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राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा पिछले दो वर्षों में तैयार की गई अंग्रेजी भाषा की पुस्तकों में राष्ट्रभाव, सैनिकों के सम्मान, योग, राष्ट्रीय स्मारकों और भारत की सांस्कृतिक एकता को जगह देना शिक्षा जगत में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा सकता है।
कक्षा 6 की अंग्रेजी पुस्तक पूर्वी में शामिल नेशनल वॉर मेमोरियल कविता बच्चों को भारत के वीर सैनिकों के बलिदान और राष्ट्रीय स्मृति से परिचित कराती है। इस प्रकार की सामग्री अंग्रेजी सीखने को केवल भाषा अभ्यास तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे नागरिक चेतना से जोड़ती है।
भाषा शिक्षा में भारतीय संदर्भ की मजबूत उपस्थिति
अब तक अंग्रेजी शिक्षण में बच्चों को प्रायः विदेशी या दूरस्थ सामाजिक संदर्भों वाली सामग्री पढ़ाई जाती रही है। नई पुस्तकों में भारत के अपने प्रतीक, अपनी स्मृतियाँ, अपने राष्ट्रीय स्थल और अपनी सांस्कृतिक धारा को शामिल करना भारतीय विद्यार्थियों के लिए अधिक आत्मीय और उपयोगी कदम है।
कक्षा 6, 7, 8 की पूर्वी और कक्षा 9 की कावेरी जैसी पुस्तकों में योग, एक भारत श्रेष्ठ भारत, सैनिकों के सम्मान और राष्ट्रीय स्मारकों से जुड़ी सामग्री का समावेश विद्यार्थियों को अपने देश की विविधता और राष्ट्रीय एकात्मता से परिचित कराता है।
सैनिकों के सम्मान को सैन्यवाद कहना उचित नहीं
सैनिकों के शौर्य, बलिदान और कर्तव्यनिष्ठा को बच्चों की पुस्तकों में स्थान देना सैन्यवाद नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता का संस्कार है। जिस समाज के बच्चे अपने रक्षकों को सम्मान देना सीखते हैं, वहाँ जिम्मेदार नागरिकता की भावना अधिक मजबूत होती है।
मेजर सोमनाथ शर्मा जैसे वीरों का उल्लेख बच्चों को केवल युद्ध की जानकारी नहीं देता, बल्कि कर्तव्य, साहस, अनुशासन और आत्मबलिदान जैसे मूल्यों से जोड़ता है। ऐसे प्रसंग भाषा शिक्षण के भीतर चरित्र निर्माण की भूमिका भी निभाते हैं।
लेखक अज्ञात होने से सामग्री का महत्व कम नहीं होता
कुछ पाठों या कविताओं में लेखक का नाम न होना अपने आप में उनकी उपयोगिता को कम नहीं करता। विद्यालयी पुस्तकों में कई बार शिक्षण उद्देश्य के अनुसार सामग्री तैयार की जाती है, ताकि बच्चों की आयु, भाषा क्षमता और पाठ्यक्रम की आवश्यकता के अनुसार पाठ सरल और प्रभावी बन सके।
भाषा पुस्तक में केवल प्रसिद्ध लेखकों की रचनाएँ ही उपयोगी हों, यह दृष्टि सीमित है। शिक्षण दल द्वारा तैयार पाठ भी विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो सकते हैं, यदि उनमें भाषा अभ्यास, विचार, मूल्य और संदर्भ को संतुलित ढंग से रखा गया हो।
2005 की नीति अंतिम सत्य नहीं हो सकती
वर्ष 2005 में पाठ्यपुस्तक निर्माण को लेकर जो दृष्टिकोण अपनाया गया था, वह अपने समय के लिए उपयोगी रहा होगा। लेकिन शिक्षा का स्वरूप स्थिर नहीं रहता। समाज, राष्ट्र, पाठ्यक्रम और विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुसार पुस्तकों में बदलाव स्वाभाविक और आवश्यक है।
यदि पहले समिति सदस्यों द्वारा लिखित सामग्री से बचने का निर्णय लिया गया था, तो इसका अर्थ यह नहीं कि भविष्य में ऐसी सामग्री कभी उपयोगी नहीं हो सकती। नई राष्ट्रीय शिक्षा दृष्टि भारत केंद्रित शिक्षा, अनुभव आधारित सीखने और सांस्कृतिक जुड़ाव को महत्व देती है।
साहित्यिक मूल्य और राष्ट्रीय मूल्य साथ चल सकते हैं
यह कहना उचित नहीं कि राष्ट्र, सैनिक, योग या सरकारी कार्यक्रमों से जुड़ा पाठ साहित्यिक मूल्य से रहित ही होगा। साहित्य केवल कल्पना और सौंदर्य तक सीमित नहीं है। वह समाज, इतिहास, स्मृति, संघर्ष और राष्ट्रीय चेतना को भी अभिव्यक्त करता है।
बच्चों के लिए लिखे गए पाठों में भाषा की सरलता, भाव की स्पष्टता और मूल्य की उपस्थिति आवश्यक होती है। यदि कोई कविता या कहानी बच्चों को नए शब्द, विचार, संवेदना और राष्ट्रीय बोध देती है, तो वह शैक्षिक दृष्टि से सार्थक कही जाएगी।
