एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का गहराता खतरा
भारत में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस आने वाले पाँच से दस वर्षों में बड़े स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकता है। सामान्य बीमारियों में भारी एंटीबायोटिक, स्टेरॉयड और गंभीर दवाओं के अनियंत्रित इस्तेमाल ने ऐसी जमीन तैयार कर दी है, जहाँ इलाज धीरे धीरे कठिन होता जा रहा है।
देश के अस्पतालों में अब ऐसे मरीज बढ़ रहे हैं, जिनमें संक्रमण शरीर के भीतर काफी फैल चुका होता है और सामान्य एंटीबायोटिक असर ही नहीं करतीं।
चेस्ट इंफेक्शन जैसे मामलों में भी स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि जब कल्चर रिपोर्ट सामने आती है तो पता चलता है कि शरीर एंटीबायोटिक रेसिस्टेंट हो चुका है और कोई दवाई काम ही नहीं कर रही है।
सामान्य बीमारी में भारी एंटीबायोटिक का चलन
सामान्य जुकाम, खांसी और हल्के वायरल संक्रमण में भी आज कई जगह लाइनजोलिड जैसी उच्च श्रेणी की एंटीबायोटिक दी जा रही है। यह प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है, क्योंकि ऐसी दवाएँ साधारण बीमारी के लिए नहीं, विशेष और गंभीर संक्रमणों के लिए होती हैं।
समस्या यहीं तक सीमित नहीं है। कई जगह फेरोपेनेम जैसी भारी दवाएँ भी लंबे समय तक चलती रहती हैं। जब ऐसी दवाएँ बिना ठोस कारण दी जाती हैं, तो शरीर के भीतर बैक्टीरिया धीरे धीरे दवाओं के विरुद्ध मजबूत होने लगते हैं।
कल्चर रिपोर्ट में सामने आती गंभीर स्थिति
जब मरीज की हालत बिगड़ने के बाद कल्चर रिपोर्ट कराई जाती है, तब कई बार पता चलता है कि उपलब्ध एंटीबायोटिक दवाओं का असर बहुत सीमित रह गया है। यह स्थिति बताती है कि दवाओं का गलत इस्तेमाल केवल तत्काल बीमारी नहीं, भविष्य का इलाज भी बिगाड़ रहा है।
कई मामलों में मरीज की पुरानी दवा हिस्ट्री देखकर साफ दिखता है कि सामान्य बीमारियों में भी लगातार भारी एंटीबायोटिक दी गईं। यही आदत आगे चलकर ऐसी स्थिति बना देती है, जहाँ वास्तविक गंभीर संक्रमण के समय डॉक्टरों के पास प्रभावी विकल्प कम पड़ने लगते हैं।
जुकाम खांसी में एंटीबायोटिक की जरूरत नहीं
सामान्य जुकाम और खांसी अधिकतर वायरल प्रकृति की बीमारियाँ होती हैं। ऐसी स्थितियों में एंटीबायोटिक की कोई सीधी भूमिका नहीं होती, जब तक अलग से कोई बैक्टीरियल संक्रमण, गंभीर जटिलता या चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित कारण मौजूद न हो।
इसके बावजूद समाज में यह धारणा फैल चुकी है कि खांसी, गला खराब, बुखार, कमजोरी या शरीर दर्द में एंटीबायोटिक लेना सामान्य बात है। यही सोच एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को बढ़ा रही है और भविष्य में साधारण संक्रमणों को भी खतरनाक बना सकती है।
डॉक्टरों की भूमिका पर भी सवाल
एंटीबायोटिक के दुरुपयोग में केवल मरीज या दुकानदार जिम्मेदार नहीं हैं। कई बार डॉक्टर भी एंटीबायोटिक ऐसे लिख देते हैं, जैसे वह कोई सामान्य खाने पीने की वस्तु हो। इससे समाज में दवाओं को लेकर गलत भरोसा और गलत आदत दोनों बनती हैं।
