Tuesday, July 21, 2026

जैसलमेर एलडीसी भर्ती: शिक्षक और अभ्यर्थी को किया टॉर्चर! नकल की जांच की आड़ में साजिश?

जैसलमेर

जैसलमेर की एलडीसी भर्ती परीक्षा में कथित नकल के मामले में नई परतें खुल रही हैं।

आरोपी पदमसिंह और महिला अभ्यर्थी मनु कंवर को जमानत दिए जाने के बाद मामला नए मोड़ पर है। पदमसिंह को एक लाख रुपये के निजी मुचलके और पचास-पचास हजार रुपये की जमानत पर रिहा किया गया है।

बचाव पक्ष ने अदालत में बताया कि पदमसिंह को प्राथमिकी दर्ज होने से पहले पुलिस हिरासत में रखकर बुरी तरह पीटा गया, जिससे उसके कान का पर्दा फट गया और शरीर पर गंभीर चोटें आईं। इस पर अदालत ने चिकित्सकीय परीक्षण के लिए विशेष मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया।

यहीं से पुलिस की कहानी पर पहला बड़ा प्रश्नचिह्न लगता है। यदि शरीर पर कोई चोट नहीं थी, जैसा पुलिस ने कथित रूप से अदालत में कहा, तो मेडिकल परीक्षण का विरोध क्यों किया ?

पुलिस को तो स्वयं कहना चाहिए था कि तत्काल चिकित्सा बोर्ड बनाया जाए, चोटों की वीडियोग्राफी हो और सत्य सामने आए। जाँच से बचने या उसका विरोध संदेह बढ़ाता है। पुलिस की कार्रवाई वैध थी तो स्वतंत्र चिकित्सा परीक्षण उसके पक्ष को ही मजबूत करता।

427741
जैसलमेर एलडीसी भर्ती: शिक्षक और अभ्यर्थी को किया टॉर्चर! नकल की जांच की आड़ में साजिश? 2

5 जुलाई: परीक्षा केंद्र पर वास्तव में क्या हुआ?

मामला 5 जुलाई 2026 को जैसलमेर के रामगढ़ रोड स्थित स्वामी विवेकानंद राजकीय मॉडल स्कूल परीक्षा केंद्र का है। आरोप है कि परीक्षा के दौरान रिलीवर के रूप में तैनात शिक्षक पदमसिंह महिला अभ्यर्थी मनु कंवर की सहायता करने के उद्देश्य से प्रश्नपत्र या उससे संबंधित सामग्री परीक्षा कक्ष से बाहर ले गए।

यह भी दावा किया गया कि परीक्षा केंद्र का सीसीटीवी रिकॉर्ड लगभग नौ मिनट तक उपलब्ध नहीं है और इसी अवधि को कथित नकल की साजिश से जोड़ा गया।

लेकिन परीक्षा केंद्र पर किसी कर्मचारी का कक्ष में आना-जाना, हाथ में फाइल होना या अभ्यर्थी से बात करना संदेह उत्पन्न कर सकता है, पर स्वयं में नकल सिद्ध नहीं करता।

यह स्थापित करने के लिए ठोस उत्तर आवश्यक हैं, कौन-सा प्रश्न बाहर ले जाया गया, किसने हल किया, उत्तर किस माध्यम से भीतर पहुँचा, अभ्यर्थी की उत्तर-पुस्तिका में उससे क्या लाभ दिखाई दिया, संबंधित व्यक्तियों के बीच पूर्व संपर्क का क्या प्रमाण है और सीसीटीवी रिकॉर्ड अनुपलब्ध होने के लिए कौन उत्तरदायी था?

रिलीवर का कार्य ही अलग-अलग कक्षों तक आवश्यक सूचना, सामग्री या सहायता पहुँचाना होता है। इसलिए उसके कक्ष में प्रवेश को स्वतः षड्यंत्र नहीं माना जा सकता।

दूसरी ओर, यदि वास्तव में गोपनीय प्रश्नपत्र बाहर ले जाया गया, तो वह अत्यंत गंभीर अपराध है। सत्य किसी एक पक्ष की भावनाओं से नहीं, इलेक्ट्रॉनिक, और साक्ष्यों से निकलेगा।

बचाव पक्ष की ओर से दावा किया गया है कि पदमसिंह और मनु कंवर एक-दूसरे को पहले से जानते तक नहीं थे। यह दावा यदि सत्य है, तो पुलिस को दोनों के कॉल रिकॉर्ड, संदेश, डिजिटल संपर्क, पूर्व मुलाकात, आर्थिक लेन-देन और किसी मध्यस्थ की भूमिका दिखानी होगी।

यदि ऐसा कोई संपर्क नहीं मिलता, तो कथित साजिश किसकी थी? केवल एक परीक्षा कक्ष की घटना को देखकर पूरी कहानी गढ़ देना जाँच नहीं कहलाती।

शिकायत से पहले माहौल बना या साक्ष्य जुटाए गए?

