CM Yogi: उत्तर प्रदेश की राजनीति में योगी आदित्यनाथ का सफर किसी सामान्य राजनेता के मुख्यमंत्री बनने की कहानी नहीं है।
उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत सत्ता के गलियारों से नहीं, बल्कि गोरखनाथ पीठ की उस परंपरा से हुई, जिसका पूर्वी उत्तर प्रदेश के सामाजिक जीवन में लंबे समय से प्रभाव रहा है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, धार्मिक गतिविधियों और सामाजिक सेवा से जुड़े संस्थानों के जरिए गोरखनाथ पीठ ने क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई और इसी विरासत का हिस्सा बनकर योगी आदित्यनाथ धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़े।
एक ओर उनके सामने गोरखनाथ पीठ के पीठाधीश्वर की जिम्मेदारी थी, तो दूसरी तरफ सक्रिय राजनीति का रास्ता।
एक ओर धार्मिक परंपरा और भगवा वस्त्र थे, तो दूसरी ओर चुनाव, संसद और सत्ता की राजनीति। यही विरोधाभास उनकी राजनीतिक कहानी को दूसरे नेताओं से अलग बनाता है।
19 मार्च 2017 को जब योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, तब उनके लिए यह राजनीतिक सफर की शुरुआत नहीं थी।
इसके पीछे दो दशक से ज्यादा का सार्वजनिक और राजनीतिक अनुभव मौजूद था। गोरखनाथ पीठ से जुड़े रहने के दौरान उन्होंने संस्थाओं का संचालन, लोगों से सीधा संवाद और सामाजिक गतिविधियों के जरिए जनसंपर्क का लंबा अनुभव हासिल किया था।
यही वजह है कि योगी के मुख्यमंत्री बनने की कहानी को सिर्फ 2017 से शुरू करना उनकी पूरी राजनीतिक यात्रा को समझने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
उनकी प्रशासनिक सोच और सार्वजनिक जीवन की कई बुनियादी झलकियां उनके गोरखनाथ पीठ से जुड़े शुरुआती वर्षों में ही दिखाई देने लगी थीं।
युवावस्था में ही गोरखनाथ पीठ से जुड़ा रिश्ता
5 जून 1972 को उत्तराखंड में जन्मे अजय सिंह बिष्ट ने आगे चलकर संन्यास की दीक्षा ली और योगी आदित्यनाथ के नाम से अपनी पहचान बनाई।
विज्ञान से स्नातक करने के बाद उनका झुकाव आध्यात्मिक और सामाजिक जीवन की ओर बढ़ा। इसी क्रम में वह गोरखनाथ पीठ से जुड़े और महंत अवैद्यनाथ के शिष्य बने।
15 फरवरी 1994 को सिर्फ 22 वर्ष की उम्र में उन्हें गोरक्षपीठ का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया।
इतनी कम उम्र में इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिलना अपने आप में महत्वपूर्ण था। हालांकि यह जिम्मेदारी केवल धार्मिक परंपराओं के निर्वहन तक सीमित नहीं थी।
गोरखनाथ पीठ लंबे समय से पूर्वी उत्तर प्रदेश में शिक्षा, चिकित्सा, सामाजिक सेवा और धार्मिक गतिविधियों के जरिए अपनी भूमिका निभाती रही थी।
महंत दिग्विजयनाथ और उनके बाद महंत अवैद्यनाथ ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया था।
योगी आदित्यनाथ जब इस परंपरा के उत्तराधिकारी बने तो उनके सामने भी यही चुनौती थी कि पीठ की पुरानी विरासत को आगे कैसे बढ़ाया जाए और बदलते समय के साथ उसकी सामाजिक भूमिका को कैसे विस्तार दिया जाए।
इसी दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सेवा और संगठन से जुड़ी गतिविधियां उनके सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनने लगीं।
लोगों से लगातार संपर्क ने उन्हें जमीन से जुड़ा एक ऐसा अनुभव दिया, जो आगे चलकर उनकी राजनीतिक शैली में भी दिखाई दिया।
सितंबर 2014 में महंत अवैद्यनाथ के निधन के बाद 12 सितंबर 2014 को योगी आदित्यनाथ औपचारिक रूप से गोरक्षपीठाधीश्वर बने।
यानी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने से लगभग ढाई साल पहले ही वह एक बड़े धार्मिक-सामाजिक संस्थान के प्रमुख की भूमिका संभाल चुके थे।
पीठ की जिम्मेदारी सिर्फ धार्मिक विरासत तक सीमित नहीं थी
गोरखनाथ पीठ की भूमिका को केवल मंदिर और धार्मिक गतिविधियों के नजरिए से देखना योगी आदित्यनाथ के शुरुआती सार्वजनिक जीवन को अधूरा समझना होगा।