जब डॉक्टर छोटी बीमारी में भी भारी दवा लिखते हैं, तो मरीज यह मान लेता है कि हर सर्दी, खांसी और बुखार में एंटीबायोटिक जरूरी है। बाद में वही मरीज पुरानी पर्ची देखकर अपने स्तर पर दवा शुरू कर देता है।
पुरानी पर्ची से इलाज का खतरा
आज एक बड़ा संकट पुरानी पर्ची दोहराने की आदत है। किसी मरीज को पिछली बार सेफपोडोक्सिम दी गई थी, तो अगली बार भी वही दवा शुरू कर दी जाती है। यह भूल खतरनाक है कि बीमारी की प्रकृति हर बार अलग हो सकती है।
डॉक्टर ने किसी विशेष समय पर दवा मरीज की उस समय की स्थिति देखकर लिखी थी। इसका अर्थ यह नहीं कि वही दवा हर बार काम करेगी। संक्रमण, उम्र, वजन, एलर्जी, पुरानी बीमारी और शरीर की प्रतिक्रिया हर बार अलग मूल्यांकन मांगती है।
फीस बचाने की छोटी सोच बड़ा नुकसान
कई परिवार डॉक्टर की छोटी फीस बचाने के लिए सीधे पुरानी दवा या अनुमान आधारित उपचार शुरू कर देते हैं। तत्काल आर्थिक बचत दिखती है, लेकिन गलत एंटीबायोटिक, गलत डोज और गलत अवधि शरीर को लंबे समय के लिए नुकसान पहुँचा सकती है।
बच्चों के मामले में यह लापरवाही और गंभीर हो जाती है। थोड़ी फीस बचाने के लिए बच्चे को गलत दवा देना उसके पाचन, प्रतिरक्षा, आंतों की स्थिति और भविष्य में संक्रमण से लड़ने की क्षमता पर गहरा असर डाल सकता है।
बच्चों में वायरल डायरिया और गलत दवा
बच्चों के वायरल डायरिया में सामान्यतः जिंक और ओआरएस सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे मामलों में शरीर में पानी और लवण की कमी रोकना मुख्य लक्ष्य होता है। हर दस्त या पेट खराब होने की स्थिति में एंटीबायोटिक जरूरी नहीं होती।
इसके बावजूद कई जगह बच्चों को कोलिस्टिन सल्फेट जैसी दवाएँ पिलाई जा रही हैं। यह प्रवृत्ति खतरनाक है, क्योंकि भारी एंटीबायोटिक का अनावश्यक प्रयोग बच्चों की कोमल शारीरिक प्रणाली को प्रभावित कर सकता है और भविष्य में दवा प्रतिरोध बढ़ा सकता है।
एजिथ्रोमाइसिन और लिवोफ्लोक्स का सामान्यीकरण
एक समय एजिथ्रोमाइसिन और लिवोफ्लोक्स जैसी दवाएँ प्रीमियम श्रेणी की मानी जाती थीं। इनका प्रयोग सीमित और विशेष परिस्थितियों में होता था। अब स्थिति यह है कि सामान्य सिरदर्द, हल्की बेचैनी या सामान्य बुखार में भी लोग एजिथ्रोमाइसिन लेने लगे हैं।
जब उच्च श्रेणी की दवाएँ सामान्य शिकायतों में इस्तेमाल होने लगती हैं, तो उनका प्रभाव धीरे धीरे घटने लगता है। बैक्टीरिया उनके विरुद्ध प्रतिरोध विकसित करते हैं और भविष्य में जब मरीज को सचमुच उनकी जरूरत होती है, तब दवा बेअसर हो सकती है।
फार्मेसी व्यवस्था की गिरती गंभीरता
फार्मेसी व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। कई जगह दवा देना केवल दवा का नाम पहचानने तक सीमित रह गया है। बीमारी की प्रकृति, शरीर की स्थिति, जांच रिपोर्ट, दवा की शक्ति और दुष्प्रभाव को समझे बिना उपचार शुरू कर दिया जाता है।
फार्मेसी शिक्षा की गुणवत्ता पर भी चिंता बढ़ रही है। डिग्री का अर्थ केवल प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि दवा विज्ञान की जिम्मेदारी है। जब यह जिम्मेदारी कमजोर होती है, तो दवा राहत देने के बजाय शरीर के लिए नया जोखिम बन जाती है।
एक्ने में बेटनोवेट का अंधाधुंध इस्तेमाल
