Friday, June 19, 2026

इजरायल ने खारिज की ट्रंप ईरान की डील, मध्य पूर्व में फिर गहराया युद्ध का खतरा

इजरायल

अमेरिकी कोशिशों को बड़ा झटका

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान के साथ परमाणु सामग्री और क्षेत्रीय तनाव घटाने को लेकर किए गए समझौते के दावों के बावजूद मध्य पूर्व में शांति की संभावना कमजोर दिख रही है। इजरायल इस डील से सहमत नहीं है।

इजरायल के इसी रुख ने अमेरिका की कूटनीतिक कोशिशों को बड़ा झटका दिया है। वॉशिंगटन जहां ईरान के साथ तनाव कम करने का रास्ता तलाश रहा है, वहीं इजरायल अपनी सुरक्षा को किसी बाहरी भरोसे पर छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।

इजरायल ने हमले रोकने से किया इनकार

इजरायल ने ईरान और उसके समर्थित गुटों के खिलाफ सैन्य अभियान रोकने के बजाय उन्हें और तेज कर दिया है। इनमें हिज्बुल्लाह और अन्य मिलिशिया जैसे संगठन शामिल हैं, जिन्हें इजरायल अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा मानता है।

बेंजामिन नेतन्याहू सरकार का रवैया साफ दिखाता है कि वह अमेरिकी डील को अपने सुरक्षा हितों से ऊपर नहीं मानती। इसी कारण क्षेत्र में फिर से बड़े पैमाने पर युद्ध भड़कने की आशंका मजबूत होती जा रही है।

ट्रंप की डील कितनी टिकाऊ

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान को भारी वित्तीय प्रतिबंधों से राहत देने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खुलवाने के बदले उसके समृद्ध यूरेनियम को जब्त या नष्ट करने का कथित खाका तैयार किया है।

अमेरिका इस पहल को कूटनीतिक जीत के तौर पर पेश कर रहा है, लेकिन इस दावे के सामने सबसे बड़ा रोड़ा इजरायल बनकर उभरा है। इजरायल का कहना है कि ईरान के साथ कोई भी समझौता आसानी से भरोसेमंद नहीं माना जा सकता।

परमाणु कार्यक्रम पर इजरायल की सख्त शर्त

इजरायल का मानना है कि ईरान से किया जाने वाला कोई भी समझौता तब तक टिकाऊ नहीं हो सकता, जब तक तेहरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म नहीं किया जाता। उसके अनुसार आधे अधूरे कदम भविष्य में और बड़ा खतरा बन सकते हैं।

इजरायल की चिंता केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। वह चाहता है कि क्षेत्र में ईरान के प्रॉक्सी नेटवर्क को भी पूरी तरह समाप्त किया जाए, क्योंकि यही नेटवर्क सीरिया, लेबनान और अन्य इलाकों में तनाव को बढ़ाता है।

आर्थिक राहत से ईरान के मजबूत होने का डर

इजरायल को आशंका है कि इस डील की आड़ में ईरान को दोबारा आर्थिक रूप से मजबूत होने का मौका मिल सकता है। प्रतिबंधों में राहत मिलने के बाद तेहरान अपने गुप्त ठिकानों पर परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

इसी वजह से अमेरिकी आपत्तियों के बावजूद इजरायल ईरान के रणनीतिक ठिकानों को लगातार निशाना बना रहा है। इजरायल का मानना है कि यदि अभी सख्ती नहीं दिखाई गई तो ईरान भविष्य में अधिक खतरनाक सैन्य क्षमता हासिल कर सकता है।

थमे नहीं इजरायली हमले

अमेरिकी राष्ट्रपति की घोषणाओं को दरकिनार करते हुए इजरायली वायुसेना और खुफिया एजेंसी मोसाद ने ईरान के भीतर और उसके प्रभाव वाले पड़ोसी देशों में कार्रवाई जारी रखी है। सीरिया और लेबनान में भी ईरानी ठिकाने निशाने पर हैं।

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ संकेत दिया है कि जब बात इजरायल के अस्तित्व और सुरक्षा की होगी, तो उनकी सरकार किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकने वाली नहीं है। यह रुख तनाव को और बढ़ा रहा है।

डील लागू होने से पहले ईरान को कमजोर करने की रणनीति

इजरायल की रणनीति यह दिखती है कि ट्रंप की डील पूरी तरह जमीन पर लागू होने से पहले ही ईरान के सैन्य ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचा दिया जाए। उसका उद्देश्य ईरान को पलटवार करने की स्थिति से पहले ही कमजोर करना है।

इजरायल नहीं चाहता कि किसी समझौते के बाद ईरान को सुरक्षा कवच मिल जाए और उसके बाद वह अपनी सैन्य या परमाणु गतिविधियों को नए सिरे से आगे बढ़ाए। इसी सोच के कारण इजरायल की कार्रवाई लगातार जारी है।

अमेरिकी मध्यस्थता को सीधी चुनौती

इजरायल के निरंतर हमले अमेरिकी मध्यस्थता वाली शांति प्रक्रिया की मजबूती पर सवाल खड़े कर रहे हैं। जब अमेरिका ईरान के साथ समझौते की बात कर रहा है, उसी समय इजरायल की सैन्य कार्रवाई इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता को चुनौती देती दिख रही है।

यदि इजरायल अपनी कार्रवाई जारी रखता है और ईरान इसे अमेरिकी डील के बावजूद जारी हमला मानता है, तो तेहरान इस समझौते को अपने खिलाफ राजनीतिक दबाव का हिस्सा समझ सकता है। इससे पूरी प्रक्रिया पटरी से उतर सकती है।

मध्य पूर्व में बढ़ सकता है बारूदी संकट

कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका इजरायल की चिंताओं को शामिल किए बिना ईरान के साथ एकतरफा समझौता आगे बढ़ाता है, तो इसके परिणाम बेहद घातक हो सकते हैं। यह कदम शांति के बजाय नए टकराव को जन्म दे सकता है।

इजरायल के हमलों के जवाब में यदि ईरान ने पलटवार किया या अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल किया, तो यह समझौता लागू होने से पहले ही टूट सकता है। ऐसी स्थिति पूरे मध्य पूर्व को व्यापक युद्ध की ओर धकेल सकती है।

समझौते से पीछे हट सकता है ईरान

यदि ईरान को लगा कि अमेरिकी डील के बावजूद इजरायली हमले नहीं रुक रहे हैं, तो वह खुद भी इस समझौते से पीछे हट सकता है। ऐसे हालात में तेहरान अपनी बंद या धीमी पड़ी परमाणु गतिविधियों को फिर तेज कर सकता है।

इससे ट्रंप की कथित ऐतिहासिक शांति डील केवल कागजों तक सीमित रह सकती है। मध्य पूर्व एक ऐसे युद्ध में फंस सकता है, जिसे नियंत्रित करना अमेरिका के लिए भी कठिन होगा और जिसका असर ऊर्जा बाजारों तक दिखाई दे सकता है।

WhatsApp Channel Join Now
Telegram Channel Join Now
Mudit
Mudit
लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
- Advertisement -
- Advertisement -

Latest article