Wednesday, September 16, 2026

UPI नहीं रहा मुफ्त, अब ₹2000 के ऊपर चार्ज, कैश रखना होगी मजबूरी?

UPI की मुफ्त दुनिया में MDR की एंट्री, 2000 रुपये के बाद बदलेगा हिसाब

देश में डिजिटल भुगतान की तस्वीर बदलने जा रही है। 15 अक्टूबर 2026 से चुनिंदा व्यापारी UPI भुगतानों पर Merchant Discount Rate यानी MDR लागू होगा। 2000 रुपये से अधिक के सामान्य P2M भुगतान पर व्यापारी से 0.4 प्रतिशत शुल्क लिया जाएगा।

नया नियम ग्राहक द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति को भेजे गए पैसे पर लागू नहीं होगा। यानी दोस्त, रिश्तेदार, मकान मालिक या किसी अन्य व्यक्ति को 50 हजार या एक लाख रुपये भेजने पर भी MDR नहीं लगेगा। बदलाव मुख्यतः व्यापारी भुगतान से जुड़ा है।

2000 रुपये तक भुगतान मुफ्त, उसके बाद बदलेगा हिसाब

दुकानदार को किया गया UPI भुगतान 2000 रुपये तक है तो पुरानी व्यवस्था जारी रहेगी। लेकिन सामान्य व्यापारी को भुगतान 2000 रुपये पार करते ही 0.4 प्रतिशत MDR लागू होगा। 3000 रुपये के भुगतान पर व्यापारी की लागत 12 रुपये बनेगी।

इसी हिसाब से 5000 रुपये के भुगतान पर 20 रुपये और 10 हजार रुपये के भुगतान पर 40 रुपये MDR बनेगा। नियम ग्राहक से सीधे शुल्क वसूलने का नहीं है। आधिकारिक व्यवस्था में यह लागत भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारी से ली जाएगी।

75 हजार रुपये या उससे अधिक के सामान्य व्यापारी भुगतान में MDR लगातार बढ़ता नहीं रहेगा। इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति लेनदेन तय की गई है। यानी एक निश्चित राशि के बाद व्यापारी पर लगने वाला शुल्क 300 रुपये से आगे नहीं जाएगा।

सवाल ग्राहक का नहीं, दुकानदार की लागत का है

सरकार और भुगतान व्यवस्था से जुड़े पक्षों का स्पष्ट कहना है कि ग्राहक के UPI भुगतान पर शुल्क नहीं लगाया गया है। वास्तविक बहस इस बात पर है कि व्यापारी पर आने वाली नई लागत आखिरकार उसके मुनाफे में समाएगी या कीमतों में।

कम मार्जिन पर काम करने वाले कारोबारी के लिए 0.4 प्रतिशत देखने में छोटी संख्या हो सकती है, लेकिन रोज बड़ी संख्या में डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर यही रकम महत्वपूर्ण लागत बन सकती है। उद्योग विशेषज्ञों ने छोटे मार्जिन वाले व्यापारियों पर दबाव की आशंका जताई है।

यहीं से ग्राहक के लिए असली चिंता शुरू होती है। दुकानदार को यदि UPI स्वीकार करने पर अतिरिक्त लागत दिखाई देती है तो उसके सामने तीन विकल्प होंगे। लागत स्वयं उठाए, वस्तुओं के दाम में जोड़े या ग्राहक को नकद भुगतान के लिए प्रोत्साहित करे।

दुकान पर फिर सुनाई दे सकता है, कैश दे दीजिए

कल्पना कीजिए कि किसी ग्राहक ने 10 हजार रुपये का सामान खरीदा। व्यापारी पर 40 रुपये MDR बनेगा। बड़े स्टोर इसे सामान्य परिचालन लागत मान सकते हैं, लेकिन सीमित मार्जिन वाले कारोबार में दुकानदार नकद भुगतान को अधिक सुविधाजनक मान सकता है।

