UP का किसान: उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसान कभी सिर्फ वोटर नहीं रहा। कई बार गांव, खेत और किसान की नाराजगी ने सत्ता की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई है। इसका सबसे बड़ा ऐतिहासिक उदाहरण चौधरी चरण सिंह का दौर माना जाता है।
1967 में उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर उत्तर प्रदेश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का नेतृत्व किया और ग्रामीण समाज के बीच अपनी मजबूत राजनीतिक पकड़ बनाई। बाद में 1977 के राष्ट्रीय राजनीतिक बदलाव में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।
आज करीब छह दशक बाद उत्तर प्रदेश फिर 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि किसान किसके साथ है,
बल्कि यह भी है कि 2017 से पहले और 2017 से 2026 के बीच किसान की आर्थिक और कृषि व्यवस्था में वास्तव में क्या बदलाव आया? गन्ने का भुगतान, फसल खरीद, सिंचाई, बिजली, किसान सम्मान निधि और फसल बीमा जैसे मुद्दे इस बहस के केंद्र में हैं।
यूपी की अर्थव्यवस्था में किसान की भूमिका क्यों इतनी बड़ी है?
UP का किसान: उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े कृषि राज्यों में शामिल है। गेहूं, धान, गन्ना, आलू, आम, दूध और सब्जियों के उत्पादन में प्रदेश की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यूपी गेहूं और गन्ने के उत्पादन में देश में अग्रणी है, जबकि आलू, आम और दूध जैसे क्षेत्रों में भी इसकी स्थिति मजबूत है।
यही वजह है कि यूपी की राजनीति में किसान का मुद्दा सीधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ता है। किसान को फसल का कितना दाम मिला, भुगतान कितनी जल्दी हुआ, सिंचाई पर कितना खर्च आया और प्राकृतिक नुकसान की भरपाई कितनी मिली, इन सवालों का असर करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है।
2017 से पहले किसान के सामने क्या बड़ी चुनौतियां थीं?
UP का किसान: 2017 से पहले उत्तर प्रदेश की कृषि व्यवस्था में कई पुरानी समस्याएं बनी हुई थीं। खासकर गन्ना किसानों के भुगतान और सिंचाई परियोजनाओं की धीमी प्रगति लंबे समय से राजनीतिक मुद्दे रहे।
हालांकि उस दौर के आंकड़ों को अलग-अलग स्रोतों और वर्षों के हिसाब से देखना जरूरी है, क्योंकि गन्ने के बकाये का आंकड़ा पेराई सत्र के अनुसार बदलता रहता है।
सिंचाई के मोर्चे पर सरयू नहर परियोजना इसका बड़ा उदाहरण थी। केंद्र सरकार ने 2012 में बताया था कि परियोजना 1977-78 से निर्माणाधीन थी और धन की कमी के कारण पूरी नहीं हो सकी थी। बाद में इसे राष्ट्रीय परियोजना में शामिल किया गया।
यानी किसान की समस्या केवल फसल के दाम तक सीमित नहीं थी। खेत तक पानी पहुंचाना, सरकारी खरीद तक पहुंच बनाना और फसल बेचने के बाद समय पर भुगतान हासिल करना भी उतना ही बड़ा सवाल था।
2017 में योगी सरकार और किसान कर्जमाफी का फैसला
UP का किसान: मार्च 2017 में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद किसानों से जुड़ा पहला बड़ा फैसला कर्जमाफी का था।
केंद्र सरकार के संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार यूपी ने छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक लाख रुपये तक के फसली कर्ज माफ करने की योजना घोषित की थी। कुल राहत पैकेज में ₹36,359 करोड़ का प्रावधान बताया गया था।
इस फैसले ने नई सरकार की किसान नीति का शुरुआती संकेत दिया। लेकिन कर्जमाफी के बाद अगली चुनौती थी कि किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिले और भुगतान व्यवस्था अधिक पारदर्शी बने।
गन्ना भुगतान और डिजिटल व्यवस्था में बदलाव
गन्ना यूपी की राजनीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे संवेदनशील मुद्दा रहा है। पिछले वर्षों में सरकार ने गन्ना खरीद, पर्ची और भुगतान व्यवस्था को डिजिटल बनाने पर जोर दिया।
