Friday, September 11, 2026

यूपी के सरकारी स्कूलों में बदलाव: 2017 से 2026 तक क्या-क्या बदला?

यूपी के सरकारी स्कूलों में बदलाव: उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बदलाव का फैसला केवल नई रंगी दीवारों से नहीं हो सकता। असली सवाल है कि बच्चे को सुरक्षित भवन, पानी, शौचालय, बिजली, शिक्षक और सीखने का बेहतर माहौल मिला या नहीं।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की 2017 में पेश रिपोर्ट ने 31 मार्च 2016 तक की व्यवस्था का ऑडिट किया था।

इसके अनुसार 1,366 स्कूल जरूरी भवन के बिना या टिन, फूस, किराए के अथवा जर्जर परिसरों में चल रहे थे। साफ था कि चुनौती केवल स्कूल खोलने की नहीं, उन्हें पढ़ाई के योग्य बनाने की भी थी।

पानी, बिजली और शौचालय तक की कमी

Total government schools in Uttar Pradesh: CAG के अनुसार लगभग 1.60 लाख स्कूलों में से 2,978 में पीने का पानी नहीं था और 1,734 में लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं थे। 50,849 स्कूलों में खेल का मैदान और 35,995 में पुस्तकालय नहीं था।

रिपोर्ट में 34,098 स्कूलों में बिजली न होने की बात भी दर्ज हुई, जबकि वायरिंग और विद्युत फिटिंग पर 64.22 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे।

पाठ्यपुस्तक और यूनिफॉर्म देर से पहुंचने या कई बच्चों के छूट जाने की समस्या भी सामने आई। यानी योजना और बजट का लाभ समय पर बच्चे तक पहुंचाना कमजोर कड़ी था।

2017 के बाद ऑपरेशन कायाकल्प से शुरुआत

यूपी के सरकारी स्कूलों में बदलाव: 2017 के बाद योगी सरकार ने बुनियादी ढांचे को सुधार की पहली बड़ी सीढ़ी बनाया। ऑपरेशन कायाकल्प के तहत पेयजल, उपयोग योग्य शौचालय, हाथ धोने की व्यवस्था, बिजली, फर्नीचर, ब्लैकबोर्ड, रसोई, टाइल्स, रैंप, रेलिंग, चारदीवारी और साफ परिसर जैसे मानक तय हुए। इसलिए इसे केवल रंगाई-पुताई कहना अधूरी तस्वीर होगी।

राज्य सरकार के अनुसार 19 मानकों पर स्कूलों की संतृप्ति लगभग 36 प्रतिशत से बढ़कर 97 प्रतिशत तक पहुंची। यह सरकारी दावा है, लेकिन UDISE Plus 2024-25 में भी 90 प्रतिशत से अधिक स्कूलों में बिजली, हाथ धोने की सुविधा और अलग शौचालय दर्ज होना व्यापक सुधार की पुष्टि करता है।

स्मार्ट क्लास बढ़ीं, लेकिन डिजिटल दूरी बाकी

यूपी के सरकारी स्कूलों में बदलाव: इसके बाद पढ़ाई को तकनीक से जोड़ने के लिए स्मार्ट क्लास, ICT लैब, टैबलेट और डिजिटल सामग्री बढ़ाई गई। फिर भी तकनीक हर स्कूल तक नहीं पहुंची।

UDISE Plus 2024-25 के अनुसार यूपी के 2,62,358 स्कूलों में 51,998 यानी 19.8 प्रतिशत में कार्यशील स्मार्ट क्लास थीं। सरकारी स्कूलों में यह हिस्सा 20.8 प्रतिशत था।

लगभग 60 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर और 45.9 प्रतिशत में इंटरनेट उपलब्ध था। यानी दिशा बदली है, लेकिन डिजिटल पहुंच को पूर्ण सफलता मानना जल्दबाजी होगी।