इसलिए विवाद केवल 0.4 प्रतिशत की दर का नहीं है। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि वर्षों में विकसित हुई उस आदत पर इसका क्या असर पड़ेगा जिसमें ग्राहक और दुकानदार दोनों बिना शुल्क की चिंता किए सीधे QR स्कैन करते हैं।

UPI की सफलता में तकनीक के साथ उसकी सरलता भी निर्णायक रही है। मोबाइल निकाला, QR स्कैन किया और भुगतान पूरा। ग्राहक को अलग शुल्क की गणना नहीं करनी पड़ी और व्यापारी के लिए भी लंबे समय तक शून्य MDR व्यवस्था महत्वपूर्ण रही।

छोटे दुकानदारों के लिए राहत का प्रावधान

नई व्यवस्था में छोटे व्यापारियों के लिए महत्वपूर्ण छूट रखी गई है। ऐसे पात्र छोटे व्यापारी जिनके QR पर एक महीने में एक लाख रुपये से अधिक UPI भुगतान प्राप्त नहीं होते, उनके लिए MDR शून्य ही रहने की व्यवस्था बताई गई है।

इस छूट के कारण हर चायवाला, ठेला संचालक या छोटी दुकान स्वतः MDR के दायरे में नहीं आ जाएगी। वास्तविक प्रभाव व्यापारी की श्रेणी, उसके मासिक UPI भुगतान और लेनदेन की राशि पर निर्भर करेगा। इसलिए हर QR भुगतान को शुल्क वाला बताना गलत होगा।

सरकारी पक्ष का तर्क है कि अधिकांश व्यापारी UPI लेनदेन 2000 रुपये से नीचे होते हैं, इसलिए रोजमर्रा के बहुत बड़े हिस्से पर नई दर का प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि आलोचना लेनदेन संख्या के बजाय बड़ी रकम वाले भुगतानों के आर्थिक महत्व पर केंद्रित है।

राहुल गांधी ने उठाया अमेरिकी दबाव का सवाल

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बदलाव की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने 2000 रुपये से अधिक के व्यापारी UPI भुगतानों पर शुल्क लगाने का रास्ता खोला और इसका वास्तविक बोझ अंततः कीमतों के जरिए ग्राहकों तक पहुंच सकता है।

राहुल गांधी ने इसे अमेरिकी भुगतान कंपनियों की लंबे समय से चली आ रही शून्य MDR नीति संबंधी आपत्तियों से भी जोड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि नीति परिवर्तन अमेरिकी दबाव की दिशा में कदम है। यह कांग्रेस का राजनीतिक आरोप है, स्थापित तथ्य नहीं।

इस विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यही है कि नीति के आर्थिक कारण और राजनीतिक व्याख्या अलग अलग हैं। उपलब्ध आधिकारिक विवरण MDR को भुगतान प्रणाली की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता से जोड़ते हैं, जबकि विपक्ष इसे उपभोक्ता और व्यापारी पर संभावित बोझ बता रहा है।

सरकार को सीधे नहीं मिलेगा MDR का पैसा

सोशल मीडिया पर इसे सरकारी टैक्स या सरकार की सीधी कमाई के रूप में भी पेश किया जा रहा है, लेकिन यह विवरण सटीक नहीं है। MDR भुगतान प्रणाली से जुड़े प्रतिभागियों के बीच बांटा जाने वाला शुल्क है, सीधे सरकारी राजस्व में जाने वाला कर नहीं।

इसलिए यह कहना कि हर 10 हजार रुपये के UPI भुगतान में सरकार सीधे अपना हिस्सा काट लेगी, नई व्यवस्था का सही वर्णन नहीं होगा। शुल्क व्यापारी पक्ष पर लगाया जाएगा और भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र के विभिन्न प्रतिभागियों के बीच उसका वितरण होगा।

इसके बावजूद व्यापारी की लागत वाला प्रश्न बना रहता है। कोई शुल्क सरकार को मिले या भुगतान कंपनियों और बैंकों के बीच बंटे, दुकान के खाते से निकलने वाली राशि व्यापारी के लिए वास्तविक खर्च है और व्यावसायिक फैसलों पर उसका प्रभाव पड़ सकता है।

