नरोत्तम मिश्रा
बड़ा नेता बनते ही छोटी राजनीति बंद कर देनी चाहिए, वरना जनता देर-सवेर उसे फिर छोटा नेता बना देती है। सत्ता का कद पद से बढ़ता है, लेकिन राजनीतिक प्रतिष्ठा व्यवहार से बनती है। जो नेता प्रदेश और देश की राजनीति में जगह बनाने के बाद भी प्रधान, पार्षद, थाना, चौकी और स्थानीय गुटबाजी के झगड़ों में उलझा रहे, उसका नाम भले बड़ा हो जाए, राजनीति अंततः छोटी ही रह जाती है।
नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक जीवन इस बात का सबसे ताजा उदाहरण है। छात्र राजनीति और भारतीय जनता युवा मोर्चा से निकले नरोत्तम मिश्रा को दतिया स्थित माँ पीताम्बरा पीठ के कारण भाजपा के अनेक बड़े नेताओं से संपर्क बनाने का अवसर मिला। भाजपा के वरिष्ठ नेता दतिया आते, दर्शन-पूजन करते और युवा नरोत्तम मिश्रा उनके संपर्क में आते गए। राजनीतिक सक्रियता, संगठन में पकड़ और इन संबंधों ने उनके लिए आगे का रास्ता खोला।
वर्ष 1990 में उन्हें मात्र 30 वर्ष की आयु में डबरा विधानसभा क्षेत्र से भाजपा का टिकट मिला और वे चुनाव जीत गए। वर्ष 1993 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 1998 और 2003 में वे फिर डबरा से निर्वाचित हुए। परिसीमन के बाद डबरा सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हो गई, इसलिए उन्होंने 2008 में दतिया का रुख किया। इसके बाद 2008, 2013 और 2018 में लगातार तीन बार दतिया से जीतकर उन्होंने मध्य प्रदेश की राजनीति में अपना मजबूत स्थान बनाया।
मंत्री के रूप में बढ़ता गया राजनीतिक कद
वर्ष 2005 से नरोत्तम मिश्रा मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री बनने लगे। शुरुआत राज्य मंत्री के रूप में हुई और बाद में वे कैबिनेट मंत्री बने। कानून, संसदीय कार्य, स्वास्थ्य, नगरीय प्रशासन, जनसंपर्क और जल संसाधन जैसे महत्वपूर्ण विभाग उनके पास रहे। मंत्री रहते हुए उन्होंने डबरा और दतिया दोनों क्षेत्रों में विकास के अनेक कार्य कराए, इसमें संदेह नहीं होना चाहिए।
उनकी राजनीतिक कार्यशैली तेज थी, प्रशासनिक अधिकारियों पर पकड़ मजबूत थी और विधानसभा के भीतर सरकार का पक्ष रखने की उनकी क्षमता भी प्रभावी मानी जाती थी। धीरे-धीरे वे शिवराज सिंह चौहान सरकार के सबसे प्रमुख मंत्रियों में गिने जाने लगे। लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण उनका जनाधार भी बना और समर्थकों का एक बड़ा तंत्र भी तैयार हुआ।
फिर वर्ष 2020 आया। ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक विधायकों के कांग्रेस छोड़ने के बाद कमलनाथ सरकार गिर गई और भाजपा की सत्ता में वापसी हुई। इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में नरोत्तम मिश्रा की सक्रिय भूमिका मानी गई। नई सरकार में उन्हें गृह मंत्रालय जैसा अत्यंत शक्तिशाली विभाग मिला। यहीं से नरोत्तम मिश्रा केवल मंत्री नहीं रहे, बल्कि अपने समर्थकों के बीच ‘दादा’ बन गए। दुर्भाग्य से यही वह मोड़ भी था, जहाँ से उनके राजनीतिक पतन की भूमिका तैयार होने लगी।
जब कद बढ़ा तो प्रदर्शन भी बढ़ गया
गृह मंत्री बनने के बाद नरोत्तम मिश्रा का कद अचानक बहुत बड़ा हो गया। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से उनकी निकटता दिखाई देने लगी। अमित शाह उन्हें सार्वजनिक रूप से ‘पंडित जी’ कहकर संबोधित करते थे। कई अवसरों पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के कार्यक्रमों में उन्हें विशेष प्रमुखता मिलती थी। संगठन से लेकर सरकार तक उनका प्रभाव साफ दिखाई देता था।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम हो गई थी कि भविष्य में मध्य प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन हुआ तो नरोत्तम मिश्रा मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार हो सकते हैं। कई बार उनका राजनीतिक प्रदर्शन ऐसा दिखाई देता था, मानो वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से भी अधिक प्रभावशाली हों। समस्या प्रभावशाली होने में नहीं थी, समस्या उस प्रभाव को बार-बार प्रदर्शित करने में थी। राजनीति में शक्ति से अधिक महत्वपूर्ण शक्ति का संयम होता है।
बड़ा नेता वह नहीं होता जो हर मंच पर अपने कद का प्रदर्शन करे। बड़ा नेता वह होता है जो अपने से छोटे कार्यकर्ता को भी सम्मान दे और अपने से बड़े नेता की मर्यादा भी बनाए रखे। सत्ता का मद जब व्यवहार में उतरने लगे, तब पुराने साथी भी समर्थक नहीं रहते, केवल अवसर की प्रतीक्षा करने वाले मौन दर्शक बन जाते हैं।
आखिर 2023 में हार क्यों हुई?
वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने मध्य प्रदेश में बड़ी विजय प्राप्त की, लेकिन उसके तत्कालीन गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा अपनी दतिया सीट कांग्रेस के राजेंद्र भारती से 7,156 मतों से हार गए। यह केवल एक उम्मीदवार की हार नहीं थी। यह उस स्थानीय राजनीतिक व्यवस्था के विरुद्ध जमा हुए असंतोष का परिणाम भी मानी गई, जिसमें क्षेत्र की लगभग हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर एक ही राजनीतिक केंद्र का नियंत्रण दिखाई देता था।
दतिया में नरोत्तम मिश्रा का प्रभाव इतना व्यापक हो चुका था कि ग्राम प्रधान से लेकर जिला पंचायत तक, थाना-चौकी से लेकर स्थानीय प्रशासन तक, प्रत्येक मामले में उनके समर्थकों की भूमिका की चर्चा होने लगी थी। विपक्षी जनप्रतिनिधियों पर मुकदमे, राजनीतिक विरोधियों को प्रशासनिक कार्रवाई से घेरना और स्थानीय निकायों के संघर्षों में सत्ता का खुला प्रयोग, इन सबने विरोध को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसे भीतर ही भीतर जमा किया।
प्रश्न यही है कि यदि प्रदेश का गृह मंत्री ग्राम प्रधान स्तर की राजनीति करने लगे, तो फिर गृह मंत्री के पद की विराटता कहाँ रह जाती है? यदि विपक्ष के हर छोटे नेता को दबाने में पूरी प्रशासनिक शक्ति लगा दी जाए, तो प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर ध्यान कौन देगा? और यदि सभी विरोधियों को डरा-धमकाकर चुप करा दिया जाए, तो क्या वे सचमुच समर्थक बन जाते हैं?
नहीं। वे केवल बोलना बंद करते हैं। चुनाव के दिन वही मौन मतदाता बूथ तक पहुँचकर अपना उत्तर देता है। दतिया में भी यही हुआ। जो असंतोष पांच वर्षों तक सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिया, वह मतदान मशीन में दर्ज हो गया।
बंदूक के लाइसेंस और समर्थकों की उद्दंडता
नरोत्तम मिश्रा के कार्यकाल में बंदूक के लाइसेंस दिलाने को लेकर भी अनेक स्थानीय आरोप और चर्चाएँ चलती रहीं। कहा गया कि उनके कई समर्थकों को बड़ी संख्या में शस्त्र लाइसेंस दिलाए गए। इन आरोपों की स्वतंत्र और समग्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन राजनीति में केवल कानूनी सत्य ही नुकसान नहीं करता, सार्वजनिक धारणा भी उतनी ही प्रभावशाली होती है।
मान लीजिए इससे कुछ हजार समर्थकों को लाभ मिला होगा और कुछ लोगों ने इसे राजनीतिक कृपा के रूप में देखा होगा। लेकिन किसी बड़े नेता के लिए इस तरह की छोटी कृपाओं से मिलने वाला लाभ बहुत सीमित होता है, जबकि नुकसान बहुत व्यापक हो सकता है। सत्ता के संरक्षण का भाव समर्थकों को अनुशासित नहीं बनाता, कई बार उन्हें उद्दंड बना देता है।
जब समर्थक यह मानने लगें कि थाना उनका है, प्रशासन उनका है और सरकार उनके नेता की है, तब वे जनता से संवाद करना बंद कर देते हैं। वे सेवा के स्थान पर भय का वातावरण बनाने लगते हैं। अंततः जनता समर्थकों और नेता में अंतर नहीं करती। कार्यकर्ताओं के व्यवहार का राजनीतिक मूल्य नेता को ही चुकाना पड़ता है।
मंदिर प्रकरण और सत्ता के मद की चर्चा
वर्ष 2023 में एक विधवा महिला के साथ मंदिर परिसर में कथित दुर्व्यवहार से जुड़े प्रकरण और उसके बाद हुई कार्रवाई को लेकर भी नरोत्तम मिश्रा पर गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए गए। आरोप यह था कि मामले में न्यायपूर्ण कार्रवाई करने के बजाय प्रभावशाली लोगों को सहायता दी गई। ऐसे मामलों में अंतिम निष्कर्ष न्यायिक और आधिकारिक तथ्यों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए, लेकिन यह प्रकरण दतिया में पहले से बन चुकी सत्ता के दुरुपयोग वाली धारणा को और मजबूत करने वाला सिद्ध हुआ।
किसी भी शक्तिशाली नेता के लिए सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है, जब जनता को लगने लगे कि न्याय व्यक्ति देखकर दिया जा रहा है। गृह मंत्री के लिए यह संकट और भी गंभीर हो जाता है, क्योंकि उसके हाथ में पुलिस और कानून-व्यवस्था का तंत्र होता है। जिस नेता की शक्ति न्याय की गारंटी बन सकती थी, यदि उसी की शक्ति पक्षपात की आशंका पैदा करने लगे, तो राजनीतिक प्रतिफल देर से सही, मिलता अवश्य है।