अंग्रेजी सीखने में भारतीय विषयों का लाभ
भारतीय बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिए भारतीय विषयों का उपयोग अधिक स्वाभाविक है। जब विद्यार्थी नेशनल वॉर मेमोरियल, योग, एक भारत श्रेष्ठ भारत या सैनिकों के सम्मान जैसे परिचित संदर्भों पर अंग्रेजी पढ़ते हैं, तो भाषा सीखना अधिक सहज हो जाता है।
विदेशी संदर्भों पर आधारित पाठ कई बार बच्चों के लिए भावनात्मक रूप से दूर हो जाते हैं। इसके विपरीत, भारतीय परिवेश से जुड़ी सामग्री बच्चों को भाषा, भावना और विचार के स्तर पर अधिक सक्रिय भागीदारी का अवसर देती है।
राष्ट्रीय कार्यक्रमों की जानकारी भी शिक्षा का हिस्सा
यदि पुस्तकों में सरकारी कार्यक्रमों या राष्ट्रीय परियोजनाओं का उल्लेख आता है, तो उसे केवल प्रचार कहकर खारिज करना उचित नहीं। विद्यालयी शिक्षा का एक उद्देश्य विद्यार्थियों को देश में चल रहे बड़े सार्वजनिक प्रयासों, संस्थानों और राष्ट्रीय पहलों से परिचित कराना भी है।
बच्चों को यह जानना चाहिए कि देश में कौन से स्मारक बने हैं, कौन सी राष्ट्रीय योजनाएँ समाज को जोड़ती हैं और किन प्रतीकों से नागरिक जीवन प्रभावित होता है। ऐसी जानकारी उनके सामान्य ज्ञान और सार्वजनिक चेतना दोनों को मजबूत करती है।
कठिन भाषा की चिंता का समाधान शिक्षण से संभव
यह तर्क दिया गया है कि 10 से 14 वर्ष के बच्चे कुछ पाठों की भाषा से जुड़ नहीं पाएँगे। लेकिन भाषा शिक्षा का उद्देश्य केवल पहले से समझ आने वाली सामग्री देना नहीं है, बल्कि नए शब्द, नए विचार और नई अभिव्यक्तियाँ सिखाना भी है।
यदि किसी पाठ में अपेक्षाकृत गंभीर शब्दावली है, तो शिक्षक अभ्यास, चर्चा, प्रश्न और गतिविधियों के माध्यम से उसे सरल बना सकते हैं। कठिनाई को पाठ की कमजोरी मानने के बजाय उसे भाषा विकास के अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है।
आलोचनात्मक सोच राष्ट्रभाव से विरोधी नहीं
यह धारणा भी अधूरी है कि राष्ट्रभाव से जुड़ी सामग्री बच्चों की आलोचनात्मक सोच को रोकती है। सही शिक्षण पद्धति अपनाई जाए तो सैनिकों के जीवन, राष्ट्रीय स्मारकों, योग या एक भारत श्रेष्ठ भारत जैसे विषयों पर गंभीर चर्चा कराई जा सकती है।
विद्यार्थी इन पाठों के माध्यम से साहस, कर्तव्य, विविधता, एकता, स्मृति, राष्ट्रीय पहचान और नागरिक दायित्व पर विचार कर सकते हैं। यह आलोचनात्मक सोच को रोकने के बजाय उसे भारतीय संदर्भ में विकसित करने का अवसर देता है।
नई पुस्तकों में भारत केंद्रित शिक्षा की झलक
नई अंग्रेजी पुस्तकों में ब्रिटिश, अमेरिकी और भारतीय लेखकों की रचनाओं के साथ भारतीय विषय आधारित पाठों का मिश्रण एक संतुलित दिशा की ओर संकेत करता है। इससे विद्यार्थी वैश्विक साहित्य से भी परिचित होते हैं और अपने राष्ट्रीय परिवेश से भी जुड़े रहते हैं।
विद्यालयी अंग्रेजी शिक्षा को केवल औपनिवेशिक विरासत या विदेशी साहित्य तक सीमित रखना उचित नहीं। अंग्रेजी भाषा के माध्यम से भारत की सभ्यता, संस्कृति, शौर्य, सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय स्मृतियों को पढ़ाना आत्मविश्वासी शिक्षा व्यवस्था का संकेत है।
NCERT का प्रयास सराहनीय दिशा में कदम
NCERT द्वारा तैयार नई पुस्तकों में सैनिकों के सम्मान, राष्ट्रीय स्मारकों, योग और भारतीय एकता को शामिल करना बच्चों के भीतर भाषा कौशल के साथ देशबोध विकसित करने का प्रयास है। यह बदलाव भारतीय शिक्षा को अपनी जड़ों से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
ऐसी सामग्री को सैन्यवाद या कृत्रिम राष्ट्रवाद कहने के बजाय इसे भारत केंद्रित शैक्षिक पुनर्संतुलन के रूप में समझना चाहिए। बच्चे जब अंग्रेजी पढ़ते हुए अपने देश, अपने वीरों और अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझते हैं, तो शिक्षा अधिक जीवंत और सार्थक बनती है।