2 प्रतिशत नहीं, सामान्य दर 0.4 प्रतिशत

वायरल संदेशों में कई जगह दावा किया जा रहा है कि 2000 रुपये से ज्यादा UPI भुगतान पर दुकानदार से 2 प्रतिशत अतिरिक्त लिया जाएगा। घोषित सामान्य MDR दर 2 प्रतिशत नहीं बल्कि 0.4 प्रतिशत है, इसलिए 10 हजार पर शुल्क 40 रुपये बनेगा।

ऐसे में 10 हजार रुपये की खरीद पर दुकानदार द्वारा 200 रुपये अतिरिक्त मांगने वाला वायरल उदाहरण मौजूदा घोषित दर से मेल नहीं खाता। यह अलग बात है कि व्यापारी अपनी लागत की भरपाई किस तरीके से करता है, लेकिन निर्धारित MDR 40 रुपये होगा।

रेलवे, पेट्रोल, बीमा और टेलीकॉम के लिए अलग व्यवस्था

सभी क्षेत्रों पर सामान्य 0.4 प्रतिशत दर समान तरीके से लागू नहीं की गई है। रेलवे, टेलीकॉम, बीमा और ईंधन जैसी चिन्हित श्रेणियों में 2000 रुपये से अधिक के भुगतान पर प्रतिशत आधारित MDR की जगह पांच रुपये का निश्चित शुल्क रखा गया है।

इसका अर्थ है कि यदि किसी पात्र श्रेणी में भुगतान 3000 रुपये हो या काफी अधिक, वहां सामान्य व्यापारी वाला 0.4 प्रतिशत फार्मूला लागू नहीं होगा। ऐसी श्रेणियों को कम शुल्क वाला अलग ढांचा देने का प्रावधान नई व्यवस्था में शामिल है।

शेयर और सिक्योरिटीज भुगतान पर 0.02 प्रतिशत

कैपिटल मार्केट से जुड़े कुछ भुगतानों के लिए भी अलग दर तय की गई है। म्यूचुअल फंड, शेयर, सिक्योरिटीज और स्टॉक ब्रोकर से जुड़े पात्र भुगतानों पर MDR 0.02 प्रतिशत रखा गया है और यहां भी अधिकतम सीमा 300 रुपये है।

वहीं UPI AutoPay या Mandate के जरिए चल रही नियमित म्यूचुअल फंड SIP जैसी आवर्ती व्यवस्थाओं को सामान्य भुगतान से अलग समझना आवश्यक है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ऐसी recurring mandate व्यवस्था पर निर्धारित MDR लेनदेन शुल्क लागू नहीं होगा।

आखिर UPI को शुल्क की जरूरत क्यों पड़ी

नई व्यवस्था के समर्थन में सबसे बड़ा तर्क डिजिटल भुगतान ढांचे की लागत है। UPI चलाने के लिए बैंकिंग सिस्टम, सर्वर, साइबर सुरक्षा, भुगतान प्रसंस्करण, तकनीकी निवेश, नेटवर्क विस्तार और लगातार बढ़ती ट्रांजैक्शन क्षमता पर खर्च करना पड़ता है।

समर्थक पक्ष का कहना है कि जब UPI का आकार लगातार बढ़ रहा है तो पूरे सिस्टम की लागत केवल प्रोत्साहन या दूसरे स्रोतों से चलाते रहना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता। MDR से प्राप्त संसाधन तकनीकी ढांचे और नेटवर्क विस्तार में लगाए जा सकते हैं।

इस तर्क का दूसरा पहलू भी है। आलोचक पूछ रहे हैं कि यदि UPI ने नकदी प्रबंधन की जरूरत कम की, डिजिटल रिकॉर्ड बढ़ाया और अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने में मदद की, तो उसकी व्यवस्था को व्यापक सार्वजनिक डिजिटल बुनियादी ढांचे की तरह क्यों नहीं देखा जाए।

