बांग्लादेश हिंसा: बांग्लादेश में मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ती हिंसा को लेकर निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बार फिर बेबाक टिप्पणी की है।
सोशल मीडिया पर दिए गए अपने बयान में उन्होंने बांग्लादेशी समाज में उभर रही कट्टर सोच को लेकर गहरी चिंता जताई है।
तसलीमा नसरीन के मुताबिक, बांग्लादेश में आज जिहाद के दो अलग-अलग चेहरे दिखाई देते हैं, लेकिन दोनों की दिशा, मानसिकता और लक्ष्य लगभग एक जैसे हैं।
बांग्लादेश हिंसा: भारत के खिलाफ साजिश
उन्होंने लिखा कि एक वर्ग ऐसा है जो दाढ़ी, टोपी और पारंपरिक धार्मिक वेशभूषा में मदरसों से शिक्षित दिखता है, जबकि दूसरा वर्ग पश्चिमी कपड़ों में, विश्वविद्यालय की डिग्रियों के साथ सामने आता है।
बाहरी रूप और जीवनशैली भले ही अलग हो, लेकिन दोनों वर्गों की सोच एक जैसी बताई जाती है।
तसलीमा नसरीन का दावा है कि इन दोनों धड़ों में भारत के प्रति शत्रुता एक साझा तत्व है और उनका सपना पाकिस्तान के साथ खड़े होकर टकराव की राजनीति को आगे बढ़ाने का है।
पूरी आबादी को जिहादी या कट्टर कहना गलत- नसरीन
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बांग्लादेश की पूरी आबादी को जिहादी या कट्टर कहना गलत होगा।
आज भी बांग्लादेश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग मौजूद हैं जो स्वतंत्र सोच, प्रगतिशील विचारधारा, मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में विश्वास रखते हैं।
तसलीमा नसरीन के अनुसार, यही वर्ग बांग्लादेश के लिए उम्मीद की किरण है और इसी के चलते देश के पास अब भी खुद को एक आधुनिक, सभ्य और गैर-सांप्रदायिक राष्ट्र के रूप में दोबारा गढ़ने का अवसर मौजूद है।
भारत-बांग्लादेश के रिश्ते खराब, फायदा कट्टरपंथी ताकतों को
अपने बयान में तसलीमा नसरीन ने भारत और बांग्लादेश के सांस्कृतिक रिश्तों पर विशेष जोर दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संपर्क टूटते हैं, तो इसका सबसे बड़ा फायदा कट्टरपंथी ताकतों को मिलेगा।
जब भाषा, साहित्य, संगीत, कला और खेल के जरिए संवाद खत्म होता है, तब नफरत और हिंसा के लिए जमीन तैयार हो जाती है।
ऐसे माहौल में जिहादी सोच तेजी से पनपती है और समाज को अंदर से खोखला कर देती है।
नफरत का जवाब नफरत से नहीं
तसलीमा नसरीन ने साफ शब्दों में कहा कि नफरत का जवाब नफरत से नहीं दिया जाना चाहिए। हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकती।
शांति, संवाद और सांस्कृतिक निरंतरता ही भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए बेहतर भविष्य की कुंजी है। उन्होंने अपील की कि राजनीति और टकराव का असर खेल, कला और संस्कृति पर नहीं पड़ना चाहिए।
उनके मुताबिक, क्रिकेट चलता रहना चाहिए, रंगमंच और सिनेमा जीवित रहने चाहिए, संगीत, पहनावा और फैशन का आदान-प्रदान बना रहना चाहिए और पुस्तक मेलों जैसी गतिविधियां बंद नहीं होनी चाहिए।
इन सांस्कृतिक पुलों को तोड़ने से शायद भारत को कोई बड़ा नुकसान न हो, लेकिन इसका सबसे गहरा असर खुद बांग्लादेश पर पड़ेगा, जहां कट्टरता और अलगाव और मजबूत हो सकता है।
लज्जा बुक लिखने के बाद अंडरग्राउंड
बता दें कि तसलीमा नसरीन वही लेखिका हैं जिन्हें अपनी चर्चित पुस्तक ‘लज्जा’ लिखने के बाद कट्टरपंथी धमकियों का सामना करना पड़ा था और लंबे समय तक उन्हें बांग्लादेश में भूमिगत रहना पड़ा।
आज भी निर्वासन में रहकर वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और मानवाधिकारों की आवाज उठाती रही हैं।
अपने संदेश के अंत में तसलीमा नसरीन ने लिखा कि अगर बांग्लादेश नफरत और टकराव का रास्ता चुनता है, तो कट्टरता मजबूत होगी,
लेकिन अगर सांस्कृतिक रिश्तों, संवाद और सह-अस्तित्व को बचाया गया, तो बांग्लादेश के लिए एक समावेशी, शांतिपूर्ण और प्रगतिशील भविष्य संभव है, जहां युद्ध नहीं बल्कि क्षेत्रीय शांति को प्राथमिकता दी जाएगी।

