UP की शिक्षा व्यवस्था: उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों को लेकर लंबे समय तक सबसे बड़ा सवाल उनकी बुनियादी सुविधाओं और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर रहा है।
लेकिन 2017 के बाद राज्य की स्कूल व्यवस्था में infrastructure से लेकर technology और सरकारी सुविधाओं की delivery तक कई स्तरों पर बदलाव किए गए।
ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या ये बदलाव सिर्फ स्कूलों की दीवारों और रंग-रोगन तक सीमित रहे या फिर पूरी शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक परिवर्तन आया?
इस सवाल का जवाब समझने के लिए 2017 से पहले की स्थिति और उसके बाद हुए बदलावों को आंकड़ों के साथ देखना जरूरी है।
2017 से पहले सरकारी स्कूलों की तस्वीर क्या थी?
UP की शिक्षा व्यवस्था: 2017 में विधानसभा में रखी गई CAG की रिपोर्ट ने उत्तर प्रदेश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था की कई कमियों को सामने रखा था। यह ऑडिट 31 मार्च 2016 तक की स्थिति से संबंधित था।
रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के करीब 1.60 लाख स्कूलों में से 1,366 स्कूल ऐसे थे जो आवश्यक भवन के बिना, टिन या फूस की छत, किराए या जर्जर इमारतों में चल रहे थे।
2,978 स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा नहीं थी, जबकि करीब 1,734 स्कूलों में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं थे।
स्थिति यहीं खत्म नहीं होती। CAG के अनुसार 50,849 स्कूलों में खेल के मैदान और 35,995 स्कूलों में पुस्तकालय की सुविधा नहीं थी।
करीब 34,098 स्कूलों में बिजली उपलब्ध नहीं थी, जबकि वायरिंग और इलेक्ट्रिकल फिटिंग पर ₹64.22 करोड़ खर्च किए जा चुके थे। यानी समस्या केवल बजट की नहीं, बल्कि सुविधाओं को जमीन तक पहुंचाने और उनके इस्तेमाल की भी थी।
बच्चों तक सुविधाएं पहुंचाना भी चुनौती थी
UP की शिक्षा व्यवस्था: उस दौर की एक बड़ी समस्या सरकारी योजनाओं के implementation से जुड़ी थी। CAG ने पाया कि 2012 से 2016 के बीच 6.22 लाख बच्चों को मुफ्त पाठ्यपुस्तकें नहीं मिल पाईं, जबकि इसके लिए पर्याप्त धन उपलब्ध था।
इसी अवधि में 97 लाख बच्चों को यूनिफॉर्म उपलब्ध नहीं कराई गई। कई जगह किताबें एक से तीन महीने तक की देरी से पहुंचीं।
शिक्षकों को लेकर भी सवाल उठे। CAG की रिपोर्ट के मुताबिक 18,119 प्राथमिक और 30,730 उच्च प्राथमिक शिक्षकों के पास आवश्यक योग्यता नहीं थी।
इसका मतलब यह था कि स्कूलों की समस्या केवल भवन या फर्नीचर तक सीमित नहीं थी; teacher availability, qualification और व्यवस्था की निगरानी भी शिक्षा की बड़ी चुनौती थी।
2017 के बाद शुरू हुआ ऑपरेशन कायाकल्प
2017 में योगी आदित्यनाथ सरकार के सत्ता में आने के बाद सरकारी स्कूलों के infrastructure को बड़े स्तर पर सुधारने पर जोर दिया गया। इसी दिशा में ऑपरेशन कायाकल्प महत्वपूर्ण कार्यक्रम बना।
इसका उद्देश्य केवल रंगाई-पुताई करना नहीं था, बल्कि स्कूलों को निर्धारित बुनियादी मानकों के अनुसार विकसित करना था।
इसके तहत पेयजल, अलग शौचालय, हैंडवॉशिंग, कक्षा-कक्षों में टाइलिंग, आधुनिक ब्लैकबोर्ड, रसोई, बिजली और वायरिंग, पानी की सप्लाई, रैंप-रेलिंग, सफाई, पुस्तकालय और फर्नीचर जैसी सुविधाओं पर काम किया गया।
उत्तर प्रदेश सरकार की 2025 की जानकारी के अनुसार 97 प्रतिशत विद्यालयों को 19 निर्धारित मानकों पर संतृप्त करने का दावा किया गया है।
यानी सरकारी स्कूलों में infrastructure को पहली बार एक measurable framework के साथ सुधारने की कोशिश हुई।
स्कूल में स्मार्ट क्लास आई, लेकिन तस्वीर अभी पूरी नहीं बदली
