Patna High Court Verdict: भारत में महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ अपराध लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं। ऐसे समय में जब समाज पीड़िताओं के लिए कठोर कानून और त्वरित न्याय की मांग करता है, वहीं कई अदालतों के कुछ फैसलों ने यह बहस छेड़ दी है कि आखिर किस आधार पर किसी घटना को ‘रेप की कोशिश’ (Attempt to Rape) और किस आधार पर केवल ‘छेड़छाड़’ (Outraging Modesty) माना जाता है?
Patna High Court Verdict: हाल के वर्षों में पटना हाई कोर्ट, इलाहाबाद हाई कोर्ट, बॉम्बे हाई कोर्ट और राजस्थान हाई कोर्ट के कुछ फैसले राष्ट्रीय बहस का विषय बने। इन फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में कड़ी टिप्पणी की और कुछ आदेशों को पलट दिया।
सवाल सिर्फ कानून का नहीं है, बल्कि उस संवेदनशीलता का भी है जिसकी उम्मीद न्याय व्यवस्था और शासन से की जाती है।
आखिर विवाद की जड़ क्या है?
Patna High Court Verdict: भारतीय दंड संहिता (IPC) और अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) में ‘रेप’, ‘रेप का प्रयास’ और ‘महिला की लज्जा भंग करना’ अलग-अलग अपराध हैं।
अदालतें अक्सर यह देखती हैं कि आरोपी ने केवल तैयारी की थी या वास्तव में अपराध पूरा करने की दिशा में अंतिम कदम (Overt Act) उठाया था। लेकिन आम नागरिक के लिए यह कानूनी विभाजन समझना आसान नहीं है।
यदि किसी महिला या बच्ची के कपड़े उतारने की कोशिश की जाए, उसके शरीर को जबरन छुआ जाए या उसे सुनसान जगह ले जाने का प्रयास किया जाए, तो पीड़िता के मन में यह घटना केवल “छेड़छाड़” नहीं बल्कि यौन हिंसा की शुरुआत होती है। यही कारण है कि ऐसे फैसले समाज में असहजता पैदा करते हैं।
पटना हाई कोर्ट का फैसला: रेप का प्रयास नहीं, धारा 354 का अपराध
Patna High Court Verdict: जुलाई 2026 में पटना हाई कोर्ट ने एक मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई रेप के प्रयास (IPC 376/511) की सजा को रद्द कर दिया।
मामले में आरोप था कि आरोपी ने युवती को एक कमरे में बंद किया, उसके स्तन दबाए और सलवार का नाड़ा खींचा।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने शारीरिक प्रवेश (Penetration) की दिशा में अंतिम कदम उठाया था।
इसलिए इसे रेप के प्रयास के बजाय IPC की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग करने का अपराध माना गया। हालांकि अदालत ने आरोपी को बरी नहीं किया और स्पष्ट किया कि उसका कृत्य गंभीर अपराध है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला
Patna High Court Verdict: मार्च 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले में कहा था कि नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ना, पायजामे का नाड़ा खींचना और उसे सुनसान जगह ले जाने की कोशिश रेप का प्रयास नहीं बल्कि केवल तैयारी मानी जाएगी।
इस फैसले पर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई। सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे न्यायिक संवेदनशीलता के विपरीत बताया और आदेश पर रोक लगा दी।
सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी बच्ची के कपड़े उतारने या उतारने की कोशिश को केवल तकनीकी आधार पर हल्का अपराध नहीं माना जा सकता।
यदि परिस्थितियां यह दर्शाती हैं कि आरोपी का उद्देश्य बलात्कार करना था, तो ऐसे मामलों को गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
‘स्किन-टू-स्किन’ मामला और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
Patna High Court Verdict: 2021 में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने एक फैसले में कहा था कि कपड़ों के ऊपर से बच्ची के स्तन छूना POCSO Act के तहत “Sexual Assault” नहीं माना जाएगा क्योंकि त्वचा से त्वचा (Skin-to-Skin) का संपर्क नहीं हुआ।