पीठ से जुड़े अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और सामाजिक संस्थान लंबे समय से क्षेत्र के लोगों से जुड़े रहे हैं।
इसलिए पीठ की जिम्मेदारी संभालने का मतलब केवल धार्मिक परंपराओं को निभाना नहीं था।
संस्थानों का संचालन, सामाजिक गतिविधियों को आगे बढ़ाना और आम लोगों से संपर्क बनाए रखना भी इस जिम्मेदारी का हिस्सा था।
योगी आदित्यनाथ ने इसी व्यवस्था को आगे बढ़ाने की कोशिश की। धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ सामाजिक और संस्थागत गतिविधियों पर भी जोर दिया गया।
धीरे-धीरे उनकी पहचान एक ऐसे सार्वजनिक व्यक्तित्व के रूप में मजबूत होती गई, जो अपने धार्मिक और सांस्कृतिक विचारों को राजनीतिक मंच पर भी खुलकर रखता था।
यहीं से उनके धार्मिक नेतृत्व और राजनीतिक सक्रियता के बीच संबंध और मजबूत होता गया।
26 साल की उम्र में संसद पहुंचे योगी
1998 में योगी आदित्यनाथ पहली बार गोरखपुर से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। उस समय उनकी उम्र महज 26 वर्ष थी।
इसके बाद 1999, 2004, 2009 और 2014 में भी उन्होंने गोरखपुर लोकसभा सीट से जीत दर्ज की।
लगातार पांच बार लोकसभा चुनाव जीतना उनकी राजनीतिक पकड़ का महत्वपूर्ण संकेत था।
इस दौरान गोरखपुर और आसपास के इलाकों में उनका जनाधार मजबूत होता गया और राष्ट्रीय राजनीति में भी उनकी पहचान बढ़ती गई।
सांसद रहते हुए उनका संपर्क केवल संसद तक सीमित नहीं रहा। गोरखपुर में लगातार सक्रिय रहने के कारण स्थानीय मुद्दों से उनका जुड़ाव बना रहा।
यही वह दौर था जब गोरखनाथ पीठ के धार्मिक नेतृत्व के साथ उनकी राजनीतिक पहचान भी लगातार मजबूत होती गई।
एक पीठाधीश्वर के रूप में शुरू हुआ सार्वजनिक जीवन अब राष्ट्रीय राजनीति के एक सक्रिय चेहरे में बदल चुका था।
गोरखपुर के अनुभव ने कैसी बनाई राजनीतिक शैली?
मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ के काम करने के तरीके को समझने के लिए गोरखपुर में बिताए उनके लंबे समय को देखना जरूरी है।
गोरखनाथ पीठ और एक राज्य सरकार की जिम्मेदारियां निश्चित रूप से एक जैसी नहीं हैं, लेकिन दोनों जगह लोगों की समस्याओं से सीधे जुड़ने की जरूरत होती है।
मठ से जुड़े अस्पताल में इलाज के लिए आने वाला व्यक्ति अपनी अलग समस्या लेकर आता था। स्कूल और कॉलेज से जुड़े छात्र-परिवारों की जरूरतें अलग थीं।
आर्थिक या सामाजिक सहायता की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले लोगों की परेशानियां अलग थीं। इन अलग-अलग वर्गों के साथ लगातार संपर्क ने योगी के सार्वजनिक जीवन की एक खास कार्यशैली तैयार की।
गोरखपुर में विकास से जुड़ी कई परियोजनाएं भी समय के साथ आगे बढ़ीं। AIIMS, खाद कारखाना, सड़क और कनेक्टिविटी से जुड़े काम,
रामगढ़ ताल का विकास, चिड़ियाघर और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे प्रोजेक्ट शहर की बदलती तस्वीर के उदाहरण बने।
इन परियोजनाओं में अलग-अलग सरकारों और संस्थाओं की भूमिका रही, लेकिन योगी आदित्यनाथ ने अपने राजनीतिक जीवन में गोरखपुर के विकास को लगातार प्रमुख मुद्दे के रूप में सामने रखा।
19 मार्च 2017: जब गोरखपुर से निकला नेता लखनऊ पहुंचा
19 मार्च 2017 उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इसी दिन योगी आदित्यनाथ ने राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
उनका मुख्यमंत्री बनना इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि उनकी राजनीतिक पहचान पारंपरिक नेताओं से काफी अलग थी। भगवा वस्त्र पहनने वाला एक पीठाधीश्वर अब देश के सबसे बड़े राज्य की सरकार चला रहा था।
हालांकि मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने से पहले उनके पास लंबा राजनीतिक अनुभव था। वह करीब दो दशक तक संसद में रहे थे, पांच बार गोरखपुर का प्रतिनिधित्व कर चुके थे और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मजबूत जनसंपर्क बना चुके थे।
मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी पहली बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश की विशाल समस्याओं से निपटना थी।
कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी, किसानों की स्थिति, बिजली, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, निवेश और क्षेत्रीय असमानता जैसे मुद्दे सरकार के सामने थे।
शुरुआत से ही कानून-व्यवस्था को सरकार ने प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा और आगे चलकर ‘जीरो टॉलरेंस’ उसकी प्रशासनिक पहचान का एक प्रमुख हिस्सा बन गया।
कानून-व्यवस्था बना योगी सरकार का सबसे चर्चित चेहरा
योगी आदित्यनाथ की सरकार की सबसे ज्यादा चर्चा विकास परियोजनाओं से पहले कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर हुई।
सरकार ने अपराध और माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई को अपनी नीति का प्रमुख हिस्सा बनाया।
गैंगस्टर एक्ट का इस्तेमाल, अवैध संपत्तियों पर कार्रवाई और संगठित अपराध के खिलाफ अभियान सरकार की कार्यशैली की पहचान बनते गए।
सरकार के समर्थकों ने इसे अपराधियों पर प्रभावी नियंत्रण और आम लोगों में सुरक्षा की भावना मजबूत करने वाला कदम बताया।
वहीं विपक्ष ने पुलिस कार्रवाई और प्रशासन की कुछ नीतियों पर गंभीर सवाल भी उठाए।
इस तरह कानून-व्यवस्था योगी सरकार की सबसे चर्चित उपलब्धियों में शामिल रही, लेकिन यही क्षेत्र राजनीतिक विवादों का कारण भी बना।
सरकार का लगातार तर्क रहा कि अपराध के खिलाफ सख्त रुख का असर आम नागरिकों के साथ-साथ कारोबारियों के भरोसे पर भी पड़ा और इससे निवेश के लिए माहौल बेहतर हुआ।
उत्तर प्रदेश को ‘बीमारू’ छवि से बाहर निकालने की कोशिश
उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी चुनौतियों में उसकी विशाल आबादी के अनुरूप बुनियादी ढांचे का विकास भी रहा है।
लंबे समय तक राज्य की आर्थिक क्षमता और जमीन पर मौजूद सुविधाओं के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता रहा।
योगी सरकार ने इस अंतर को कम करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर को विकास नीति का प्रमुख आधार बनाया। एक्सप्रेसवे नेटवर्क इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा।
पूर्वांचल एक्सप्रेसवे ने लखनऊ और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बीच कनेक्टिविटी को बेहतर किया। बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे ने बुंदेलखंड क्षेत्र को बेहतर सड़क संपर्क दिया।
वहीं गंगा एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं को प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने वाले बड़े आर्थिक मार्ग के रूप में देखा गया।
इन परियोजनाओं का मकसद सिर्फ यात्रा का समय कम करना नहीं था। सरकार ने इन्हें उद्योग, व्यापार और लॉजिस्टिक्स से जोड़ने की रणनीति बनाई।
बेहतर सड़क का सीधा असर माल ढुलाई और बाजार तक पहुंच पर पड़ता है।
परिवहन आसान होने पर उद्योगों के लिए नए स्थान आकर्षक बनते हैं और आर्थिक गतिविधियों के विस्तार की संभावना बढ़ती है। इसी सोच के तहत एक्सप्रेसवे को औद्योगिक विकास के साथ जोड़कर देखा गया।
एयर कनेक्टिविटी में भी हुआ विस्तार
उत्तर प्रदेश में हवाई संपर्क को बढ़ाना भी सरकार की विकास रणनीति का हिस्सा रहा।
2017 के आसपास राज्य के कई शहर नियमित हवाई सेवाओं के सीमित विकल्पों पर निर्भर थे। इसके बाद कई नए शहरों को हवाई नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में काम हुआ।
प्रयागराज, कानपुर, बरेली, कुशीनगर, अयोध्या, अलीगढ़, आजमगढ़, श्रावस्ती, चित्रकूट और मुरादाबाद जैसे शहरों में हवाई सेवाओं का विस्तार हुआ।
अयोध्या में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का विकास और जेवर में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट की परियोजना इस बदलाव की बड़ी मिसालें हैं।
जेवर एयरपोर्ट को केवल विमान सेवा की परियोजना के रूप में नहीं देखा जा रहा। इसके आसपास औद्योगिक,
