Thursday, June 18, 2026

International Sushi Day: सड़े चावल के जुगाड़ से लेकर सरकारी टैक्स बनने तक, जानें सुशी का हैरान करने वाला इतिहास

International Sushi Day: हर साल 18 जून को दुनिया भर में ‘इंटरनेशनल सुशी डे’ (International Sushi Day) मनाया जाता है। आज सुशी का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में जापान, वहां के महंगे रेस्तरां और चावल पर लिपटी चमकीली मछली की तस्वीर आ जाती है।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज दुनिया भर के लोगों का दिल जीतने वाली यह सुशी, सदियों पहले जापान में टैक्स (कर) चुकाने का एक माध्यम थी? जी हां, एक दौर ऐसा भी था जब लोग पैसों की जगह सरकार को सुशी देकर अपना टैक्स भरते थे।

आइए जानते हैं कि कैसे एक मजबूरी में शुरू हुआ यह सफर आज एक ग्लोबल बिजनेस बन चुका है।

शुरुआत: स्वाद के लिए नहीं, बल्कि मछली को सड़ने से बचाने का था ‘जुगाड़’

International Sushi Day: फूड हिस्टोरियन (खाद्य इतिहासकार) रेनी मार्टन ने अपनी किताब “राइस: ए ग्लोबल हिस्ट्री” में बताया है कि सुशी की शुरुआत जापान में नहीं, बल्कि दूसरी शताब्दी ईस्वी में मेकांग नदी के आसपास के इलाकों (आज के चीन, लाओस और थाईलैंड) में हुई थी।

उस ज़माने में फ्रिज नहीं होते थे, इसलिए मछली को लंबे समय तक ताजा रखना एक बड़ी चुनौती थी। लोगों ने इसका एक तरीका निकाला:

वे कच्ची मछली पर नमक लगाकर उसे पके हुए चावल की परतों के बीच दबाकर रख देते थे।

इसके बाद इसे महीनों के लिए एक डिब्बे में बंद कर दिया जाता था।

चावल के सड़ने (किण्वन/Fermentation) से एक खास तरह का एसिड बनता था, जो मछली को खराब होने से बचाता था।

दिलचस्प बात यह है कि जब लोग इसे खाते थे, तो खट्टे और गीले चावल को फेंक देते थे और सिर्फ मछली खाते थे। इस पूरी प्रक्रिया में बहुत समय और मेहनत लगती थी, इसलिए यह काफी महंगी पड़ती थी और इसका आनंद सिर्फ अमीर लोग ही ले पाते थे।

जब सुशी पहुंची जापान और बदल गए नियम

International Sushi Day: सातवीं शताब्दी के आसपास, खाना सुरक्षित रखने की यह तकनीक चीन से होते हुए जापान पहुंची। जापानियों ने इस तरीके को सिर्फ अपनाया ही नहीं, बल्कि इसमें एक बड़ा बदलाव किया।

जापान के लोगों ने चावल को फेंकने के बजाय, मछली के साथ चावल को भी खाना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे इसकी मांग बढ़ी, लोगों ने मछली को महीनों तक दबाकर रखने का समय कम कर दिया। इससे चावल का स्वाद भी अच्छा रहता था और मछली भी ताज़ा लगती थी। सुशी के इस शुरुआती रूप को ‘नारेज़ुशी’ कहा गया।

पैसों की जगह सुशी से भरते थे टैक्स!

जैसे-जैसे नारेज़ुशी जापान में मशहूर हुई, इसकी कीमत और अहमियत बहुत बढ़ गई। जापान के ‘नारा काल’ (718 ईस्वी) के सरकारी रिकॉर्ड से पता चलता है कि वहां की सरकार टैक्स के रूप में सुशी स्वीकार करती थी।

किताब के अनुसार:

“सन 718 में, सुशी को सरकार द्वारा टैक्स चुकाने के एक कानूनी माध्यम के रूप में मान्यता दी गई थी।”

इसकी दो बड़ी वजहें थीं:

बिना फ्रिज का फ्रिज: उस ज़माने में ऐसा खाना जो महीनों तक खराब न हो, उसकी कीमत सोने-चांदी जैसी होती थी।

चावल की ताकत: प्राचीन जापान में चावल सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं था, बल्कि इसे अमीरी और पैसे की तरह देखा जाता था।

17वीं शताब्दी का वो आविष्कार, जिसने सब बदल दिया

सदियों तक सुशी बनाने के लिए हफ्तों या महीनों का इंतज़ार करना पड़ता था। लेकिन 17वीं शताब्दी की शुरुआत में एक क्रांतिकारी बदलाव आया, चावल के सिरके (Rice Vinegar) का इस्तेमाल।

शेफ्स ने महसूस किया कि महीनों तक चावल को सड़ाने की जगह, अगर ताज़ा उबले चावल में थोड़ा सा चावल का सिरका मिला दिया जाए, तो वही खट्टा और चटपटा स्वाद तुरंत मिल जाता है।

इस एक आइडिया ने सुशी की दुनिया बदल दी:

अब सुशी बनने में महीनों नहीं, बल्कि कुछ मिनट लगने लगे।

इसी के बाद ‘निगिरी सुशी’ (हाथ से दबाए चावल पर कच्ची मछली) का जन्म हुआ, जो आज सबसे ज्यादा पॉपुलर है।

जो सुशी कभी सिर्फ अमीरों की थाली में सजती थी, वह अब सड़कों पर काम करने वाले मजदूरों और व्यापारियों का ‘फास्ट फूड’ बन गई, ठीक वैसे ही जैसे आज हम बर्गर या सैंडविच खाते हैं।

जापान से निकलकर पूरी दुनिया पर राज

दूसरे विश्व युद्ध के बाद, साफ-सफाई के कड़े नियमों के कारण सुशी सड़कों के स्टॉल से निकलकर आलीशान रेस्तरां में पहुंच गई। इसके बाद इसने पूरी दुनिया का रुख किया।

दुनिया के अलग-अलग देशों में जाकर सुशी का रूप वहां के हिसाब से बदल गया:

अमेरिका: अमेरिकियों को लुभाने के लिए शेफ ने ‘कैलिफ़ोर्निया रोल’ बनाया, जिसमें समुद्री घास (Seaweed) को अंदर छिपाकर एवोकाडो का इस्तेमाल किया गया।

ब्राजील: ब्राजील के साओ पाउलो में जापान के बाहर सबसे बड़ा जापानी समुदाय रहता है। वहां के लोग सुशी में आम, स्ट्रॉबेरी और यहाँ तक कि कच्चे बीफ (गोमांस) का इस्तेमाल करते हैं। वहां हर महीने करीब 1.7 करोड़ सुशी मील खाए जाते हैं।

आज का दौर: तकनीक और परंपरा का मेल

आज सुशी को हर आम इंसान तक पहुंचाने में तकनीक ने बड़ी भूमिका निभाई है। अब सुशी बनाने के लिए रोबोटिक मशीनें, जमी हुई मछली (Frozen Fish) को फ्रेश रखने की तकनीक और आधुनिक तरीके आ चुके हैं, जिससे इसकी कीमतें काफी कम हो गई हैं।

मेकांग नदी के किनारे मछली बचाने के एक साधारण देसी नुस्खे के रूप में शुरू हुआ यह सफर, आज दुनिया का सबसे बड़ा फूड ट्रेंड बन चुका है। सुशी का इतिहास हमें सिखाता है कि कैसे वक्त के साथ जरूरत, स्वाद और संस्कृति मिलकर इतिहास रच देते हैं।

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