प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू परीक्षा केंद्र पर उपस्थित कुछ अभ्यर्थियों की शिकायत है। बताया जा रहा है कि देशी वेशभूषा में घूम रहे शिक्षक को देखकर कुछ अभ्यर्थियों ने उन्हें बाहरी व्यक्ति समझा और महिला अभ्यर्थी की सहायता करने का संदेह जताया।

शिकायत करना प्रत्येक अभ्यर्थी का अधिकार है, लेकिन शिकायत जाँच का प्रारंभ होती है, अंतिम फैसला नहीं।

जाँच एजेंसी को परीक्षा केंद्र की केवल चुनी हुई फुटेज नहीं, सभी कक्षों, दोनों पालियों और प्रवेश-द्वारों की पूरी रिकॉर्डिंग सुरक्षित करनी चाहिए थी।

किस कर्मचारी की ड्यूटी कहाँ लगी, ड्यूटी लॉटरी से कब आवंटित हुई, किसने मोबाइल जमा कराया, किसने नहीं कराया, किस अधिकारी ने सीसीटीवी संभाला, नौ मिनट का रिकॉर्ड क्यों गायब हुआ और उस समय नियंत्रण कक्ष किसके अधीन था, इन सभी प्रश्नों का उत्तर आवश्यक है।

सीसीटीवी का कोई अंश गायब होना स्वयं आरोपी शिक्षक के विरुद्ध प्रमाण नहीं है। पहले यह सिद्ध होना चाहिए कि रिकॉर्ड जानबूझकर मिटाया गया, किस उपकरण से मिटाया गया और उस उपकरण तक किसकी पहुँच थी।

यदि कैमरा तकनीकी कारण से बंद हुआ, तो उसकी लॉग रिपोर्ट क्या कहती है? यदि रिकॉर्ड हटाया गया, तो डिजिटल फॉरेंसिक जाँच कहाँ है?

किसी कर्मचारी को केवल इसलिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि सिस्टम की विफलता उसी समय हुई जब वह आसपास उपस्थित था।

6 जुलाई की रात: ‘फॉर्मेलिटी’ या कानून से बाहर कार्रवाई?

पदमसिंह के पक्ष से लगाए गए आरोप कहीं अधिक भयावह हैं। दावा है कि 6 जुलाई की रात पुलिस की ओर से संदेश आया कि अधिकारी केवल औपचारिकता पूरी करने आ रहे हैं और फोन तोड़ देने की सलाह दी गई।

इसके बाद फोन टूटने, रजिस्टर फटने तथा एक कथित लड़ाई का वीडियो तैयार करवाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

संबंधित संदेश का मूल फोन, प्रेषक का नंबर, कॉल रिकॉर्ड, मोबाइल टावर लोकेशन, थाने की जनरल डायरी, पुलिस वाहन की जीपीएस जानकारी तथा हिरासत के समय की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग तत्काल सुरक्षित की जानी चाहिए।

यदि फोन नष्ट करने की सलाह वास्तव में पुलिस से जुड़ी किसी व्यक्ति ने दी थी, तो यह साक्ष्य मिटाने और जाँच को मनचाही दिशा देने का मामला बन सकता है। यदि आरोप झूठा है, तो डिजिटल फॉरेंसिक उसे भी स्पष्ट कर देगा।

आरोप है कि पदमसिंह के बेटे को दबाव बनाने के लिए उठाया गया और पिता-पुत्र को एक-दूसरे के सामने पीटा गया। किसी आरोपी के परिजन को केवल स्वीकारोक्ति निकलवाने के लिए हिरासत में लेना विधिक प्रक्रिया का घोर उल्लंघन है।

बेटे के विरुद्ध स्वतंत्र साक्ष्य था तो गिरफ्तारी के कारण, समय, स्थान और कानूनी दस्तावेज सार्वजनिक रिकॉर्ड में होने चाहिए। यदि ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है, तो अवैध हिरासत का प्रश्न उठता है।

तीन दिन और दो रात दी गई यातना ?

