दिल्ली में छात्रों से किराए की लूट की असली जड़
दिल्ली में जर्जर मकानों के छोटे छोटे कमरों के लिए छात्रों से भारी किराया वसूलने की समस्या को केवल मकान मालिकों की लालच से समझना अधूरा है। इसकी बड़ी वजह यह है कि अधिकांश कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पर्याप्त हॉस्टल ही उपलब्ध नहीं हैं।
एक आंकड़े के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय के करीब 90 कॉलेजों में से लगभग 70 में हॉस्टल की सुविधा नहीं है। समस्या सामान्य कॉलेजों तक सीमित नहीं है। IIT जैसे बड़े प्रतिष्ठित संस्थानों में भी हॉस्टल की कमी लंबे समय से महसूस की जाती है।
ज्यादातर विश्वविद्यालयों में हॉस्टल वही हैं जो संस्थानों की स्थापना के समय 40, 50 या 60 साल पहले बनाए गए थे। इसके बाद सीटें कई गुना बढ़ीं, लेकिन उस अनुपात में एक प्रतिशत भी नए हॉस्टल नहीं बने और पुराने भी बदतर होते गए।
जो पुराने हॉस्टल मौजूद हैं, उनकी हालत भी कई जगह संतोषजनक नहीं है। इसलिए केवल सीटें बढ़ा देना या नए कॉलेज खोल देना शिक्षा सुधार नहीं कहलाता। शिक्षा की गुणवत्ता इस बात से भी तय होती है कि छात्र किस वातावरण में पढ़ रहे हैं।
टूटे भवनों, तंग गलियों और दड़बेनुमा कमरों में रहना छात्रों की मजबूरी बन जाती है। ऊपर से ऐसे इलाकों में अच्छा और पौष्टिक भोजन भी नहीं मिलता। पढ़ाई का दबाव झेल रहे छात्रों के लिए रहने और खाने की यह स्थिति अलग संकट बनती है।
हॉस्टल निर्माण को मिशन की तरह लेना होगा
सरकार शिक्षा क्षेत्र में एक काम मिशन के रूप में कर दे कि सभी सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में बड़े स्तर पर हॉस्टल बनाए जाएं, तो इसका असर बहुत व्यापक होगा। यह छात्रों के हित में लंबे समय तक परिणाम देने वाला बुनियादी सुधार होगा।
दिल्ली में योजनाबद्ध तरीके से चुन चुनकर हॉस्टल बनाए जाने चाहिए। जिस तरह देश में हाईवे निर्माण या रेलवे के विद्युतीकरण को बड़े मिशन की तरह पूरा किया गया, उसी तरह छात्र आवास को भी जरूरी बुनियादी ढांचा मानकर तेजी से आगे बढ़ाना चाहिए।
ऐसा भी नहीं है कि सरकारी विश्वविद्यालयों में जमीन का सर्वथा अभाव है। कई विश्वविद्यालयों के पास पर्याप्त भूमि है और उसका बड़ा हिस्सा खाली पड़ा है। वहां संबंधित विश्वविद्यालय और आसपास के अन्य कॉलेजों के छात्रों के लिए संयुक्त हॉस्टल बनाए जा सकते हैं।
यह काम तेज गति से हुआ तो दिल्ली और दूसरे महानगरों में छात्रों से मनमाना किराया वसूलने वाला तंत्र कमजोर पड़ेगा। घटिया पीजी बनाकर अत्यधिक किराया लेने की प्रवृत्ति पर लगाम लगेगी और कर्मचारी वर्ग के लिए भी आवास अपेक्षाकृत सस्ता और सुलभ होगा।
सरकार नहीं तो समाज आगे आए
यदि सरकार बड़े स्तर पर यह काम न करे तो कोई हिन्दू संगठन भी इस दिशा में पहल कर सकता है। मिशनरियों ने कॉन्वेंट स्कूल, अस्पताल और अनाथालय जैसे संस्थान खड़े करके व्यापक प्रभाव बनाया। छात्रावास भी वैसा ही प्रभावशाली सामाजिक कार्य बन सकता है।
इस्कॉन ने कुछ विश्वविद्यालयों के आसपास अच्छे हॉस्टल और मेस संचालित किए हैं, जहां सात्विक वातावरण, अनुशासन और पौष्टिक भोजन का ध्यान रखा जाता है। लेकिन ऐसे प्रयास अभी बहुत सीमित हैं और कुछ ही स्थानों तक हैं, इसलिए उनका प्रभाव व्यापक नहीं हो पाया।
छात्र आवास का यह पूरा क्षेत्र अभी सरकार और समाज दोनों के लिए लगभग खुला पड़ा है। यहां सबसे अधिक जरूरत सदाशयता, दीर्घकालिक सोच और योजनाबद्ध निवेश की है। अच्छे हॉस्टल उपलब्ध हों तो लाखों छात्रों का जीवन सीधे तौर पर बेहतर हो सकता है।

