UP: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही सियासी समीकरण साधने की कवायद तेज होती नजर आ रही है।
इसी बीच योगी सरकार ने पूर्व मंत्री और भाजपा नेता मोहसिन रजा को राज्य अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है।
इतना ही नहीं, उन्हें कैबिनेट रैंक का दर्जा भी दिया जाएगा। ऐसे में इस नियुक्ति को सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला माना जाए या इसके पीछे 2027 की चुनावी रणनीति भी है? यही सवाल अब उत्तर प्रदेश की सियासत में चर्चा का विषय बन गया है।
मोहसिन रजा भाजपा के उन प्रमुख मुस्लिम चेहरों में शामिल रहे हैं, जिन्हें पार्टी ने लंबे समय से राजनीतिक जिम्मेदारियां दी हैं।
2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने पार्टी के प्रवक्ता के तौर पर भी काम किया।
2017 में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद रजा को अल्पसंख्यक कल्याण, मुस्लिम वक्फ और हज विभाग में राज्य मंत्री बनाया गया था।
कैबिनेट रैंक के साथ बढ़ा राजनीतिक कद
अब एक बार फिर रजा को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलना खास इसलिए माना जा रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं है।
अल्पसंख्यक आयोग की अध्यक्षता और कैबिनेट रैंक दोनों मिलना उनके राजनीतिक कद को बढ़ाने वाला फैसला माना जा रहा है।
राजनीतिक तौर पर देखें तो उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता एक बड़ा और प्रभावशाली चुनावी वर्ग है।
ऐसे में भाजपा की ओर से मुस्लिम समुदाय से आने वाले नेता को प्रमुख संवैधानिक संस्था की जिम्मेदारी देना पार्टी की पहुंच बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।
हालांकि, भाजपा की ओर से इस नियुक्ति को 2027 के मुस्लिम वोटरों से जोड़कर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
BJP पर लगते रहे हैं मुस्लिमों से दूरी के आरोप
विपक्ष लगातार भाजपा पर मुस्लिम समुदाय को राजनीतिक रूप से हाशिये पर रखने के आरोप लगाता रहा है।
ऐसे में चुनाव से पहले मोहसिन रजा को अहम पद देना विपक्ष के लिए भी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
यही वजह है कि इस नियुक्ति को लेकर सियासी सवाल भी उठ रहे हैं—क्या भाजपा मुस्लिम समाज तक अपना संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रही है?
क्या पार्टी 2027 में अपने पारंपरिक चुनावी समीकरण से आगे बढ़कर नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाना चाहती है?
हालांकि, किसी नियुक्ति को सीधे चुनावी रणनीति का हिस्सा कहना जल्दबाजी होगी। इसका वास्तविक असर चुनाव के दौरान ही दिखाई देगा,
लेकिन इतना जरूर है कि चुनावी साल से पहले रजा को मिली यह जिम्मेदारी राजनीतिक संदेश जरूर देती है।
वक्फ संपत्तियों का मुद्दा भी चर्चा में
मोहसिन रजा की नई जिम्मेदारी से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ उनकी मुलाकात भी चर्चा में रही थी।
12 अगस्त को हुई मुलाकात में रजा ने प्रदेश के दोनों वक्फ बोर्डों की संपत्तियों की जिला स्तर पर एसआईटी जांच और विशेष ऑडिट कराने की मांग की थी।
रजा का दावा रहा है कि प्रदेश में पहले दो लाख से अधिक पंजीकृत वक्फ संपत्तियां थीं, जबकि अब इनकी संख्या करीब 1.27 लाख रह गई है।
उन्होंने पिछली सरकारों के दौरान वक्फ बोर्डों के उचित ऑडिट नहीं होने का आरोप लगाया था। हालांकि, इन दावों की वास्तविक स्थिति जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
क्रिकेट से राजनीति तक का सफर
राजनीति में आने से पहले मोहसिन रजा का जुड़ाव खेल और मनोरंजन की दुनिया से भी रहा है। वह उत्तर प्रदेश की ओर से रणजी ट्रॉफी में क्रिकेट खेल चुके हैं।
इसके अलावा मॉडलिंग और अभिनय में भी उनकी दिलचस्पी रही। 1995 में उन्हें ‘प्रिंस लखनऊ’ चुना गया था।
अब अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष के तौर पर उनकी नई भूमिका सामने है। 2027 के चुनाव से पहले यह नियुक्ति भाजपा के लिए कितनी अहम साबित होगी।