नकदी भी कभी मुफ्त व्यवस्था नहीं थी

नकद अर्थव्यवस्था को चलाने में भी भारी लागत आती है। नोटों की छपाई, वितरण, ATM व्यवस्था, सुरक्षा, नकदी परिवहन, बैंक शाखाओं में संभाल और कारोबारियों के लिए नकदी प्रबंधन जैसी अनेक लागतें दिखाई नहीं देतीं, लेकिन आर्थिक व्यवस्था उन्हें वहन करती है।

इसी कारण केवल UPI के प्रत्यक्ष परिचालन खर्च को देखकर डिजिटल भुगतान को महंगा बताना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। डिजिटल व्यवस्था से होने वाली बचत, सुविधाजनक लेनदेन, बेहतर रिकॉर्ड और औपचारिक आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि जैसे लाभ भी आर्थिक गणना का हिस्सा हैं।

सवाल है, व्यापारी शुल्क खुद क्यों उठाए

UPI की पहुंच भारत में इतनी व्यापक इसलिए बनी क्योंकि छोटे से छोटे दुकानदार तक QR लगाने में आर्थिक बाधा बेहद कम रही। जब भुगतान स्वीकार करने पर प्रतिशत आधारित खर्च जुड़ता है तो व्यापारी स्वाभाविक रूप से उसकी तुलना नकद भुगतान की प्रत्यक्ष लागत से करेगा।

ग्राहक से शुल्क नहीं लेने की घोषणा अपने आप यह सुनिश्चित नहीं करती कि ग्राहक की कुल लागत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। बाजार में व्यवसाय अक्सर परिवहन, किराया, कर, पैकेजिंग और भुगतान जैसी परिचालन लागतों को उत्पाद की अंतिम कीमत में समायोजित करते हैं।

हालांकि यह भी निश्चित नहीं कहा जा सकता कि प्रत्येक व्यापारी पूरा MDR ग्राहक पर डाल देगा। प्रतिस्पर्धा, कारोबार का मार्जिन, ग्राहक व्यवहार और बिक्री की मात्रा तय करेगी कि कौन व्यापारी शुल्क स्वयं वहन करता है और कौन कीमत या भुगतान विकल्प बदलता है।

क्या नकद भुगतान की वापसी होगी

सबसे गंभीर आशंका यह है कि बड़े भुगतान पर दुकानदार फिर नकद मांगना शुरू कर सकते हैं। यदि ग्राहक को बार बार यह सुनने को मिलता है कि UPI की जगह नकदी देने पर दुकानदार की लागत बचेगी, तो भुगतान व्यवहार धीरे बदल सकता है।

हालांकि इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि UPI समाप्त हो जाएगा या क्रेडिट कार्ड जैसी स्थिति हो जाएगी। UPI का नेटवर्क, सुविधा, उपयोगकर्ता आधार और व्यक्ति से व्यक्ति मुफ्त भुगतान व्यवस्था इतनी व्यापक है कि एक व्यापारी शुल्क से पूरी प्रणाली समाप्त होना निश्चित नहीं।

असली परीक्षा यह होगी कि अगले महीनों में बड़े व्यापारी भुगतान के दौरान व्यवहार क्या बदलता है। यदि दुकानदार सामान्य रूप से UPI स्वीकार करते रहते हैं तो असर सीमित रह सकता है। यदि नकदी मांगने की प्रवृत्ति बढ़ती है तो नीति की समीक्षा का दबाव बढ़ेगा।

गांव और कस्बों में असर अलग हो सकता है

शहरी संगठित कारोबार और ग्रामीण छोटे व्यापार की परिस्थितियां समान नहीं हैं। गांव और कस्बों में कई कारोबारी आज भी नकद और UPI दोनों साथ रखते हैं। डिजिटल भुगतान से जुड़ा रिकॉर्ड और कर अनुपालन कुछ छोटे कारोबारियों के लिए पहले से चिंता का विषय है।

