगदारी, अवैध वसूली और अपराध की दुनिया से जुड़ने लगे। इससे परिसरों में हिंसा और गैंगवार जैसी स्थितियां पैदा होने लगीं।
छात्र राजनीति के कमजोर होने के दुष्परिणाम
इन्हीं परिस्थितियों के बाद कई स्थानों पर छात्रसंघ चुनाव बंद कर दिए गए और धीरे धीरे छात्र राजनीति का प्रभाव समाप्त होने लगा। इसके साथ ही संघर्ष से उभरने वाले नेतृत्व की नई पीढ़ी भी कम होती चली गई। परिणामस्वरूप राजनीति में चापलूसी, वंशवाद और व्यक्तिगत निष्ठा का प्रभाव बढ़ने लगा।
स्थानीय स्तर पर भी इसका असर दिखाई दिया। पुलिस थानों, तहसीलों, ब्लॉक कार्यालयों और प्रशासनिक संस्थानों में जनता की समस्याएं उठाने वाले जनप्रतिनिधियों और छात्र नेताओं की संख्या घट गई। इसका लाभ दलाल तंत्र और भ्रष्टाचार को मिला तथा आम नागरिक धीरे धीरे अपने अधिकारों के प्रति उदासीन होता गया।
शिक्षा व्यवस्था में आया सामाजिक बदलाव
इसी दौरान शिक्षा व्यवस्था में भी बड़ा परिवर्तन आया। सरकारी विद्यालयों, सहायता प्राप्त संस्थानों और पारंपरिक महाविद्यालयों का स्थान धीरे धीरे निजी और अंग्रेजी माध्यम के शिक्षण संस्थानों ने लेना शुरू किया। इन संस्थानों में अधिकारों की मांग और छात्र आंदोलनों की संस्कृति लगभग समाप्त हो गई।
इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में ऐसे विद्यार्थी तैयार होने लगे जिनका लक्ष्य केवल प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित रह गया। समाज, स्थानीय समस्याओं और जनसरोकारों से उनका जुड़ाव लगातार कमजोर होता गया। रोजगार मिले या न मिले, उनका पूरा ध्यान केवल प्रतियोगी परीक्षाओं तक सिमटकर रह गया।
नई पीढ़ी और छात्र नेतृत्व की चुनौती
जो पीढ़ी संघर्ष, आंदोलन और लोकतांत्रिक नेतृत्व की परंपरा से परिचित ही नहीं रही, उसके लिए सही और गलत नेतृत्व में अंतर करना भी कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति या आंदोलन का बिना पर्याप्त समझ के हिस्सा बन सकती है और अनजाने में किसी की रणनीति का साधन भी बन सकती है।
फिर भी यदि नई पीढ़ी विवेक, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ छात्र राजनीति को अपनाए तो देश में एक बार फिर संघर्षशील, जनसरोकारों से जुड़े और लोकतांत्रिक मूल्यों वाले नेतृत्व का विकास संभव हो सकता है। छात्र राजनीति अपनी मूल भावना में समाज और लोकतंत्र दोनों के लिए सकारात्मक भूमिका निभा सकती है।

