Live in Relationship: आज के समय में लिव-इन रिलेशनशिप कोई नई बात नहीं है। कई लोग शादी किए बिना एक साथ रहते हैं।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल तब उठता है, जब इस रिश्ते में किसी बच्चे का जन्म होता है।
लोगों के मन में यह जानने की जिज्ञासा रहती है कि क्या ऐसे बच्चे को पिता का नाम मिलेगा? क्या उसका जन्म प्रमाण पत्र बन सकता है?
क्या उसे संपत्ति में हिस्सा मिलेगा? हाल ही में कर्नाटक हाई कोर्ट के एक फैसले ने इन सवालों का काफी हद तक जवाब दे दिया है।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा कि अगर मां चाहे तो बच्चे के नाम के साथ अपने परिवार का सरनेम जोड़ सकती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि बच्चे के रिकॉर्ड से उसके जैविक पिता का नाम हटा दिया जाएगा। पिता का नाम सरकारी रिकॉर्ड में पहले की तरह दर्ज रह सकता है।
अदालत ने कहा कि बच्चे की पहचान तय करते समय उसकी भलाई सबसे ज्यादा जरूरी है। इसलिए हर मामले को उसकी परिस्थितियों के अनुसार देखा जाना चाहिए।
क्या जन्म प्रमाण पत्र में पिता का नाम लिखा जा सकता है?
अगर बच्चे के जैविक पिता की जानकारी उपलब्ध है और जरूरी दस्तावेज मौजूद हैं, तो जन्म प्रमाण पत्र में पिता का नाम दर्ज किया जा सकता है।
वहीं अगर मां चाहती है कि बच्चे के नाम के साथ उसका सरनेम लिखा जाए, तो ऐसा भी किया जा सकता है।
अदालत का कहना है कि किसी बच्चे की पहचान केवल पिता के सरनेम से ही नहीं होती। मां की पहचान भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
क्या ऐसे बच्चों को कानूनी अधिकार मिलते हैं?
भारतीय कानून के अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप में जन्म लेने वाले बच्चे के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता।
सिर्फ इसलिए कि उसके माता-पिता की शादी नहीं हुई, उससे उसके अधिकार नहीं छीने जा सकते।
ऐसे बच्चों को पहचान का अधिकार, देखभाल का अधिकार और कानून के अनुसार अन्य जरूरी अधिकार मिलते हैं।
कुछ मामलों में उन्हें संपत्ति और विरासत से जुड़े अधिकार भी मिल सकते हैं। हालांकि, यह हर मामले की परिस्थितियों और कानून के आधार पर तय होता है।
मां का सरनेम भी लगाया जा सकता है
हाई कोर्ट ने साफ कहा कि बच्चे के नाम के साथ केवल पिता का सरनेम होना जरूरी नहीं है।
अगर मां बच्चे की परवरिश कर रही है और वही उसकी प्राकृतिक अभिभावक है, तो बच्चे के नाम के साथ मां का सरनेम भी जोड़ा जा सकता है।
इससे पिता के कानूनी अधिकार खत्म नहीं होते। यह फैसला सिर्फ बच्चे की पहचान और उसके हित को ध्यान में रखकर लिया जाता है।
कानून क्या कहता है?
जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के अनुसार, जरूरत पड़ने पर जन्म प्रमाण पत्र में कुछ बदलाव किए जा सकते हैं।
अगर बदलाव के लिए सही कारण और जरूरी दस्तावेज दिए जाएं, तो संबंधित अधिकारी रिकॉर्ड में संशोधन कर सकते हैं।
हालांकि, हर मामले का फैसला उसके तथ्यों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर किया जाता है।
बच्चे का हित सबसे जरूरी
भारतीय अदालतें कई बार कह चुकी हैं कि किसी भी मामले में सबसे पहले बच्चे के हित को देखा जाएगा।
बच्चे का भविष्य, उसकी पहचान और उसका सम्मान सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।
चाहे माता-पिता शादीशुदा हों या लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हों, बच्चे के अधिकारों की रक्षा करना कानून की जिम्मेदारी है।
किसी बच्चे को उसके माता-पिता के रिश्ते की वजह से कम नहीं आंका जा सकता।