इस फैसले की देशभर में आलोचना हुई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसे पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि यौन अपराध का निर्धारण कपड़ों की मौजूदगी से नहीं बल्कि आरोपी की यौन मंशा (Sexual Intent) से होगा।
यह फैसला इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण बना कि कानून की व्याख्या केवल शब्दों तक सीमित नहीं रह सकती।
राजस्थान हाई कोर्ट का फैसला भी विवादों में रहा
Patna High Court Verdict: जून 2024 में राजस्थान हाई कोर्ट ने लगभग 33 वर्ष पुराने एक मामले में कहा कि केवल पीड़िता के कपड़े उतारना और आरोपी का स्वयं निर्वस्त्र होना, जब तक कि शारीरिक प्रवेश की दिशा में कोई प्रत्यक्ष कदम न उठाया गया हो, रेप के प्रयास की कानूनी परिभाषा में नहीं आएगा।
हालांकि अदालत ने आरोपी को पूरी तरह निर्दोष नहीं माना और IPC की धारा 354 के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी।
कानून और समाज के बीच बढ़ती दूरी
Patna High Court Verdict: इन मामलों से एक बड़ी समस्या सामने आती है। अदालतें कानून की तकनीकी परिभाषाओं के आधार पर निर्णय देती हैं, लेकिन समाज इन घटनाओं को पीड़िता के अनुभव और अपराध की गंभीरता से देखता है।
यहीं सबसे बड़ा विवाद जन्म लेता है। यदि कोई व्यक्ति किसी महिला के कपड़े उतारने की कोशिश करता है, उसके शरीर को जबरन छूता है या उसे जबरन किसी सुनसान स्थान पर ले जाता है, तो आम नागरिक के लिए यह केवल “छेड़छाड़” नहीं बल्कि संभावित यौन हिंसा का हिस्सा दिखाई देता है।
सरकार से बड़ा सवाल: आखिर कानून इतना अस्पष्ट क्यों?
Patna High Court Verdict: इन फैसलों के बाद सबसे बड़ा सवाल केवल अदालतों पर नहीं, बल्कि सरकार और कानून बनाने वाली व्यवस्था पर भी उठता है।
यदि अलग-अलग अदालतें समान परिस्थितियों वाले मामलों में अलग-अलग निष्कर्ष निकाल रही हैं, तो क्या यह संकेत नहीं है कि कानून की परिभाषाओं में और स्पष्टता की आवश्यकता है?
क्या संसद को ऐसी परिस्थितियों के लिए अधिक स्पष्ट कानूनी मानक तय नहीं करने चाहिए, ताकि देशभर में एक जैसी व्याख्या हो और पीड़िताओं को न्याय मिलने में भ्रम न रहे?
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि न्यायिक अधिकारियों के लिए लैंगिक संवेदनशीलता (Gender Sensitivity) पर निरंतर प्रशिक्षण हो, ताकि कानून की व्याख्या करते समय पीड़िता के अधिकारों और अपराध की वास्तविक प्रकृति को भी पर्याप्त महत्व मिले।
पटना, इलाहाबाद, बॉम्बे और राजस्थान हाई कोर्ट के इन मामलों ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि रेप के प्रयास और छेड़छाड़ के बीच कानूनी रेखा आखिर कहां खींची जानी चाहिए।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि अदालतें उपलब्ध साक्ष्यों, लागू कानून और प्रत्येक मामले के विशिष्ट तथ्यों के आधार पर निर्णय देती हैं। इसलिए अलग-अलग मामलों में अलग-अलग निष्कर्ष आ सकते हैं।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने भी कई अवसरों पर यह स्पष्ट किया है कि यौन अपराधों की व्याख्या करते समय केवल तकनीकी पहलुओं तक सीमित नहीं रहा जा सकता।
सवाल केवल किसी एक फैसले का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या भारत का आपराधिक कानून इतना स्पष्ट, संवेदनशील और एकरूप है कि हर पीड़िता को समान न्याय मिल सके?
यदि नहीं, तो यह जिम्मेदारी केवल अदालतों की नहीं, बल्कि सरकार, संसद और पूरे न्याय तंत्र की भी है कि वे कानूनों को अधिक स्पष्ट, व्यावहारिक और पीड़ित-केंद्रित बनाएं, ताकि भविष्य में ऐसे विवाद बार-बार पैदा न हों।
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