लॉजिस्टिक और शहरी विकास की योजनाएं भी जुड़ी हैं। ऐसे में इसके प्रभाव को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आर्थिक गतिविधियों से जोड़कर देखा जा सकता है।
यानी सरकार की रणनीति में एयरपोर्ट को एक अलग परियोजना के बजाय व्यापक आर्थिक नेटवर्क के हिस्से के रूप में पेश किया गया।
शहरों से गांवों तक विकास का विस्तार
योगी सरकार के विकास मॉडल में बड़े शहरों की परियोजनाओं के साथ ग्रामीण क्षेत्रों की बुनियादी सुविधाओं को भी जगह मिली।
गांवों में सड़क, बिजली, आवास, शौचालय, पेयजल और कनेक्टिविटी से जुड़ी योजनाओं पर काम किया गया। कई मामलों में केंद्र सरकार की योजनाओं को राज्य प्रशासन के जरिए जमीन पर लागू किया गया।
प्रधानमंत्री आवास योजना, सौभाग्य, जल जीवन मिशन और उज्ज्वला जैसी योजनाओं का असर ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई देने का दावा सरकार करती रही है।
दूसरी तरफ लखनऊ, कानपुर, नोएडा और अन्य बड़े शहरों में मेट्रो तथा शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर भी जोर दिया गया।
इस तरह सरकार की विकास नीति में एक तरफ बड़े आर्थिक प्रोजेक्ट रहे, तो दूसरी ओर रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने वाली योजनाएं भी शामिल रहीं।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में मेडिकल कॉलेजों का नेटवर्क
उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना हमेशा से बड़ी चुनौती रहा है। राज्य का आकार और बड़ी आबादी इसे और जटिल बनाती है।
योगी सरकार ने नए मेडिकल कॉलेज खोलने, मौजूदा संस्थानों का विस्तार करने और मेडिकल शिक्षा की क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया।
गोरखपुर में AIIMS को इस बदलाव के महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा गया। पूर्वी उत्तर प्रदेश लंबे समय से जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी बीमारी की समस्या से जूझता रहा है।
ऐसे क्षेत्र में बड़े आधुनिक चिकित्सा संस्थान का विकास स्वास्थ्य व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया।
राज्य के दूसरे हिस्सों में भी मेडिकल कॉलेजों का विस्तार हुआ। इसका असर केवल इलाज की सुविधाओं तक सीमित नहीं है।
मेडिकल कॉलेज बढ़ने से डॉक्टरों और विशेषज्ञों को तैयार करने की क्षमता भी बढ़ती है।
हालांकि स्वास्थ्य व्यवस्था की असली चुनौती सिर्फ नए भवन खड़े करना नहीं है। डॉक्टरों की उपलब्धता, विशेषज्ञों की संख्या,
अस्पतालों में स्टाफ, दवाओं की उपलब्धता और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच जैसे मुद्दे अभी भी महत्वपूर्ण हैं।
शिक्षा में इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार से गुणवत्ता तक की चुनौती
सरकारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना योगी सरकार के सामने दूसरी बड़ी चुनौती रही। यहां सरकार को एक साथ दो मोर्चों पर काम करना था—स्कूलों की भौतिक सुविधाएं बेहतर करना और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाना।
ऑपरेशन कायाकल्प के जरिए सरकारी स्कूलों में भवन, शौचालय, बिजली, फर्नीचर, पेयजल और दूसरी सुविधाओं को सुधारने पर जोर दिया गया।
इसके अलावा मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के माध्यम से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों को मुफ्त कोचिंग देने की पहल की गई।
इसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को बेहतर तैयारी का अवसर उपलब्ध कराना था।
हालांकि स्कूल की इमारत और सुविधाएं बेहतर होना शिक्षा सुधार का सिर्फ पहला चरण है। शिक्षक उपलब्धता, छात्रों के सीखने का स्तर, उच्च शिक्षा की पहुंच और पढ़ाई के बाद रोजगार जैसे मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में सरकार के काम का वास्तविक आकलन लंबे समय में छात्रों के परिणाम और अवसरों के आधार पर होगा।
