कॉकरोच जनता पार्टी
चिकित्सालय की चिट्ठी में सीमित वांगचुक का नेतृत्व
वांगचुक चिकित्सालय में भर्ती रहते हुए चिट्ठी लिख रहा था और चाहकर भी प्रदर्शन स्थल तक नहीं पहुँच सकता था। इसलिए उसकी अनुपस्थिति को परिस्थितिजन्य माना जा सकता है। बाकी नेतृत्व के पास ऐसी कोई बाध्यता नहीं थी, फिर भी मैदान में उतरने का साहस दिखाई नहीं दिया।
ट्राली में बैठकर डंडों से बचते रहे दीपके
मार्च का नेतृत्व पैदल करने के बजाय दीपके ने ट्रक की ट्राली में बैठकर सुरक्षित दूरी बनाए रखना बेहतर समझा। आशंका यही थी कि पुलिस की कार्रवाई होने पर डंडे नेतृत्व को भी झेलने पड़ सकते हैं। भीड़ आगे बढ़ती रही और कथित अगुआ पीछे छिपा रहा।
वांगचुक को हिरासत में लिए जाने के समय भी दीपके की अनुपस्थिति चर्चा में रही थी। ठीक उसी समय वह अचानक ब्रश करने के लिए किसी परिचित के घर पहुँच गया। हर निर्णायक अवसर पर उसका संयोगवश गायब हो जाना नेतृत्व से अधिक सुविधाजनक पलायन दिखाई देता है।
रेस्तराँ में फोन देखते रहे विजेता दहिया
विजेता दहिया प्रदर्शन में सक्रिय भूमिका निभाने के बजाय रंगीन कपड़ों में कई घंटे एक रेस्तराँ में बैठकर फोन देखते रहे। वहाँ मौजूद लोगों ने सवाल किया तो संवाद देने के स्थान पर अपशब्दों का सहारा लिया। सार्वजनिक जवाबदेही उनके व्यवहार में कहीं दिखाई नहीं दी।
बाद में मेट्रो से बाहर निकलते समय लोगों ने पूछा कि वह प्रदर्शन स्थल पर क्यों मौजूद नहीं थे। उस समय तीखी भाषा भी गायब हो गई और कोई स्पष्ट उत्तर नहीं निकला। नेतृत्व का दावा करने वाला व्यक्ति साधारण सवाल के सामने मौन खड़ा दिखाई दिया।
नड्डा निवास की एसी में बैठे सौरव और आशुतोष
सौरव दास और आशुतोष को दो बजे बुलाया गया था, लेकिन वे सुबह ग्यारह बजे से ही नड्डा निवास की वातानुकूलित व्यवस्था में बैठे रहे। प्रदर्शन स्थल पर जाने के बजाय उन्होंने चार बजे तक प्रतीक्षा की, जब तक सड़क पर जुटी भीड़ लगभग समाप्त नहीं हो गई।
इसके बाद उनके पास यह कहने की सुविधा बची रही कि वे ज्ञापन देने की प्रक्रिया में व्यस्त थे। कार्यकर्ताओं को धूप, पुलिस और तनाव के बीच छोड़कर सुरक्षित कमरे में बैठना रणनीति नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से बचने का सुनियोजित तरीका प्रतीत होता है।
बच्चों को आगे कर पीछे हट गया नेतृत्व
पूरे घटनाक्रम में कुछ वास्तविक और भावनात्मक रूप से जुड़े युवाओं को प्रदर्शन में बुलाया गया। उनके बीच भीम आर्मी, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी से जुड़े लोग भी पहुँचे, जिनमें कुछ के बैग में पत्थर होने का आरोप सामने आया। नेतृत्व स्वयं दूरी पर रहा।
योजना के अनुसार पुलिस पर पत्थर फेंके गए, जिसके बाद स्थिति नियंत्रित करने के लिए सीमित बलप्रयोग और लाठीचार्ज किया गया। सामने मौजूद युवाओं ने चोटें झेलीं, जबकि आंदोलन का चेहरा बने लोग सुरक्षित स्थानों पर बैठे रहे और बाद में नैतिक भाषण देने की तैयारी करते रहे।
अब प्राथमिकी निरस्त कराने की नई माँग जुड़ेगी
प्रदर्शन में दिखाई दिए चेहरों की पहचान के आधार पर प्राथमिकी दर्ज होना लगभग तय माना जा रहा है। सरकार चाहती तो आयोजकों को उसी दिन हिरासत में ले सकती थी, लेकिन उनके विरुद्ध कार्रवाई किसी अन्य समय होने की संभावना है। फिलहाल पुलिस साक्ष्य जुटा रही है।
अब इनकी तीन माँगों में चौथी माँग जुड़ने की संभावना है। दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज सभी प्राथमिकी वापस लेने, पुलिस आयुक्त से क्षमा माँगने और कार्रवाई को शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर हमला बताने का अभियान शुरू होगा। पत्थरबाजी पीछे छूट जाएगी और लाठियाँ मुख्य कथा बनेंगी।
जोखिम जनता का, श्रेय नेतृत्व का
इस प्रदर्शन का सार यही रहा कि सामान्य युवाओं को आगे भेजा गया, राजनीतिक समूहों ने भीड़ में अपनी भूमिका निभाई और घोषित नेतृत्व ने सुरक्षित स्थान चुन लिए। संघर्ष के समय अनुपस्थित रहे लोग बाद में कैमरों और वक्तव्यों के माध्यम से आंदोलन का चेहरा बनने निकलेंगे।
ऐसा नेतृत्व न आंदोलन बचाता है, न युवाओं की रक्षा करता है और न अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता है। यह केवल भीड़ जुटाता है, खतरा दूसरों पर छोड़ता है और परिणाम बिगड़ने पर पुलिस, सरकार तथा व्यवस्था को दोष देकर स्वयं को निर्दोष घोषित कर देता है।