दवाओं का दुरुपयोग केवल एंटीबायोटिक तक सीमित नहीं है। चेहरे पर एक्ने, दाने या त्वचा की छोटी समस्या होते ही बेटनोवेट जैसी क्रीम लगा दी जाती है। सुंदरता, गोरेपन या तुरंत राहत के नाम पर ऐसी दवाओं का उपयोग गंभीर नुकसान दे सकता है।
स्टेरॉयड युक्त क्रीम का गलत इस्तेमाल त्वचा को पतला कर सकता है, संक्रमण बढ़ा सकता है और चेहरे की प्राकृतिक संरचना बिगाड़ सकता है। कुछ समय की चमक या राहत बाद में लम्बे इलाज वाली त्वचा बीमारी में बदल सकती है।
घुटनों के दर्द में मेथोट्रेक्सेट जैसी गंभीर दवा
घुटनों के दर्द या सामान्य जोड़ दर्द में भी कई जगह मेथोट्रेक्सेट जैसी गंभीर दवा दे दी जाती है। यह सामान्य दर्द निवारक दवा नहीं है, बल्कि एंटीमेटाबोलाइट श्रेणी की दवा है, जिसका प्रयोग विशेष परिस्थितियों में विशेषज्ञ निगरानी में किया जाता है।
बिना जांच और स्पष्ट निदान के ऐसी दवा देना खतरनाक हो सकता है। इसका असर लिवर, रक्त कोशिकाओं, प्रतिरक्षा प्रणाली और शरीर की अन्य महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं पर पड़ सकता है। दर्द दबाने की जल्दबाजी मरीज को बड़े खतरे में डाल सकती है।
स्टेरॉयड का अनियंत्रित प्रयोग
स्टेरॉयड का अनियंत्रित प्रयोग भी समाज में तेजी से फैलता संकट है। बिना जरूरत स्टेरॉयड लेने से प्रतिरक्षा प्रणाली, शुगर स्तर, रक्तचाप, हार्मोन संतुलन और शरीर की आंतरिक प्रक्रियाओं पर असर पड़ सकता है। इसकी डोज विशेषज्ञ ही तय कर सकता है।
त्वचा की समस्या, एलर्जी, सूजन या दर्द में डिफ्लाजाकोर्ट जैसी दवा मन से शुरू कर दी जाती है। यह सोच गलत है कि पिछली बार डॉक्टर ने दवा दी थी, इसलिए इस बार भी वही दवा सही रहेगी।
पिछली दवा हर बार सही नहीं होती
किसी भी दवा का प्रभाव उस समय की बीमारी, शरीर की स्थिति और जांच पर निर्भर करता है। डॉक्टर ने किसी परिस्थिति में कोई दवा लिखी, इसका मतलब यह नहीं कि वह दवा हर भविष्य की बीमारी में भी उपयोगी और सुरक्षित रहेगी।
हर बार बीमारी का कारण बदल सकता है। वायरल संक्रमण, बैक्टीरियल संक्रमण, एलर्जी, सूजन, कमजोरी और दर्द के कारण अलग अलग हो सकते हैं। एक ही दवा को हर समस्या में लगाना उपचार नहीं, बल्कि शरीर के साथ जोखिम भरा प्रयोग है।
कार्डियक अरेस्ट और हार्ट अटैक की चिंता
आज कार्डियक अरेस्ट और हार्ट अटैक की बढ़ती घटनाओं को लेकर समाज में चिंता है। इनके पीछे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन दवाओं का गलत और अनियंत्रित इस्तेमाल भी शरीर पर गंभीर दबाव डाल सकता है, विशेषकर स्टेरॉयड और भारी दवाएँ।
बिना जरूरत दवा लेना, डोज का ज्ञान न होना और बीमारी को अनुमान के भरोसे चलाना खतरनाक है। तत्काल राहत कभी कभी भीतर चल रहे नुकसान को छिपा देती है और बाद में हृदय, लिवर, किडनी तथा शुगर नियंत्रण प्रभावित हो सकते हैं।
बीपी और शुगर की दवाओं में मनमानी
बीपी और शुगर जैसी गंभीर बीमारियों में भी कई जगह मनमाने ढंग से दवाएँ शुरू कर दी जाती हैं। जबकि इन रोगों में नियमित जांच, सही डोज, शरीर की प्रतिक्रिया, जीवनशैली और लंबे समय तक चिकित्सकीय निगरानी अत्यंत आवश्यक होती है।
इन दवाओं का गलत चुनाव मरीज को गंभीर खतरे में डाल सकता है। बीपी बहुत कम या बहुत अधिक हो सकता है, शुगर अनियंत्रित हो सकती है और शरीर के महत्वपूर्ण अंग प्रभावित हो सकते हैं। ऐसी बीमारियों में अनुमान आधारित इलाज जानलेवा हो सकता है।