UP की शिक्षा व्यवस्था: शिक्षा में अगला बड़ा बदलाव technology का है। UDISE+ 2024-25 के अनुसार उत्तर प्रदेश में कुल 2,62,358 स्कूल दर्ज हैं।
सरकार की हालिया जानकारी के अनुसार 25,784 परिषद स्कूलों में 5,588 ICT labs और 2.61 लाख से अधिक tablets उपलब्ध कराए गए हैं।
Smart classes और digital learning resources के जरिए classroom teaching को आधुनिक बनाने की कोशिश की जा रही है।
लेकिन यहां तस्वीर को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना भी सही नहीं होगा। Digital infrastructure का विस्तार हुआ है, लेकिन हर सरकारी स्कूल अभी smart classroom से लैस नहीं है।
यानी technology एक महत्वपूर्ण बदलाव जरूर है, मगर इसकी coverage और effective use अभी आगे की चुनौती है।
DBT ने बदला बच्चों तक सरकारी सहायता पहुंचाने का तरीका
पहले किताब और यूनिफॉर्म की supply में देरी जैसी समस्याएं CAG की रिपोर्ट में सामने आई थीं। बाद में सरकार ने इस व्यवस्था को बदलते हुए DBT मॉडल अपनाया।
2021-22 से अभिभावकों के बैंक खातों में ₹1,200 भेजने की व्यवस्था की गई, ताकि uniform, sweater, shoes, socks, school bag और stationery जैसी जरूरतें पूरी की जा सकें।
हालांकि नई व्यवस्था भी पूरी तरह समस्या-मुक्त नहीं रही। 2025 में करीब 22 लाख विद्यार्थियों के verification में देरी के कारण DBT भुगतान प्रभावित होने की खबर सामने आई थी। इससे साफ है कि mechanism बदला है, लेकिन implementation की चुनौती अभी भी मौजूद है।
क्या बच्चा पहले से बेहतर सीख रहा है?
UP की शिक्षा व्यवस्था: यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्कूल की बिल्डिंग बेहतर होना, बिजली-पानी पहुंचना, स्मार्ट क्लास लगना या DBT के जरिए सहायता मिलना जरूरी बदलाव हैं, लेकिन शिक्षा की अंतिम कसौटी learning outcome ही है।
अगर बच्चा अपनी कक्षा के स्तर की किताब नहीं पढ़ पा रहा, गणित के बुनियादी सवाल हल नहीं कर पा रहा या शिक्षक उसके learning gap को पहचानकर उस पर काम नहीं कर पा रहा, तो केवल infrastructure से शिक्षा की गुणवत्ता तय नहीं की जा सकती।
यही वजह है कि 2017 के बाद यूपी में स्कूलों की physical और administrative व्यवस्था में बदलाव जरूर दिखाई देता है, लेकिन अगला बड़ा लक्ष्य classroom learning होना चाहिए।
तो क्या यूपी के सरकारी स्कूल सच में बदले हैं?
UP की शिक्षा व्यवस्था: आंकड़ों को एक साथ देखें तो जवाब सीधा हां है, बदलाव हुआ है, लेकिन कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। 2017 से पहले CAG ने जिन बुनियादी कमियों को दर्ज किया था,
उनके जवाब में ऑपरेशन कायाकल्प, digital education, ICT labs, tablets, DBT और examination monitoring जैसी व्यवस्थाएं सामने आईं।
सरकार के अनुसार 97 प्रतिशत स्कूलों को निर्धारित infrastructure standards तक पहुंचाया गया है, जबकि UDISE+ के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश आज 2.62 लाख से अधिक स्कूलों का विशाल education network संचालित कर रहा है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि यूपी की सरकारी शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह बदल चुकी है। लेकिन यह भी सही नहीं होगा कि बदलाव सिर्फ दीवारों पर रंग लगाने तक सीमित रहा।
2017 के बाद स्कूल infrastructure, technology और delivery mechanism में वास्तविक स्तर पर कई बदलाव हुए हैं। अब असली परीक्षा यह है कि इन बदली हुई सुविधाओं का असर बच्चों की learning पर कितना पड़ता है।
क्योंकि आखिर में सरकारी स्कूल की असली सफलता उसकी चमकती दीवारों से नहीं, बल्कि वहां से निकलने वाले बच्चे के ज्ञान, आत्मविश्वास और भविष्य से तय होगी।
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