अमेरिका से मदद की उम्मीद में था पाकिस्तान : पाकिस्तान इस समय गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार लगातार दबाव में है और महंगाई व कर्ज का बोझ भी बढ़ता जा रहा है।
ऐसे समय में पाकिस्तान ने अमेरिका से 10 अरब डॉलर (करीब 96,000 करोड़ रुपये) की आर्थिक मदद की उम्मीद जताई थी। लेकिन मदद मिलने के बजाय उसे एक नया झटका लगा।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान समेत करीब 60 देशों से आने वाले कुछ आयातित सामान पर 10% तक का नया इम्पोर्ट टैरिफ लगाने का फैसला किया।
इस फैसले का असर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और उसके निर्यात कारोबार पर पड़ सकता है।
अमेरिका से मांगी थी आर्थिक सहायता
पाकिस्तान के वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगजेब ने अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट से मुलाकात के दौरान 10 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता की मांग की थी।
यह राशि एक विशेष आर्थिक सहायता व्यवस्था के तहत मांगी गई थी ताकि पाकिस्तान अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत कर सके।
पाकिस्तान के लिए विदेशी मुद्रा भंडार बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी के जरिए वह जरूरी आयात, विदेशी कर्ज का भुगतान और अपनी मुद्रा को स्थिर रखने का प्रयास करता है।
यदि यह मदद मिल जाती, तो सरकार को आर्थिक मोर्चे पर कुछ राहत मिल सकती थी।
क्यों थी इस मदद की जरूरत?
पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर हुई है। देश पहले से ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से लिए गए कर्ज पर निर्भर है।
इसके अलावा महंगाई, बढ़ता विदेशी कर्ज और कमजोर होता पाकिस्तानी रुपया सरकार के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
ऐसे हालात में पाकिस्तान चाहता था कि अमेरिका से मिलने वाली आर्थिक सहायता उसके विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने में मदद करे।
इससे रुपये की गिरावट पर कुछ हद तक नियंत्रण पाया जा सकता था और कर्ज के दबाव को भी कम किया जा सकता था।
पाकिस्तान को क्यों थी उम्मीद?
रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान को उम्मीद थी कि हाल के समय में अमेरिका और ईरान के बीच संवाद स्थापित कराने की उसकी कोशिशों का सकारात्मक असर देखने को मिलेगा।
उसे लगा कि दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की भूमिका निभाने के बाद अमेरिका उसकी आर्थिक मदद के लिए आगे आ सकता है।
हालांकि, हालात पाकिस्तान की उम्मीदों के बिल्कुल उलट निकले। आर्थिक सहायता देने के बजाय अमेरिका ने पाकिस्तान से आने वाले कुछ उत्पादों पर अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने का फैसला कर लिया।
ट्रंप का नया टैरिफ फैसला
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने कई देशों से आने वाले आयात पर 10% से 12.5% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा की है। इस सूची में पाकिस्तान के अलावा कई अन्य बड़े व्यापारिक साझेदार भी शामिल हैं।
अमेरिका का कहना है कि कुछ देशों में कम लागत और श्रम नियमों के कमजोर पालन के कारण वहां बने उत्पाद बहुत सस्ते पड़ते हैं।
इससे अमेरिकी कंपनियों और स्थानीय श्रमिकों को प्रतिस्पर्धा में नुकसान उठाना पड़ता है।
इसी वजह से अमेरिकी सरकार आयात पर अतिरिक्त शुल्क लगाकर घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना चाहती है।
पाकिस्तान के निर्यात पर पड़ेगा असर
अमेरिका पाकिस्तान के लिए सबसे महत्वपूर्ण निर्यात बाजारों में से एक है।
खासतौर पर कपड़ा, रेडीमेड गारमेंट्स और चमड़े के उत्पादों की बड़ी मात्रा अमेरिका भेजी जाती है।
यदि इन उत्पादों पर 10% अतिरिक्त टैरिफ लगता है, तो अमेरिकी बाजार में उनकी कीमत बढ़ जाएगी।
कीमत बढ़ने से खरीदार दूसरे देशों की ओर रुख कर सकते हैं। इसका असर पाकिस्तान के निर्यात, उद्योगों और रोजगार पर भी पड़ सकता है।
निर्यात घटने का मतलब है कि पाकिस्तान को विदेशी मुद्रा भी कम मिलेगी, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
भारत समेत कई देशों पर भी असर
यह फैसला केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। अमेरिका ने कई प्रमुख व्यापारिक साझेदार
देशों से आने वाले आयात पर भी अतिरिक्त टैरिफ लगाने का निर्णय लिया है। इनमें भारत, चीन और यूरोपीय संघ जैसे बड़े बाजार भी शामिल हैं।
भारत के टेक्सटाइल, जेम्स एंड ज्वेलरी, आईटी और अन्य निर्यात आधारित उद्योगों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
हालांकि, वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि किन उत्पादों पर कितना अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है और कंपनियां नई परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीति कैसे बदलती हैं।
आगे क्या हो सकता है?
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पाकिस्तान को जल्द ही किसी बड़े वित्तीय स्रोत से सहायता नहीं मिलती, तो उसके लिए विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
दूसरी ओर, अमेरिका के नए टैरिफ नियमों के कारण पाकिस्तान के निर्यातकों को भी कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है।
वहीं, कई देशों के लिए यह फैसला अपनी व्यापार नीति और निर्यात रणनीति पर दोबारा विचार करने का संकेत माना जा रहा है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रभावित देश अमेरिका के साथ व्यापारिक बातचीत के जरिए कोई समाधान निकाल पाते हैं या नहीं।