राज्य सरकार के अनुसार 2017 के बाद गन्ना किसानों को रिकॉर्ड स्तर पर भुगतान किया गया। अक्टूबर 2025 के सरकारी प्रकाशन में आठ वर्षों में 46.50 लाख से अधिक गन्ना किसानों को ₹2.80 लाख करोड़ से अधिक भुगतान का दावा किया गया था।
2026-27 के बजट दस्तावेज में सरकार ने 2017 के बाद गन्ना मूल्य भुगतान को ₹3.04 लाख करोड़ से अधिक बताया है। इसी दस्तावेज के अनुसार 2025-26 पेराई सत्र में गन्ने के राज्य परामर्शित मूल्य यानी SAP में ₹30 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई।
इन आंकड़ों से यह जरूर स्पष्ट होता है कि गन्ना भुगतान यूपी की मौजूदा किसान नीति का प्रमुख हिस्सा बना हुआ है।
खेत की लागत घटाने की कोशिश
किसान की आमदनी केवल फसल के दाम से तय नहीं होती। डीजल, बिजली और सिंचाई की लागत भी उसकी कमाई पर सीधा असर डालती है। इसी मोर्चे पर सरयू नहर परियोजना का पूरा होना महत्वपूर्ण माना गया।
दिसंबर 2021 में परियोजना का उद्घाटन हुआ। केंद्र के अनुसार इससे 14 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि को सिंचाई सुविधा और करीब 29 लाख किसानों को लाभ पहुंचने की उम्मीद जताई गई थी।
2026-27 के यूपी बजट में निजी नलकूपों के लिए निर्बाध बिजली आपूर्ति से जुड़े प्रावधान के साथ कृषि क्षेत्र के लिए ₹10,888 करोड़ से अधिक का प्रावधान प्रस्तावित किया गया। सोलर पंप, प्राकृतिक खेती और FPO जैसी पहलों के लिए भी बजट में राशि रखी गई है।
PM-KISAN और सीधे खाते में आर्थिक मदद
UP का किसान: किसानों को सीधे आर्थिक सहायता देने वाली प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि भी यूपी की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योजना बन चुकी है।
राज्य सरकार के 2026-27 बजट दस्तावेज के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में दिसंबर 2025 तक करीब 3.12 करोड़ किसानों के बैंक खातों में ₹94,668 करोड़ DBT के जरिए स्थानांतरित किए गए थे।
इसी तरह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत 2017-18 से 2024-25 के बीच करीब 62 लाख किसानों को ₹5,110 करोड़ के मुआवजे का भुगतान किए जाने की जानकारी सरकार ने दी है।
उत्पादन बढ़ा, लेकिन किसान की हर समस्या खत्म नहीं हुई
कृषि उत्पादन के आंकड़े भी बदलाव की तस्वीर दिखाते हैं। 2024-25 में यूपी का खाद्यान्न उत्पादन करीब 722 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान जताया गया था।
2020-21 की तुलना में इसमें लगभग 100 लाख मीट्रिक टन की बढ़ोतरी बताई गई। हालांकि अलग-अलग सरकारी दस्तावेजों में अनुमान और अंतिम उत्पादन के आंकड़ों में अंतर हो सकता है।
लेकिन बढ़ता उत्पादन अपने आप किसान की आय बढ़ने की गारंटी नहीं है। आवारा पशु, उर्वरक और बीज की उपलब्धता, स्थानीय मंडियों में कीमत, छोटे किसानों की बाजार तक पहुंच और कुछ क्षेत्रों में भुगतान से जुड़ी शिकायतें आज भी चुनौती हैं।
यही वह हिस्सा है जहां सरकारी योजनाओं के आंकड़ों और किसान के वास्तविक अनुभव के बीच अंतर को समझना जरूरी है।
2027 से पहले किसान का असली सवाल क्या है?
UP का किसान: 2017 से 2026 तक उत्तर प्रदेश में किसान नीति का फोकस केवल कर्जमाफी से आगे बढ़कर DBT, डिजिटल खरीद, गन्ना भुगतान, सिंचाई परियोजनाओं, बिजली, बीमा और कृषि विविधीकरण तक पहुंचा है।
दूसरी तरफ यह भी सच है कि किसान की अंतिम कसौटी किसी सरकारी रिपोर्ट का आंकड़ा नहीं, बल्कि फसल का सही दाम, समय पर भुगतान, कम लागत और साल के अंत में बची वास्तविक आमदनी है।
इसीलिए 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यूपी में किसान फिर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। सरकार अपने काम और आंकड़ों के साथ मैदान में होगी, विपक्ष किसानों की जमीनी समस्याओं को मुद्दा बनाएगा और आखिर में फैसला गांव की चौपाल, मंडी और खेत तक पहुंचने वाली राजनीति ही करेगी।
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