मोहन भागवत
आखिर ऐसी कवायद की आवश्यकता क्यों पड़ रही है, यह मूल प्रश्न है। संघ प्रमुख मोहन भागवत अपने दौरों में शाखा स्थलों पर किन लोगों से मिलते हैं। क्या अब वहाँ बालक और तरुण नहीं आते, या उनके आने पर किसी प्रकार की रोक है।
आज बालक और तरुण वर्ग को जेन जी तथा जेन अल्फा जैसे नामों से संबोधित किया जाता है। ऐसे समय में सनातन संस्कृति और देश के सामने नए प्रकार का खतरा दिखाई दे रहा है, जिसे कॉकरोची आवरण के रूप में देखा जा रहा है।
शाखा विस्तार और वास्तविक प्रभाव
यदि संघ परिवार की ओर से अपने कार्यों और गतिविधियों का प्रस्तुत विवरण वास्तविक है तथा शाखाओं की संख्या प्रतिदिन तेज गति से बढ़ रही है, तो अलग से संवाद कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता, उद्देश्य और वास्तविक उपयोगिता पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न खड़े होते हैं।
इसी प्रकार यदि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद युवाओं के बीच प्रभावी और सक्रिय छात्र संगठन है, तो नीट प्रकरण से जुड़े आंदोलन में नेतृत्व एसएफआई और आइसा जैसे वामपंथी तथा माओवादी विचारधारा से जुड़े छात्र संगठनों के हाथों में क्यों दिखाई दिया।
विश्व हिंदू परिषद की भूमिका पर प्रश्न
यदि विश्व हिंदू परिषद आज भी संगठनात्मक रूप से सक्रिय और प्रभावशाली है, तो वह जय श्रीराम के उद्घोष के साथ राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के आवासों का घेराव करने जैसी राजनीतिक तथा सार्वजनिक पहल क्यों नहीं करती, यह भी गंभीर प्रश्न है।
जय मीम और जय भीम के नारों, आक्रामक सोच तथा आपत्तिजनक शब्दों के साथ देश की सड़कों से लेकर प्रधानमंत्री के आधिकारिक निवास के द्वार तक हाल में हुए प्रदर्शनों और बवाल ने संगठित राजनीतिक सक्रियता की एक अलग तस्वीर प्रस्तुत की है।
कला जगत और सांस्कृतिक संगठनों की निष्क्रियता
नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनेता प्रधानमंत्री के विरुद्ध भद्दी भाषा बोलते हैं, युवाओं को भ्रमित करने वाले विचारों का समर्थन करते हैं और सड़क पर उतरकर आंदोलनों को प्रोत्साहित करते हैं। ऐसे में उनके प्रतिरोध में सांस्कृतिक राष्ट्रवादी कलाकारों की अनुपस्थिति सवाल पैदा करती है।
संस्कार भारती तथा संघ प्रमुख के संपर्क में रहने वाले कला और फिल्म जगत के लोग उस समय कहाँ थे, अब कहाँ हैं और सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं दिखाई देते। संगठनात्मक संपर्क और घोषित वैचारिक प्रतिबद्धता के बीच यह अंतर लगातार स्पष्ट होता जा रहा है।
धरातल पर उतरने की आवश्यकता
प्रचार, प्रदर्शन और संगठनात्मक दावों के सहारे चल रही व्यवस्था को छोड़कर वास्तविक धरातल पर उतरना आवश्यक है। रावण वध के लिए महाविष्णु को भी पृथ्वी पर अवतार लेना पड़ा था, क्योंकि धर्म की रक्षा केवल दूरस्थ सत्ता से संभव नहीं होती।
भगवत सत्ता भी धरती पर सक्रिय उपस्थिति के बिना सुरक्षित और प्रभावी नहीं रह सकती। धर्मस्थापना के लिए देवताओं को भी धरती का आश्रय लेना पड़ा। फिर संघ से भाजपा तक नेतृत्व हवा में क्यों दिखाई देता है, यह प्रश्न अनदेखा नहीं किया जा सकता।
नेतृत्व पर अत्यधिक निर्भरता का संकट
यदि नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ और अमित शाह जैसे नेता न हों, तो देश और संगठन की स्थिति क्या होगी, इसका गंभीर आकलन आवश्यक है। किसी बड़े संगठन की शक्ति कुछ व्यक्तियों पर निर्भर रहे, तो उसकी स्थायित्व क्षमता संदिग्ध हो जाती है।
यह आलोचना किसी व्यक्तिगत अपेक्षा, इच्छा, काम, आवश्यकता, विरोध या शत्रुता से प्रेरित नहीं है। यह प्रश्न ऐसे व्यक्ति की ओर से उठ रहे हैं, जो स्वयं कभी इन संगठनों का हिस्सा रहा और उनकी कार्यप्रणाली को नजदीक से देख चुका है।
देश और धर्म के सामने खड़े कॉकरोची शत्रुओं को देखकर पीड़ा और चिंता होती है। ऐसे कठिन समय में संगठनों की निष्क्रियता, सीमित प्रतिक्रिया और धरातलीय संघर्ष से दूरी उन लोगों में गहरा असंतोष पैदा करती है, जो कभी इनके सक्रिय कार्यकर्ता रहे हैं।
संगठन के मूल उद्देश्य से विचलन
ऐसे समय में संघ प्रमुख से वैचारिक और संगठनात्मक प्रतिरोध के व्यापक अभियान की शुरुआत अपेक्षित है। इसके स्थान पर एलजीबीटी और समलैंगिकता जैसे विषयों पर उनके विस्तृत वक्तव्य सुनकर संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों में खीज और निराशा उत्पन्न होती है।
अंतिम प्रश्न यही है कि क्या इस पवित्र संगठन का मूल उद्देश्य कभी ऐसे विषयों पर केंद्रित होना था। यदि नहीं, तो संगठन को अपनी प्राथमिकताओं, संघर्ष की दिशा, सार्वजनिक भूमिका और धरातलीय सक्रियता पर तत्काल गंभीरता से पुनर्विचार करना चाहिए।