चुनावी हार के बाद बंद होते गए रास्ते
वर्ष 2023 का चुनाव हारने के बाद भी नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों को उम्मीद थी कि किसी विधायक से सीट खाली कराकर उन्हें विधानसभा भेजा जाएगा। ऐसा नहीं हुआ। फिर लोकसभा चुनाव में टिकट की आशा जगी, लेकिन वहाँ भी अवसर नहीं मिला। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा चली, पर वह पद भी नहीं मिला। राज्यसभा की संभावना बताई गई, लेकिन वह रास्ता भी नहीं खुला।
अंततः दतिया विधानसभा उपचुनाव को उनकी वापसी का सबसे स्वाभाविक अवसर माना जा रहा था। नरोत्तम मिश्रा महीनों से क्षेत्र में सक्रिय थे और समर्थकों को भरोसा था कि टिकट उन्हें ही मिलेगा। भाजपा ने लेकिन आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बना दिया। टिकट कटने के बाद समर्थकों ने राष्ट्रीय राजमार्ग रोका, पथराव हुआ, पुलिस से टकराव हुआ और पार्टी के भीतर खुला असंतोष दिखाई दिया। बाद में नरोत्तम मिश्रा ने पार्टी का निर्णय स्वीकार करते हुए हिंसा की निंदा की और भाजपा प्रत्याशी के लिए प्रचार करने की घोषणा की।
अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि उपचुनाव कौन जीतेगा। प्रश्न यह है कि इस पूरे प्रकरण के बाद भाजपा नेतृत्व नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक उपयोगिता और अनुशासन को किस दृष्टि से देखेगा। टिकट कटने पर जिस प्रकार का उग्र विरोध हुआ, उसने उनकी शक्ति भी दिखाई और संगठन के लिए संभावित चुनौती भी। भाजपा जैसी अनुशासन-प्रधान पार्टी में सार्वजनिक विद्रोह किसी नेता के पक्ष में स्थायी पूंजी नहीं बनता।
उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी जीते या हारे, नरोत्तम मिश्रा के लिए 2028 का रास्ता अब पहले से अधिक कठिन दिखाई देता है। भाजपा सामाजिक समीकरणों के कारण कई बार पिछड़े और अनुसूचित जाति वर्ग के नेताओं के असंतोष को संभालने के लिए अतिरिक्त राजनीतिक गुंजाइश निकाल लेती है, लेकिन सवर्ण नेताओं के मामले में उसके पास विकल्पों की लंबी कतार है। यहाँ कोई एक नेता अपरिहार्य नहीं माना जाता।
स्मृति ईरानी का उदाहरण भी सामने है
ऐसा केवल नरोत्तम मिश्रा के साथ नहीं हुआ। स्मृति ईरानी ने अमेठी में राहुल गांधी को हराकर राष्ट्रीय राजनीति में बहुत बड़ा कद प्राप्त किया था। वे चाहतीं तो अपने संसदीय क्षेत्र में व्यापक विकास, संगठन और संवाद पर ध्यान देकर लंबे समय तक प्रभाव बनाए रख सकती थीं। लेकिन स्थानीय स्तर के विवादों, छोटे राजनीतिक संघर्षों और अनावश्यक टकरावों में उनकी छवि उलझती चली गई। वर्ष 2024 में अमेठी से पराजय के बाद वे भी राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र से काफी हद तक किनारे दिखाई देने लगीं।
बड़े पद पर बैठकर छोटी राजनीति करना कुछ समय के लिए शक्ति का अनुभव करा सकता है, लेकिन उसका परिणाम लगभग हमेशा उलटा होता है। छोटे नेताओं से लड़कर कोई बड़ा नहीं बनता। बड़ा नेता वह है जो छोटे विरोधियों को भी राजनीतिक स्थान देता है, प्रशासन को व्यक्तिगत हथियार नहीं बनाता और अपने समर्थकों को अनुशासन में रखता है।
नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक जीवन समाप्त हो गया है, ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी। उनके पास अनुभव है, संगठन की समझ है, भाषण की क्षमता है और मध्य प्रदेश में पहचान भी है। लेकिन वापसी तभी संभव है, जब वे अपनी अब तक की राजनीति का ईमानदार पुनर्मूल्यांकन करें।
सत्ता में रहते हुए नेता को यह भ्रम बहुत जल्दी हो जाता है कि जनता डर रही है, इसलिए उसके साथ है। वास्तव में जनता कई बार केवल समय की प्रतीक्षा कर रही होती है। वह नारे नहीं लगाती, सड़क नहीं रोकती और नेता के दरबार में बहस नहीं करती। वह सीधे मतदान केंद्र पहुँचती है और बड़े से बड़े नेता को फिर छोटा बना देती है।
— जानकारियां साभार ट्विटर