उद्योग और निवेश के लिए तैयार किया नया माहौल
किसी राज्य में उद्योग तभी बड़ी संख्या में आते हैं, जब उन्हें परिवहन, बिजली, जमीन और कानून-व्यवस्था को लेकर भरोसा हो। योगी सरकार ने अपनी निवेश नीति को इन्हीं बुनियादी जरूरतों के साथ जोड़ने की कोशिश की।
इन्वेस्टर्स समिट, नई औद्योगिक नीतियां, डिफेंस कॉरिडोर, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग,
फिल्म सिटी और एक्सप्रेसवे आधारित औद्योगिक कॉरिडोर इसी रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से रहे।
सरकार ने कई बड़े निवेश प्रस्तावों को जमीन पर उतारने और उद्योगों के विस्तार को अपनी बड़ी उपलब्धियों में गिना।
2026 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश में लगभग 15 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाएं जमीन पर उतर चुकी हैं, जबकि करीब 6 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाएं अभी आगे बढ़ रही हैं।
हालांकि निवेश प्रस्ताव और वास्तविक निवेश के बीच अंतर होता है। किसी भी निवेश नीति की सफलता का अंतिम पैमाना
यह होगा कि इन परियोजनाओं से कितने उद्योग वास्तव में स्थापित हुए, कितना उत्पादन बढ़ा और कितने स्थायी रोजगार पैदा हुए।
फिर भी निवेश आकर्षित करना उत्तर प्रदेश सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में रहा है और राज्य को औद्योगिक केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश लगातार दिखाई देती है।
धार्मिक पहचान के साथ विकास का एजेंडा
योगी आदित्यनाथ की राजनीति की पहचान हिंदुत्व और गोरखनाथ पीठ से गहराई से जुड़ी रही है। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी यह पहचान उनके राजनीतिक व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रही।
अयोध्या, काशी, मथुरा और धार्मिक पर्यटन से जुड़े क्षेत्रों के विकास पर सरकार ने विशेष जोर दिया।
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद शहर में सड़क, एयरपोर्ट, होटल, परिवहन और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विस्तार हुआ।
लेकिन सरकार की पूरी कहानी को केवल धार्मिक परियोजनाओं तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
जिस समय अयोध्या में धार्मिक पर्यटन से जुड़े विकास कार्य आगे बढ़ रहे थे, उसी समय बुंदेलखंड में एक्सप्रेसवे और डिफेंस कॉरिडोर की योजनाएं चल रही थीं। पूर्वांचल में मेडिकल कॉलेजों का विस्तार हुआ और जेवर में एयरपोर्ट की परियोजना आगे बढ़ी।
यानी सरकार के एजेंडे में सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के साथ-साथ आर्थिक विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक विस्तार भी प्रमुख रूप से मौजूद रहा।
गोरखनाथ पीठ से मुख्यमंत्री कार्यालय तक कितना बदला?
योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक जीवन को समझने के लिए सबसे अहम सवाल यह है कि गोरखनाथ पीठ में मिले अनुभव का उनके मुख्यमंत्री के रूप में काम करने के तरीके पर कितना प्रभाव पड़ा?
दोनों भूमिकाओं के बीच सीधा समानता स्थापित करना आसान नहीं है। एक धार्मिक-सामाजिक संस्था का संचालन और 24 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले राज्य का प्रशासन पूरी तरह अलग स्तर की जिम्मेदारी है।
फिर भी एक समान तत्व नजर आता है—संस्थाओं के माध्यम से लोगों तक पहुंच।
गोरखनाथ पीठ से जुड़े अस्पताल और शिक्षण संस्थान समाज के एक बड़े हिस्से तक पहुंचने का माध्यम रहे।
मुख्यमंत्री के रूप में योगी के सामने स्कूलों, अस्पतालों, पुलिस, सड़क, बिजली और पानी जैसी सरकारी व्यवस्थाओं को करोड़ों लोगों तक पहुंचाने की चुनौती थी।
यानी मूल विचार में एक निरंतरता दिखाई देती है, लेकिन उसका पैमाना पूरी तरह बदल गया।
मठ में लोगों की समस्याओं से सीधे संपर्क का अनुभव था, जबकि सरकार में उसी तरह की अपेक्षाओं का सामना एक विशाल प्रशासनिक मशीनरी के जरिए करना था।
2017 से 2026 तक की यात्रा को कैसे समझें?