ऐसे कारोबारी यदि MDR को नई अतिरिक्त लागत के रूप में देखते हैं तो नकद को प्राथमिकता देने का मनोवैज्ञानिक कारण और बढ़ सकता है। सरकार की छोटे व्यापारियों वाली छूट इस प्रभाव को सीमित कर सकती है, लेकिन वास्तविक परिणाम उपयोग के आंकड़ों से ही स्पष्ट होगा।

2000 रुपये कोई बहुत बड़ी खरीद नहीं

नीति पर आलोचना का एक आधार 2000 रुपये की सीमा भी है। आज कपड़े, जूते, चश्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, घरेलू सामान या महीने भर का किराना खरीदते समय 2000 रुपये की सीमा पार होना सामान्य बात है। इसलिए इसे केवल महंगी खरीद कहना कठिन है।

एक परिवार यदि महीने का राशन 5000 रुपये में खरीदता है और UPI से भुगतान करता है तो सामान्य व्यापारी श्रेणी में 20 रुपये MDR बनेगा। ग्राहक से सीधे नहीं लिया जाएगा, लेकिन दुकानदार की लागत का सवाल ऐसे रोजमर्रा के लेनदेन में भी पैदा होगा।

लेनदेन संख्या और रकम का फर्क समझना जरूरी

नई व्यवस्था के बचाव में यह बताया जा रहा है कि 2000 रुपये से अधिक वाले व्यापारी लेनदेन कुल P2M ट्रांजैक्शन की अपेक्षाकृत छोटी हिस्सेदारी हैं। इसलिए संख्या के आधार पर अधिकतर UPI भुगतान पुराने तरीके से ही मुफ्त बने रहेंगे।

दूसरी ओर आलोचक रकम के आधार पर तस्वीर देखने की बात कर रहे हैं। बड़ी राशि वाले लेनदेन संख्या में कम होने के बावजूद कुल भुगतान मूल्य में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखते हैं। इसलिए प्रभावित ट्रांजैक्शन की संख्या और प्रभावित रुपये की मात्रा अलग प्रश्न हैं।

RBI और बैंक मुनाफे का तर्क

बहस में RBI के अधिशेष, बैंकों के मुनाफे और NPCI की वित्तीय स्थिति का उल्लेख करते हुए पूछा जा रहा है कि लाभ में चल रही वित्तीय व्यवस्था के बीच व्यापारी से नई वसूली की जरूरत क्यों आई। यह नीति विरोधियों का प्रमुख आर्थिक तर्क है।

लेकिन किसी संस्था का लाभ में होना अपने आप यह सिद्ध नहीं करता कि हर सेवा की सीमांत लागत शून्य है। UPI संचालन, साइबर सुरक्षा और नेटवर्क विस्तार की लागत वास्तविक है। विवाद मूलतः इस बात पर है कि उस लागत का भुगतान कौन करे।

एक मॉडल में सरकार सब्सिडी के जरिए लागत का हिस्सा उठाती है। दूसरे में बैंक या भुगतान कंपनियां उठाती हैं। तीसरे में व्यापारी से शुल्क लिया जाता है। नई व्यवस्था ने बड़े व्यापारी भुगतानों के एक हिस्से में तीसरे विकल्प को फिर जगह दी है।

डिजिटल इंडिया की सफलता और नई दुविधा

UPI को भारत की सबसे सफल डिजिटल सार्वजनिक व्यवस्थाओं में गिना जाता है। अगस्त 2026 में लगभग 24 अरब UPI लेनदेन हुए और उनका मूल्य करीब 311 अरब डॉलर रहा। इतने बड़े नेटवर्क के लिए वित्तीय टिकाऊपन का सवाल स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है।

लेकिन इसी सफलता ने सरकार के सामने मुश्किल भी पैदा की है। जिस सेवा की सबसे बड़ी पहचान मुफ्त और बेहद आसान भुगतान रही हो, उसमें शुल्क का कोई भी नया तत्व तकनीकी बदलाव से अधिक मनोवैज्ञानिक संदेश देता है, खासकर व्यापारियों के बीच।