जांच रिपोर्ट समझे बिना उपचार
कई जगह बीमारी की बुनियादी जांच रिपोर्ट भी ठीक से समझे बिना दवाएँ शुरू कर दी जाती हैं। सीबीसी जैसी सामान्य रिपोर्ट को भी सही ढंग से पढ़ना चिकित्सा समझ की मांग करता है। रिपोर्ट, लक्षण और मरीज की स्थिति को साथ देखना पड़ता है।
रिपोर्ट समझे बिना दवा देना मरीज के शरीर को प्रयोगशाला बनाने जैसा है। बीमारी का कारण कुछ और हो सकता है और दवा किसी दूसरी दिशा में दी जा सकती है। ऐसी गलती बीमारी को दबाने के बजाय और जटिल बना सकती है।
झोलाछाप इलाज का फैलता खतरा
झोलाछाप इलाज ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। बिना पर्याप्त योग्यता और वैज्ञानिक प्रशिक्षण के बीपी, शुगर, संक्रमण, दर्द, त्वचा रोग और बच्चों की बीमारी तक का उपचार किया जा रहा है। यह स्थिति मरीजों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है।
जब इलाज करने वाले व्यक्ति को दवा की शक्ति, दुष्प्रभाव, जांच रिपोर्ट और बीमारी की प्रकृति का सही ज्ञान नहीं होता, तब मरीज की स्थिति बिगड़ सकती है। छोटी बीमारी भारी दवाओं के कारण बड़ी चिकित्सा समस्या में बदल सकती है।
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस समाज का संकट
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस केवल किसी एक मरीज की निजी समस्या नहीं है। जब समाज में दवाओं का गलत और अत्यधिक प्रयोग होता है, तो बैक्टीरिया दवाओं के विरुद्ध मजबूत होते जाते हैं। इसका असर पूरे समुदाय और स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ता है।
यदि यही प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले वर्षों में सामान्य संक्रमण भी जानलेवा हो सकते हैं। अस्पतालों में ऐसे मरीज बढ़ सकते हैं, जिन पर उपलब्ध एंटीबायोटिक काम न करें। यह परिवारों, डॉक्टरों और स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती होगी।
दवा को सामान्य वस्तु समझना बंद करना होगा
एंटीबायोटिक, स्टेरॉयड, मेथोट्रेक्सेट, कोलिस्टिन सल्फेट, लाइनजोलिड, फेरोपेनेम, एजिथ्रोमाइसिन, लिवोफ्लोक्स, सेफपोडोक्सिम और डिफ्लाजाकोर्ट जैसी दवाएँ सामान्य वस्तुएँ नहीं हैं। इनका गलत इस्तेमाल शरीर को तत्काल और भविष्य दोनों स्तरों पर नुकसान पहुँचा सकता है।
दवा का नाम सुनकर, पुरानी पर्ची देखकर या किसी के कहने पर उपचार शुरू करना खतरनाक है। हर दवा का अपना कारण, समय, मात्रा, अवधि और निगरानी होती है। यह समझ समाज में विकसित किए बिना एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस रोकना कठिन होगा।
इलाज की संस्कृति बदलनी होगी
भारत को इस संकट से बचाना है तो इलाज की संस्कृति बदलनी होगी। सामान्य जुकाम, खांसी, वायरल बुखार, वायरल डायरिया, त्वचा समस्या, दर्द, बीपी और शुगर जैसी स्थितियों में अनुमान आधारित दवा लेने की आदत तुरंत रोकनी होगी।
सही जांच, सही डॉक्टर, सही डोज और सही अवधि ही सुरक्षित उपचार की बुनियाद हैं। छोटी बीमारी में भारी दवा लेने की आदत आज राहत दे सकती है, लेकिन कल वही आदत शरीर को ऐसी स्थिति में पहुँचा सकती है जहाँ दवा काम न करे।