2017 से 2026 तक योगी सरकार के कामकाज को देखें तो एक बात खास तौर पर सामने आती है—अलग-अलग परियोजनाओं को आपस में जोड़ने की कोशिश।
एक्सप्रेसवे को औद्योगिक कॉरिडोर से जोड़ना, एयरपोर्ट को लॉजिस्टिक्स और व्यापार से जोड़ना,
मेडिकल कॉलेजों को मेडिकल शिक्षा से जोड़ना और कानून-व्यवस्था को निवेश के माहौल से जोड़ना इसी सोच का हिस्सा रहा।
धार्मिक पर्यटन को भी केवल मंदिर या धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि सड़क, एयरपोर्ट, होटल, परिवहन और शहरों के विकास से जोड़कर देखा गया।
यही वजह है कि योगी सरकार अपने विकास मॉडल को केवल सड़क, पुल या भवन निर्माण के रूप में पेश नहीं करती, बल्कि इन्हें एक बड़े आर्थिक और प्रशासनिक ढांचे के हिस्से के तौर पर सामने रखती है।
गोरखनाथ से लखनऊ तक की कहानी
योगी आदित्यनाथ की पूरी राजनीतिक यात्रा को अगर एक वाक्य में समझना हो तो इसे गोरखनाथ की संस्था से लखनऊ की सत्ता तक पहुंचने वाली यात्रा कहा जा सकता है।
उन्होंने पहले गोरखनाथ पीठ की धार्मिक और सामाजिक विरासत को संभाला। इसके बाद संसद में पहुंचकर राष्ट्रीय राजनीति का अनुभव हासिल किया। लगातार पांच बार सांसद रहने के बाद 2017 में वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
गोरखनाथ में उनकी जिम्मेदारी एक बड़े संस्थान और उससे जुड़े सामाजिक क्षेत्र की थी। लखनऊ में वही जिम्मेदारी पूरे उत्तर प्रदेश की हो गई।
यही कारण है कि योगी आदित्यनाथ के सफर को केवल ‘संत से मुख्यमंत्री’ बनने की कहानी कहना पर्याप्त नहीं है।
यह एक ऐसे व्यक्ति की यात्रा भी है, जिसने पहले संस्थागत जिम्मेदारी संभाली, फिर चुनावी राजनीति में अपना आधार मजबूत किया और अंततः देश के सबसे बड़े राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था का नेतृत्व किया।
अब इस यात्रा का वास्तविक मूल्यांकन विकास के आंकड़ों और सरकारी दावों से आगे जाकर होना है।
रोजगार के कितने अवसर बने, शिक्षा की गुणवत्ता कितनी सुधरी, स्वास्थ्य सेवाएं आम लोगों तक कितनी पहुंचीं,
कानून-व्यवस्था का असर कितना वास्तविक रहा और निवेश से जमीन पर कितनी आर्थिक गतिविधि पैदा हुई—इन सवालों के जवाब ही इस मॉडल की स्थायी सफलता तय करेंगे।
इतना जरूर है कि 1994 में गोरखनाथ पीठ से शुरू हुआ सार्वजनिक जीवन 1998 में संसद तक पहुंचा और 2017 में उत्तर प्रदेश की सत्ता के शीर्ष तक जा पहुंचा।
2026 तक आते-आते योगी आदित्यनाथ की यह यात्रा उत्तर प्रदेश की समकालीन राजनीति की सबसे चर्चित और प्रभावशाली राजनीतिक कहानियों में शामिल हो चुकी है।
गोरखनाथ से लखनऊ तक का यह सफर सिर्फ सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है। यह धार्मिक नेतृत्व, सामाजिक संस्थाओं, संगठन,
चुनावी राजनीति और प्रशासन के बीच बने उस संबंध की कहानी है, जिसने योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे प्रमुख चेहरों में खड़ा कर दिया।