क्या 0.4 प्रतिशत से व्यवहार बदल जाएगा

किसी बड़ी रिटेल श्रृंखला के लिए 40 या 100 रुपये जैसी MDR लागत कुल कारोबार में मामूली हो सकती है। लेकिन कम मार्जिन वाले इलेक्ट्रॉनिक्स, थोक, किराना या अन्य व्यापार में कारोबारी हर अतिरिक्त प्रतिशत को अलग तरीके से देखते हैं।

यही कारण है कि वास्तविक असर केवल शुल्क की दर से तय नहीं होगा। दुकानदार कितनी आसानी से नकद स्वीकार कर सकता है, उसका मार्जिन कितना है, ग्राहक किस भुगतान तरीके पर जोर देता है और प्रतिस्पर्धी क्या कर रहे हैं, यह सब परिणाम बदलेंगे।

चुनावी समय को लेकर उठे सवाल

नई UPI व्यवस्था ऐसे समय आई है जब आने वाले राज्यों के चुनावों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं। आलोचक फैसले की टाइमिंग को लेकर प्रश्न उठा रहे हैं, जबकि शुल्क की घोषणा को चुनावी उद्देश्य से जोड़ने वाला कोई स्थापित प्रमाण सामने नहीं है।

राजनीतिक दृष्टि से जोखिम यह है कि तकनीकी भुगतान नीति बहुत जल्दी रोजमर्रा की जेब से जुड़ा मुद्दा बन जाती है। कोई व्यापारी यदि ग्राहक से नकद मांगना शुरू करता है तो जटिल MDR व्यवस्था सीधे स्थानीय आर्थिक नाराजगी के रूप में दिखाई दे सकती है।

इसी वजह से सरकार के लिए चुनौती केवल नई व्यवस्था समझाना नहीं होगी। उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ग्राहक को अतिरिक्त भुगतान न करना पड़े और व्यापारी UPI से दूरी न बनाएं। नीति का वास्तविक मूल्यांकन व्यवहार में आए बदलाव से होगा।

UPI पर अब निर्णायक परीक्षा

15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाला नया MDR ढांचा UPI को ग्राहक के लिए सीधे शुल्क वाला सिस्टम नहीं बना रहा। P2P भुगतान मुफ्त रहेंगे, 2000 रुपये तक के P2M भुगतान मुफ्त रहेंगे और पात्र छोटे व्यापारियों को भी राहत मिलेगी।

लेकिन शून्य MDR की सार्वभौमिक व्यापारी व्यवस्था से यह स्पष्ट बदलाव है। अब पहली बार बड़ी संख्या में सामान्य बड़े व्यापारी UPI भुगतानों के साथ प्रत्यक्ष प्रतिशत आधारित लागत जुड़ जाएगी। इसी कारण बहस केवल शुल्क की रकम नहीं, डिजिटल भुगतान मॉडल की दिशा पर है।

सरकार और भुगतान व्यवस्था के सामने अब सबसे महत्वपूर्ण चुनौती यही है कि वित्तीय टिकाऊपन हासिल करते हुए UPI की सबसे बड़ी पूंजी न खोई जाए। वह पूंजी किसी विज्ञापन से नहीं बनी थी। वह थी ग्राहक और दुकानदार का यह भरोसा कि भुगतान सरल रहेगा।

यदि नई लागत व्यापारियों के व्यवहार को नहीं बदलती और नेटवर्क बेहतर होता है तो MDR व्यवस्था टिकाऊ मॉडल के रूप में स्थापित हो सकती है। यदि दुकानदार नकद मांगने लगते हैं और कीमतों में लागत जोड़ते हैं तो नीति के आर्थिक लाभ पर गंभीर सवाल उठेंगे।

UPI फिलहाल खत्म नहीं हो रहा, न हर भुगतान पर शुल्क लग रहा है। लेकिन भारत के शून्य MDR दौर में एक महत्वपूर्ण बदलाव जरूर आया है। अब निगाह इस पर होगी कि 0.4 प्रतिशत की यह छोटी दिखने वाली संख्या बाजार में कितना बड़ा व्यवहार परिवर्तन लाती है।

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Mudit
Mudit
लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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