Three Innovations are Safe Food: भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादक देशों में से एक है। यहां हर साल करोड़ों टन फल, सब्जियां और फूलों का उत्पादन होता है, लेकिन इनकी बड़ी मात्रा लोगों की थाली तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाती है।
इसका सबसे बड़ा कारण है सही भंडारण की कमी, पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज का अभाव और परिवहन के दौरान होने वाला नुकसान।
खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, भारत में हर साल पैदा होने वाली फल, सब्जियों और फूलों का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा खराब हो जाता है। इससे किसानों, व्यापारियों और पूरे कृषि क्षेत्र को करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होता है।
फसल खराब होने का सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ता है। जब उनकी मेहनत से उगाई गई उपज समय पर नहीं बिक पाती या खराब हो जाती है, तो उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
यही वजह है कि अब देश के अलग-अलग हिस्सों में कई स्टार्टअप और स्थानीय संस्थाएं ऐसी तकनीकें विकसित कर रही हैं, जो कम लागत में इस समस्या का समाधान दे रही हैं।
ये इनोवेशन न केवल फलों और सब्जियों को लंबे समय तक ताजा रखते हैं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद कर रहे हैं। आइए जानते हैं ऐसे तीन प्रेरणादायक प्रयासों के बारे में।
बिना बिजली के चलता है ‘सब्जी कूलर’
महाराष्ट्र के सोलापुर में स्थित स्टार्टअप रूटकार्ट ने किसानों और छोटे व्यापारियों के लिए एक अनोखा ‘सब्जी कूलर’ तैयार किया है।
इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे चलाने के लिए बिजली की जरूरत नहीं पड़ती।
यह पूरी तरह इवेपोरेटिव कूलिंग (Evaporative Cooling) तकनीक पर काम करता है।
इस तकनीक में पानी के प्राकृतिक वाष्पीकरण से तापमान कम किया जाता है, जिससे अंदर रखे फल, सब्जियां, मशरूम और फूल ज्यादा समय तक ताजे बने रहते हैं।
इस सिस्टम में बहुत कम पानी की जरूरत होती है और इसे गांवों या उन इलाकों में भी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है, जहां बिजली की सुविधा सीमित है।
रूटकार्ट की सह-संस्थापक सरयू कुलकर्णी के अनुसार, इस कूलर की मदद से फल और सब्जियों की ताजगी, रंग और गुणवत्ता 5 से 7 दिनों तक बनी रहती है।
इससे किसानों को अपनी उपज तुरंत कम दाम पर बेचने की मजबूरी नहीं रहती। वे सही समय का इंतजार कर बेहतर कीमत हासिल कर सकते हैं। साथ ही छोटे दुकानदारों को भी खराब होने वाले माल का नुकसान कम उठाना पड़ता है।
माजुली में जंगली फल बने किसानों की नई कमाई का जरिया
असम का माजुली दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप (रिवर आइलैंड) है। यहां के किसान लंबे समय से अपनी उपज का उचित मूल्य न मिलने की समस्या से जूझ रहे थे।
इसके अलावा यहां मिलने वाले कई स्थानीय और जंगली फल बाजार के अभाव में खराब हो जाते थे। इनमें ‘एलीफेंट एपल’ जैसे फल भी शामिल थे, जिन्हें पहले बेकार समझकर छोड़ दिया जाता था।
इस स्थिति को बदलने के लिए यहां माजुली वुमन फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी की स्थापना की गई।
इसके साथ ही एक प्रोसेसिंग यूनिट भी शुरू की गई, जहां स्थानीय कृषि उत्पादों और जंगली फलों से अलग-अलग खाद्य उत्पाद तैयार किए जाने लगे।
अब यहां सरसों, चावल और अन्य स्थानीय फसलों के साथ-साथ एलीफेंट एपल से भी अचार, जैम, चटनी और अन्य वैल्यू-एडेड उत्पाद बनाए जा रहे हैं।
इससे पहले जो फल बेकार हो जाते थे, वे अब किसानों की अतिरिक्त आय का स्रोत बन गए हैं।
इस पहल का सबसे बड़ा फायदा ग्रामीण महिलाओं को मिला है। उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार मिला है और किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलने लगा है।
यह उदाहरण दिखाता है कि यदि स्थानीय संसाधनों का सही उपयोग किया जाए, तो खाद्य बर्बादी को कम करने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत बनाया जा सकता है।
‘कोल्डईजी बॉक्स’ से बढ़ी फलों और सब्जियों की शेल्फ लाइफ
हैदराबाद के स्टार्टअप कोल्डईजी ने छोटे किसानों, दुकानदारों और फूल विक्रेताओं के लिए एक कॉम्पैक्ट कोल्ड स्टोरेज बॉक्स विकसित किया है।
यह बॉक्स उन लोगों के लिए खासतौर पर उपयोगी है, जिनके पास बड़े और महंगे कोल्ड स्टोरेज की सुविधा उपलब्ध नहीं है।
कोल्डईजी के संस्थापक विशाल सिंघल के अनुसार, यह बॉक्स फल, सब्जियों और फूलों की शेल्फ लाइफ लगभग दोगुनी कर देता है।
यानी जो उत्पाद पहले दो-तीन दिन में खराब होने लगते थे, वे अब ज्यादा समय तक सुरक्षित रह सकते हैं।
इस तकनीक का फायदा सबसे ज्यादा फूल विक्रेताओं और छोटे व्यापारियों को मिल रहा है। पहले जो फूल अगले दिन तक मुरझा जाते थे, अब वे अच्छी स्थिति में बिक रहे हैं।
इसी तरह टमाटर, केला और अन्य जल्दी खराब होने वाली सब्जियों और फलों का नुकसान भी काफी कम हुआ है। इससे व्यापारियों की कमाई बढ़ी है और उपभोक्ताओं को भी ताजा उत्पाद मिल रहे हैं।
क्यों जरूरी हैं ऐसे इनोवेशन?
भारत में हर साल लाखों टन खाद्य सामग्री सिर्फ इसलिए खराब हो जाती है क्योंकि उसे सुरक्षित रखने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।
इससे किसानों की मेहनत और संसाधन दोनों बर्बाद होते हैं। यदि कम लागत वाली ऐसी तकनीकों को बड़े स्तर पर अपनाया जाए, तो खाद्य बर्बादी में बड़ी कमी लाई जा सकती है।
इन तकनीकों से किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए अधिक समय मिलता है, जिससे वे बेहतर बाजार और उचित कीमत का इंतजार कर सकते हैं।
साथ ही उपभोक्ताओं तक भी अधिक ताजे और गुणवत्तापूर्ण उत्पाद पहुंचते हैं। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ती है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा भी मजबूत होती है।

