सत्ता छोड़ने का वह फैसला जिसने कल्याण सिंह की छवि बदल दी
अयोध्या में विवादित ढांचा गिरने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अपनी सरकार से इस्तीफा दे दिया। यह वह दौर था जब भाजपा लंबे संघर्ष के बाद सत्ता में जगह बना रही थी और सरकार बचाना किसी नेता की पहली राजनीतिक प्राथमिकता मानी जाती थी।
उस समय भारतीय राजनीति में सत्ता के लिए पाला बदलने की घटनाएं सामान्य थीं। ऐसे माहौल में कल्याण सिंह ने ढांचा गिरने की राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए पद छोड़ दिया। भाजपा समर्थकों के लिए यह निर्णय सत्ता से ऊपर प्रतिबद्धता का प्रतीक बन गया।
केंद्र की कांग्रेस सरकार ने इसके बाद दूसरे भाजपा शासित राज्यों की सरकारें भी बर्खास्त कर दीं। भाजपा को उम्मीद थी कि मंदिर आंदोलन की जनभावना अगले चुनाव में उसके पक्ष में निर्णायक लहर पैदा करेगी और कल्याण सिंह की छवि उसे बढ़त दिलाएगी।
1993 में नहीं चली राम लहर की चुनावी गणित
लेकिन 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव ने अनुमान पलट दिया। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन भाजपा के सामने मजबूत सामाजिक समीकरण लेकर खड़ा हुआ। राम मंदिर आंदोलन की तीव्रता के बावजूद भाजपा सत्ता से बाहर रही और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने।
इसके बाद कल्याण सिंह और भाजपा के संबंधों में धीरे धीरे दूरी बढ़ी। वर्षों में मतभेद इतने बढ़े कि कल्याण सिंह पार्टी से अलग हुए और मुलायम सिंह यादव के साथ मंच साझा करने लगे। बाद में वह दोबारा अपने पुराने वैचारिक परिवार में लौट आए।
कांग्रेस से नाराज वोट क्षेत्रीय दलों की ओर गया
इस घटनाक्रम का दूसरा पक्ष अल्पसंख्यक मतों की राजनीतिक दिशा से जुड़ा था। विवादित ढांचा गिरने के बाद कांग्रेस से नाराज मतदाताओं ने कई राज्यों में मजबूत क्षेत्रीय दलों का रुख किया, जहां उन्हें कांग्रेस के मुकाबले अधिक प्रभावी राजनीतिक विकल्प दिखाई दिया।
उत्तर प्रदेश में यही वोट समाजवादी पार्टी का मजबूत आधार बना। वर्षों बाद जब मुलायम सिंह यादव ने कल्याण सिंह के साथ राजनीतिक समझ बनाई, तब इस गठजोड़ को मतदाता वर्ग के एक हिस्से ने स्वीकार नहीं किया और कांग्रेस को समर्थन मिलने लगा।
2009 में कांग्रेस की वापसी और मुलायम की राजनीतिक मुश्किल
2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में बीस से अधिक सीटें जीतीं। यह परिणाम खास था क्योंकि राज्य में उसका संगठन लंबे समय से कमजोर था। कल्याण सिंह से मुलायम की निकटता को भी इस बदलाव का एक कारण माना गया।
इस समझौते का असर समाजवादी पार्टी के भीतर भी दिखाई दिया। आजम खान जैसे प्रभावशाली नेता ने कल्याण सिंह की मौजूदगी का खुला विरोध किया और पार्टी से दूरी बनाई। उनके लिए यह प्रश्न चुनावी गणित नहीं, राजनीतिक पहचान और समर्थक आधार का भी था।
मुलायम सिंह यादव ने बाद में कल्याण सिंह से दूरी बनाई और आजम खान की वापसी हुई। समाजवादी पार्टी फिर अपने पुराने धर्मनिरपेक्ष ढांचे की ओर लौटी। इस प्रकरण ने दिखाया कि संगठित मतदाता आधार से विचलन का मूल्य चुनावी नुकसान बन सकता है।
