Uttarakhand: उत्तराखंड सरकार ने राज्य की मदरसा शिक्षा व्यवस्था में एक ऐतिहासिक और दूरगामी बदलाव की घोषणा की है।
सरकार ने साल 2027-28 से प्रदेश के 456 मदरसों को दी जाने वाली सरकारी आर्थिक मदद को चरणबद्ध तरीके से बंद करने का निर्णय लिया है।
इस बदलाव को अमलीजामा पहनाने के लिए पुराने मदरसा बोर्ड को पूरी तरह भंग कर दिया गया है और उसकी जगह एक नया निकाय ‘उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ गठित किया गया है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार का तर्क है कि इस कदम से अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चे सिर्फ पारंपरिक शिक्षा तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर बनकर मुख्यधारा की नौकरियों में अपनी जगह बना सकेंगे।
सरकारी नौकरियों का नया रास्ता
Uttarakhand: अब तक मदरसों से मिलने वाले ‘मौलवी’, ‘आलिम’ और ‘मुंशी’ जैसे प्रमाण पत्र सरकारी नौकरियों के आवेदन के लिए मान्य नहीं माने जाते थे, जिससे यहाँ के छात्रों के लिए रोजगार के अवसर बेहद सीमित थे।
नए नियमों के तहत, राज्य के 9वीं से 12वीं कक्षा तक के 52 बड़े मदरसों को अनिवार्य रूप से ‘उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड’ (UBSE) से संबद्ध होना होगा।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि इन मदरसों से निकलने वाले बच्चे भी सामान्य स्कूलों के छात्रों की तरह हर सरकारी प्रतियोगी परीक्षा में बैठने के पात्र हो जाएँगे।
मुख्यधारा से जुड़ेंगे 400 से अधिक मदरसे
Uttarakhand: प्राधिकरण की नई नीति के अनुसार, पहली से आठवीं कक्षा तक के करीब 400 छोटे मदरसों के लिए जिला स्तर से मान्यता लेना अनिवार्य कर दिया गया है।
सरकार का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इन संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों को भी वही आधुनिक शिक्षा मिले जो किसी भी निजी या सरकारी स्कूल के छात्र को मिलती है।
हालांकि, यह साफ किया गया है कि जो मदरसे केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत मान्यता प्राप्त हैं, उन्हें मिलने वाली केंद्रीय वित्तीय सहायता पहले की तरह जारी रहेगी।
इंफ्रास्ट्रक्चर और शिक्षकों के लिए कड़े मानक
Uttarakhand: मदरसों में शिक्षा के गिरते स्तर को सुधारने के लिए सरकार ने बुनियादी सुविधाओं और शिक्षकों की योग्यता को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं:
- हवादार क्लासरूम और खुद की जमीन: हर मदरसे के पास अपनी जमीन और पर्याप्त हवादार कमरे होने चाहिए।
- योग्य शिक्षक: अब मदरसों में पढ़ाने वाले शिक्षकों का बीएड (B.Ed) और टीईटी (TET) पास होना अनिवार्य होगा।
- आधुनिक सुविधाएं: विज्ञान को बढ़ावा देने के लिए हर संस्थान में साइंस लैब और एक अच्छी लाइब्रेरी का होना जरूरी कर दिया गया है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई मदरसा इन कड़े मानकों को पूरा नहीं कर पाता है, तो उसे जबरन बंद नहीं किया जाएगा; बल्कि वहाँ पढ़ रहे बच्चों का दाखिला पास के अन्य अच्छे स्कूलों में करा दिया जाएगा ताकि उनकी पढ़ाई का नुकसान न हो।
सर्वे की हैरान करने वाली रिपोर्ट बनी फैसले का आधार
Uttarakhand: इस बड़े प्रशासनिक फेरबदल के पीछे सरकार द्वारा कराया गया एक हालिया सर्वे है, जिसके आंकड़े काफी चौंकाने वाले थे। सर्वे में सामने आया कि 9वीं से 12वीं तक के 54 मदरसों में कुल मिलाकर सिर्फ 99 छात्र ही नामांकित थे।
इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह थी कि इनमें से 30 मदरसे ऐसे थे जहाँ एक भी छात्र नहीं पढ़ रहा था, और केवल 9 मदरसे ही ऐसे मिले जहाँ छात्रों की संख्या 10 से अधिक थी।
इसी खालीपन और गिरते स्तर को देखते हुए व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए यह कदम उठाया गया है।
सभी अल्पसंख्यक समुदायों को मिलेगा समान अवसर
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अनुसार, इस फैसले का उद्देश्य किसी भी धर्म या सांस्कृतिक परंपरा को ठेस पहुँचाना नहीं है।
सरकार चाहती है कि बच्चे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने के साथ-साथ कंप्यूटर, गणित, अंग्रेजी और विज्ञान जैसे आधुनिक विषयों में भी महारत हासिल करें।
इसके अलावा, यह नया नियम सिर्फ मुस्लिम समुदाय तक सीमित नहीं है; इसके तहत राज्य के सभी 6 अल्पसंख्यक समुदायों (मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी) के बच्चों को आगे बढ़ने के समान अवसर मिलेंगे।
फैसले पर उठे सवाल
Uttarakhand: इस नीतिगत बदलाव को लेकर मुस्लिम संगठनों और धर्मगुरुओं के बीच अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
मुस्लिम जमात के अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन और जमात-ए-इस्लामी के मोहम्मद सलीम ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि कई मदरसों में पहले से ही हिंदी और अंग्रेजी जैसे विषय पढ़ाए जा रहे हैं, इसलिए इस फैसले पर पुनर्विचार होना चाहिए।
दूसरी तरफ, ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के मौलाना साजिद रशीदी का मानना है कि जो मदरसे समाज के चंदे (निजी स्रोतों) से चलते हैं, उन पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ेगा, उन्हें बस नए प्राधिकरण के तहत पंजीकरण कराना होगा।
इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट के उस पुराने फैसले का भी हवाला दिया जा रहा है, जिसमें अदालत ने कहा था कि सरकार शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए नियम तो बना सकती है, लेकिन उसे संविधान द्वारा अल्पसंख्यकों को दिए गए अधिकारों का भी पूरा सम्मान करना होगा।
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