2017 से पहले और बाद का UP: अगर किसी गांव में सुबह से रात तक बिजली आती रहे, पंखे चलते रहें, किसान समय पर खेत की सिंचाई कर सके और बच्चे बिना रुकावट पढ़ाई कर सकें, तो यह आज सामान्य बात लग सकती है।
लेकिन कुछ साल पीछे जाकर देखें तो उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में बिजली की उपलब्धता खुद एक बड़ा सवाल हुआ करती थी।
उस दौर में बिजली का बिल कितना आया, इससे ज्यादा चिंता इस बात की रहती थी कि बिजली आएगी भी या नहीं और अगर आएगी तो कितनी देर तक रहेगी।
इसीलिए उत्तर प्रदेश के बिजली क्षेत्र में बदलाव को समझने के लिए 2017 से पहले और उसके बाद के दौर को साथ रखकर देखना जरूरी है।
2017 से पहले: लक्ष्य बड़े, लेकिन जमीन पर चुनौतियां बरकरार
2017 से पहले और बाद का UP: 2017 से पहले अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी सरकार के दौरान शहरों को 24 घंटे और गांवों को 16 घंटे बिजली देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
हालांकि, सरकारी लक्ष्य और जमीनी स्थिति के बीच काफी अंतर दिखाई देता था।
ग्रामीण इलाकों में कई जगह बिजली की उपलब्धता निर्धारित घंटों से कम रहती थी।
इसके अलावा लो-वोल्टेज, ट्रांसफॉर्मर खराब होने और स्थानीय फॉल्ट जैसी समस्याएं भी लगातार बनी रहती थीं।
इसका मतलब यह था कि बिजली उपलब्ध कराने का लक्ष्य तय होने के बावजूद उसे गांव-गांव तक स्थिर और भरोसेमंद तरीके से पहुंचाने वाला वितरण ढांचा कई जगह पर्याप्त मजबूत नहीं था।
2017 के बाद बदला फोकस, सिर्फ रोस्टर नहीं बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर
2017 से पहले और बाद का UP: 2017 में सत्ता परिवर्तन के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार ने बिजली आपूर्ति के लिए नया रोस्टर लागू किया।
इसके तहत जिला मुख्यालयों को 24 घंटे, तहसीलों को 20 घंटे और ग्रामीण क्षेत्रों को 18 घंटे बिजली देने का लक्ष्य रखा गया।
हालांकि, सिर्फ बिजली आपूर्ति के घंटे तय कर देने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता था।
ग्रामीण क्षेत्रों तक बिजली पहुंचाने के लिए पुराने तारों, कमजोर ट्रांसफॉर्मरों और ओवरलोड सब-स्टेशनों की समस्या को भी दूर करना जरूरी था।
इसी दिशा में सरकार ने नए सब-स्टेशन बनाने, पुराने ट्रांसफॉर्मरों की क्षमता बढ़ाने और वितरण नेटवर्क को मजबूत करने पर जोर दिया।
इसके साथ ही सौभाग्य योजना के जरिए बड़ी संख्या में ऐसे ग्रामीण परिवारों को बिजली कनेक्शन उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया, जो लंबे समय तक बिजली कनेक्शन से वंचित रहे थे।
कनेक्शन और नेटवर्क बढ़ा तो बिजली की मांग भी तेजी से बढ़ी
बिजली के क्षेत्र में बदलाव का एक बड़ा संकेत राज्य की बढ़ती बिजली मांग में भी दिखाई देता है।
2017 के आसपास उत्तर प्रदेश की पीक बिजली मांग करीब 15 से 17 हजार मेगावाट के स्तर पर थी।
वहीं जून 2026 में राज्य की पीक डिमांड 32,673 मेगावाट तक पहुंच गई।
बिजली की मांग में यह बढ़ोतरी सिर्फ आबादी या गर्मी के असर को नहीं दिखाती, बल्कि राज्य में बढ़े कनेक्शन, घरेलू बिजली के इस्तेमाल, कृषि और आर्थिक गतिविधियों के विस्तार के साथ बिजली की बढ़ती जरूरत को भी दर्शाती है।
किसानों के लिए बिजली: बिल से लेकर सोलर पंप तक
बिजली व्यवस्था में बदलाव का असर कृषि क्षेत्र पर भी पड़ा। निजी ट्यूबवेल के बिजली बिलों में राहत देने के साथ-साथ सोलर पंपों को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया।
इसका उद्देश्य किसानों की सिंचाई लागत को कम करना और पारंपरिक बिजली पर निर्भरता घटाना था।
इसी अवधि में उत्तर प्रदेश की सौर ऊर्जा क्षमता में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, राज्य की सोलर क्षमता 2017 में करीब 337 मेगावाट थी, जो बाद के वर्षों में बढ़कर 3,300 मेगावाट से अधिक हो गई।
क्या यूपी में बिजली की समस्या पूरी तरह खत्म हो गई?
हालांकि बिजली के क्षेत्र में बदलाव दिखाई देता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उत्तर प्रदेश में बिजली से जुड़ी सभी समस्याएं खत्म हो गई हैं।
गर्मियों के मौसम में आज भी कई इलाकों से ओवरलोडिंग, लो-वोल्टेज और स्थानीय फॉल्ट के कारण बिजली कटौती की शिकायतें सामने आती हैं।
फर्क यह है कि समस्या का स्वरूप काफी हद तक बदला है। पहले बड़ी चुनौती बिजली की उपलब्धता और कनेक्शन की थी, जबकि अब कई क्षेत्रों में चुनौती बढ़ती मांग के मुताबिक स्थानीय वितरण नेटवर्क को लगातार मजबूत बनाए रखने की है।
असली पैमाना सरकारी आंकड़े नहीं, लोगों का अनुभव
2017 से पहले और बाद के यूपी की बिजली व्यवस्था की तुलना करें तो तस्वीर में एक बड़ा बदलाव नजर आता है।
पहले बिजली उपलब्ध कराने के लक्ष्य और कमजोर वितरण ढांचे के बीच अंतर एक बड़ी चुनौती था।
2017 के बाद बिजली आपूर्ति के घंटों में सुधार के साथ-साथ सब-स्टेशन, ट्रांसफॉर्मर, तारों और कनेक्शन के नेटवर्क को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया।
लेकिन बिजली व्यवस्था की सफलता का अंतिम पैमाना सिर्फ सरकारी आंकड़े नहीं हो सकते।
असली सवाल यह है कि इन बदलावों का असर आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में कितना दिखाई देता है।
क्या आज गांव में किसान बिना बिजली कटौती की चिंता के समय पर सिंचाई कर पा रहा है?
क्या बच्चों की पढ़ाई बिजली की अनिश्चितता से प्रभावित नहीं होती?
और क्या आपके गांव में तय किए गए बिजली के घंटे वास्तव में जमीन पर भी उतने ही घंटे मिलते हैं?
यूपी की बिजली व्यवस्था में बदलाव को समझने के लिए शायद यही सबसे अहम सवाल हैं।

