अमेरिका-ईरान युद्ध ने बढ़ाया वैश्विक तनाव: अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव अब पहले से कहीं अधिक गंभीर हो गया है। दोनों देशों के बीच बढ़ते टकराव ने पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।
अमेरिका ने दावा किया है कि उसकी सेना ने ईरान के कई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पर करीब पांच घंटे तक लगातार अभियान चलाया।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इस कार्रवाई का उद्देश्य ईरान की मिसाइल क्षमता, ड्रोन नेटवर्क और रक्षा प्रणाली को कमजोर करना था ताकि भविष्य में अमेरिकी हितों और उसके सहयोगी देशों के लिए पैदा होने वाले खतरों को कम किया जा सके।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक यह अभियान 13 जुलाई की रात शुरू हुआ और कई घंटों तक जारी रहा।
इस दौरान बुशेहर, चाबहार, जास्क, कोनारक, अबू मूसा और बंदर अब्बास जैसे रणनीतिक महत्व वाले सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया।
अमेरिका का कहना है कि सभी हमले सटीक खुफिया जानकारी के आधार पर किए गए और इनमें केवल सैन्य ढांचे को लक्ष्य बनाया गया।
अमेरिका का दावा- मिसाइल और ड्रोन नेटवर्क को पहुंचाया नुकसान
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि अभियान के दौरान ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइल लॉन्चिंग साइट्स, ड्रोन संचालन केंद्र और नौसैनिक सुविधाओं को निशाना बनाया गया।
अमेरिका का मानना है कि ईरान लंबे समय से अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने में जुटा हुआ है और क्षेत्र में सक्रिय कई सशस्त्र समूहों को भी समर्थन देता रहा है।
ऐसे में इन ठिकानों पर कार्रवाई को सुरक्षा के लिहाज से आवश्यक बताया गया है।
साथ ही अमेरिका ने यह भी जानकारी दी कि मध्य पूर्व में उसके 50 हजार से अधिक सैनिक पहले से तैनात हैं। मौजूदा हालात को देखते हुए इन सभी सैनिकों को हाई अलर्ट पर रखा गया है।
अमेरिकी रक्षा विभाग का कहना है कि यदि किसी भी अमेरिकी सैन्य अड्डे, सैनिक या सहयोगी देश पर हमला होता है तो उसका जवाब देने के लिए सेना पूरी तरह तैयार है।
ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई का किया दावा
अमेरिकी हमलों के कुछ समय बाद ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने जवाबी कार्रवाई का दावा किया।
ईरान के अनुसार उसकी सेना ने बहरीन स्थित अल-जुफैर में अमेरिकी सैन्य सुविधाओं को निशाना बनाया।
ईरानी दावे के मुताबिक हमले में हथियार भंडारण केंद्र, सैटेलाइट संचार प्रणाली और अमेरिकी सैनिकों से जुड़ी एक इमारत को नुकसान पहुंचाया गया।
IRGC ने यह भी दावा किया कि उसने अमेरिका के MQ-1 ड्रोन को मार गिराया है। हालांकि अमेरिका की ओर से इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
दोनों देशों की ओर से किए जा रहे दावों के बीच स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा घटनाओं की पुष्टि होना अभी बाकी है।
हॉर्मुज क्षेत्र बना नए तनाव का केंद्र
इस संघर्ष के बीच हॉर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर वैश्विक चिंता का विषय बन गया है।
रान ने दावा किया कि उसने दो सुपर ऑयल टैंकरों को निशाना बनाया, जबकि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने आरोप लगाया कि उसके दो तेल टैंकरों पर भी हमला हुआ है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की सप्लाई इसी रास्ते से होती है।
यदि इस मार्ग पर सैन्य गतिविधियां बढ़ती हैं या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो इसका असर पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है।
यही कारण है कि इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार नजर बनाए हुए है।
कच्चे तेल की कीमतों में आया उछाल
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष का असर वैश्विक तेल बाजार पर तुरंत दिखाई दिया।
निवेशकों को आशंका है कि यदि युद्ध लंबा चलता है या तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो दुनिया में ऊर्जा संकट गहरा सकता है।
तनाव बढ़ने के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत बढ़कर लगभग 85 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड करीब 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया।
विश्लेषकों का मानना है कि यह पिछले एक महीने के सबसे ऊंचे स्तरों में से एक है।
तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर पेट्रोल-डीजल, परिवहन लागत, विमानन उद्योग और महंगाई पर भी पड़ सकता है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बढ़ी चिंता
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष लगातार बढ़ता रहा तो केवल तेल बाजार ही नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी।
तेल की कीमतों में वृद्धि से उत्पादन लागत बढ़ सकती है, जिससे कई देशों में महंगाई का दबाव बढ़ने की संभावना है।
इसके अलावा समुद्री व्यापार प्रभावित होने पर अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन भी बाधित हो सकती है।
कई देशों ने अपने व्यापारिक जहाजों और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर सतर्कता बढ़ा दी है।
अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियां भी हालात पर नजर रख रही हैं और जरूरत पड़ने पर अपने समुद्री मार्गों में बदलाव कर सकती हैं।
संयुक्त राष्ट्र में भी बढ़ा टकराव
सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। संयुक्त राष्ट्र में ईरान ने अमेरिका पर क्षेत्रीय समझौतों को कमजोर करने और तनाव बढ़ाने का आरोप लगाया है।
वहीं अमेरिका का कहना है कि उसकी कार्रवाई आत्मरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के उद्देश्य से की गई।
संयुक्त राष्ट्र सहित कई देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय का मानना है कि यदि सैन्य टकराव और बढ़ा तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुनिया को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
दोनों देशों ने तेज की कार्रवाई
कुछ समय पहले अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने और शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की संभावना दिखाई दे रही थी।
हालांकि हॉर्मुज क्षेत्र में जहाजों पर हुए हमलों के बाद हालात तेजी से बदल गए। इसके बाद दोनों देशों ने एक-दूसरे के खिलाफ सैन्य कार्रवाई तेज कर दी, जिससे शांति की कोशिशों को बड़ा झटका लगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास लगातार बढ़ रहा है और जब तक कूटनीतिक स्तर पर गंभीर बातचीत नहीं होती, तब तक हालात सामान्य होना मुश्किल दिखाई देता है।