पक्षकारों ने आरोप लगाया है कि तीन दिन और दो रात तक लगातार मारपीट हुई; लोगों को उल्टा लिटाकर, रस्सी से बाँधकर तथा पंखे के हुक से लटकाकर पीटा गया; दो अधिकारी रस्सियों का कोण नियंत्रित करते और अन्य कर्मचारी मारते थे।

यह भी दावा है कि बीच-बीच में विराम देकर बार-बार पूछा जाता था, “और नाम बताओ, गिरोह कितना बड़ा है, कब से यह काम कर रहे हो?”

ये आरोप किसी लोकतांत्रिक राज्य की पुलिस पर सामान्य शिकायत नहीं हैं। यदि इनमें मामूली सत्यता भी है, तो यह पूछताछ नहीं, हिरासत में यातना है। पुलिस का काम अपराध का साक्ष्य खोजना है, आरोपी से अपनी पूर्वनिर्धारित कहानी की पुष्टि करवाना नहीं।

यदि किसी व्यक्ति को ऐसे लोगों के नाम बताने के लिए पीटा जाए जिन्हें वह जानता ही नहीं, तो उससे प्राप्त कथन न्यायिक सत्य नहीं बल्कि यातना से उपजा बयान होगा।

भारतीय कानून में पुलिस के सामने दी गई स्वीकारोक्ति सामान्यतः निर्णायक साक्ष्य नहीं मानी जाती। इसका कारण यही है कि हिरासत में दबाव, भय और हिंसा की जा सकती है।

मनु कंवर के साथ क्या हुआ?

महिला अभ्यर्थी मनु कंवर की ओर से लगाए गए आरोप मामले को और गंभीर बनाते हैं। बचाव पक्ष का कहना है कि वह गर्भवती थी, हिरासत में उसके साथ पुरुष पुलिसकर्मियों ने मारपीट और धक्का-मुक्की की, वह गिर गई, रक्तस्राव हुआ और उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

प्रकाशित रिपोर्ट में महिला के वकील द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन और महिला चिकित्सकों के बोर्ड से जाँच की मांग का उल्लेख है।

पुलिस द्वारा महिला के चिकित्सकीय परीक्षण का विरोध विशेष रूप से चिंताजनक है। जाँच का उद्देश्य सत्य स्थापित करना होना चाहिए, न कि विभागीय प्रतिष्ठा बचाना।

क्या जाति और राजनीति ने जाँच को प्रभावित किया?

समर्थकों का आरोप है कि आरोपियों के राजपूत होने तथा पदमसिंह की स्वयंसेवक पृष्ठभूमि के कारण उनके विरुद्ध असामान्य कठोरता दिखाई गई।

स्थानीय कांग्रेस नेताओं की मिलीभगत तथा थाने पर कथित आवाजाही के भी आरोप लगाए गए हैं।

यदि कोई राजनीतिक पदाधिकारी पूछताछ के दौरान थाने गया, बंदियों को देखने की मांग की या पुलिस कार्रवाई की दिशा पर प्रभाव डाला, तो इसकी जाँच होनी चाहिए।

देवेंद्र सिंह की योग्यता और परिवार को अपमानित करने की राजनीति

इस विवाद में देवेंद्र सिंह की शैक्षणिक प्रतिभा पर भी राजनीतिक टिप्पणियाँ की गईं। उनके समर्थकों के अनुसार उन्होंने एनडीए, एसीएफ, सहायक प्राध्यापक गणित, नेट-जेआरएफ, जेईई मेन्स, जेईई एडवांस्ड, एलडीसी और द्वितीय श्रेणी शिक्षक जैसी अनेक परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं तथा दो बार नेट-जेआरएफ में अखिल भारतीय शीर्ष 100 में स्थान प्राप्त किया।

किसी पिता पर आरोप लगने से बेटे की मेहनत और योग्यता स्वतः संदिग्ध नहीं हो जाती। जबकि वह लगातार हर स्तर की परीक्षा में अव्वल रहा हो।

राजनीतिक विरोध में परिवार की शैक्षणिक उपलब्धियों को निशाना बनाना निम्नस्तरीय राजनीति है। यदि देवेंद्र सिंह किसी अपराध में आरोपी नहीं हैं, तो उन्हें पिता के मामले में घसीटना गन्दी मानसिकता है।

WhatsApp Channel Join Now
Telegram Channel Join Now
Mudit
Mudit
लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
- Advertisement -
- Advertisement -

Latest article