बीस प्रतिशत वोट के सामने दलों की असाधारण सावधानी
यही कारण है कि लगभग बीस प्रतिशत मतदाताओं वाले समुदाय की राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर अधिकांश दल अत्यधिक सतर्क रहते हैं। तर्क यह है कि यदि कोई समूह लंबे समय तक राजनीतिक स्मृति बनाए रखता है, तो दल उसके असंतोष का जोखिम लेने से बचते हैं।
इसके उलट हिंदू मतदाता जातियों, आरक्षण संबंधी मतभेदों, जातिगत जनगणना और सामाजिक पहचान के प्रश्नों पर बंटते रहे हैं। बड़े दंगे, आतंकी हमले, विवादास्पद कानून या राजनीतिक आरोप कभी उन्हें एक करते हैं, लेकिन यह एकजुटता अक्सर लंबे समय तक स्थायी नहीं रहती।
हिजाब, बुर्का और धार्मिक अधिकार की अलग राजनीतिक कसौटी
इसी राजनीतिक वास्तविकता के कारण कांग्रेस और अन्य दल धार्मिक प्रतीकों पर अलग भाषा अपनाते दिखाई देते हैं। हिजाब, बुर्का और तीन तलाक पर धार्मिक अधिकार का तर्क आता है, जबकि हिंदू परंपराओं में महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर रूढ़िवादिता की आलोचना खुलकर होती है।
ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में महिलाओं की स्थिति पर बहस के बावजूद भारतीय राजनीति में इस्लामी धार्मिक प्रथाओं की आलोचना सावधानी से होती है। इसके पीछे चुनावी प्रतिक्रिया, सामाजिक तनाव और लंबे समय तक राजनीतिक नाराजगी बने रहने की आशंका प्रमुख कारण मानी जाती है।
वंदे मातरम् से मनुस्मृति तक खुली आलोचना का सवाल
दूसरी ओर वंदे मातरम्, बंकिमचंद्र, सावरकर, मनुस्मृति और हिंदू धर्म की आलोचना भारतीय सार्वजनिक विमर्श में अपेक्षाकृत सामान्य है। इसके पीछे यह आकलन काम करता है कि हिंदू मतदाता कई सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवों में बंटे होने के कारण स्थायी सामूहिक प्रतिक्रिया कम देते हैं।
यही विरोधाभास सार्वजनिक मंचों पर भी दिखाई देता है। एक युवती सिर पर स्कार्फ को रूढ़िवादी प्रतीक बताकर उसका विरोध करती है, जबकि उसी मंच पर दूसरी युवती हिजाब को धार्मिक अधिकार के रूप में पहनती है। एक वस्त्र पर दो अलग राजनीतिक मानदंड उभरते हैं।
एक के लिए रूढ़िवादिता, दूसरे के लिए धार्मिक अधिकार
यही बहस व्यापक वैचारिक प्रश्न खड़ा करती है कि आधुनिक लोकतंत्र में उदारवाद और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा कहां तय होगी। यदि एक परंपरा के प्रतीक को प्रतिगामी और दूसरी के समान प्रतीक को अधिकार माना जाए, तो समान नागरिक मानदंड कमजोर पड़ते हैं।
भारतीय राजनीति का यह प्रसंग मतदान व्यवहार की शक्ति बताता है। जो समुदाय अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं, स्मृतियों और असंतोष को लंबे समय तक संगठित रखता है, उसकी शर्तें दल गंभीरता से लेते हैं। जो समाज विभाजित रहता है, उसकी नाराजगी का राजनीतिक मूल्य घटता जाता है।
वोट की स्थिरता ही तय करती है राजनीतिक भाषा
इसीलिए प्रश्न केवल किसी एक दल, नेता या चुनाव का नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति का प्रश्न है जिसमें वोट की स्थिरता नीतियों की भाषा तय करती है। जहां समर्थन निश्चित माना जाता है, वहां आलोचना आसान और बहिष्कार की आशंका पर सावधानी बढ़ती है।