DBT ने वितरण का तरीका बदला

यूपी के सरकारी स्कूलों में बदलाव: यूनिफॉर्म, जूते, मोजे और स्कूल बैग की सप्लाई में देरी कम करने के लिए 2021-22 से DBT व्यवस्था अपनाई गई।

अभिभावकों के आधार से जुड़े खातों में प्रति विद्यार्थी 1,200 रुपये भेजने का प्रावधान हुआ, ताकि परिवार यूनिफॉर्म, स्वेटर, जूते, मोजे, बैग और स्टेशनरी खरीद सके।

इससे वितरण की लंबी प्रक्रिया छोटी हुई, लेकिन आधार सत्यापन, बैंक खाते और छात्र रिकॉर्ड की गड़बड़ी से भुगतान रुकने की समस्या बनी रही।

मई 2025 की एक रिपोर्ट में लगभग 22 लाख बच्चों का सत्यापन लंबित होने से DBT में देरी की आशंका जताई गई थी। इसलिए नया तरीका अधिक सीधा है, पर समय पर भुगतान आज भी जरूरी कसौटी है।

परीक्षा निगरानी और शिक्षक व्यवस्था

यूपी के सरकारी स्कूलों में बदलाव: यूपी बोर्ड परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए CCTV, वॉयस रिकॉर्डिंग और केंद्रीकृत निगरानी बढ़ाई गई। इससे जवाबदेही मजबूत हुई, हालांकि पेपर लीक और नकल की घटनाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं।

शिक्षक भर्ती और प्रशिक्षण पर भी जोर दिया गया, लेकिन उनकी तैनाती अब भी बड़ा सवाल है। UDISE Plus 2024-25 पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार यूपी में 9,508 स्कूल केवल एक शिक्षक के सहारे थे और इनमें करीब 6.2 लाख विद्यार्थी पढ़ रहे थे।

अच्छी इमारत और स्मार्ट बोर्ड तभी असरदार होंगे, जब हर स्कूल में जरूरत और विषय के अनुसार पर्याप्त प्रशिक्षित शिक्षक हों।

बजट बड़ा है, पर नतीजा कक्षा में दिखना चाहिए

वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में बेसिक शिक्षा के लिए 77,622 करोड़ रुपये, माध्यमिक शिक्षा के लिए 22,167 करोड़ और उच्च शिक्षा के लिए लगभग 6,591 करोड़ रुपये रखे गए।

बड़ा आवंटन सरकार की प्राथमिकता दिखाता है, लेकिन उससे गुणवत्ता अपने आप साबित नहीं होती। खर्च समय पर हो, शिक्षक सही जगह तैनात हों और उपकरण काम करें, तभी इसका असर दिखाई देगा। उत्तर प्रदेश बजट 2026-27 विश्लेषण

ASER 2024 ने यूपी के सरकारी स्कूलों में पढ़ने और शुरुआती गणित के स्तर में सुधार दर्ज किया है। यह सकारात्मक संकेत है, लेकिन बच्चों का learning gap पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

तस्वीर बदली, अब सीखने की बारी

यूपी के सरकारी स्कूलों में बदलाव: CAG के पुराने आंकड़े बुनियादी कमियों वाली व्यवस्था दिखाते हैं, जबकि 2017 के बाद ऑपरेशन कायाकल्प, डिजिटल संसाधन, DBT और परीक्षा निगरानी ने सुविधाओं और प्रशासन में साफ बदलाव किया।

इसलिए इसे केवल रंग-रोगन कहना गलत होगा। साथ ही यह दावा भी अधूरा है कि हर समस्या समाप्त हो गई।

सीमित स्मार्ट क्लास, DBT में देरी और एकल शिक्षक वाले हजारों स्कूल बताते हैं कि अगला दौर अधिक कठिन है। असली सफलता तब होगी, जब बच्चा अपनी उम्र के स्तर का पाठ समझकर पढ़ सके, बुनियादी गणित कर सके और आगे की पढ़ाई के लिए तैयार हो।

यूपी के सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदली है, अब इसे हर बच्चे के बेहतर भविष्य की तस्वीर में बदलना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

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