संतान की जगह कुत्ता, बदल रही परिवार की परिभाषा
दुनिया के कई संपन्न और आधुनिक समाजों में परिवार की परिभाषा तेजी से बदल रही है। कुछ दंपति स्वेच्छा से संतान नहीं करने का निर्णय लेते हैं और पालतू कुत्ते को ही बच्चे की तरह पालते हैं। उसके पालन पोषण पर समय, पैसा और भावनाएं खर्च की जाती हैं।
ऐसे परिवारों में कुत्ता केवल घर की रखवाली करने वाला पशु नहीं रहता। वह साथ खाता है, बिस्तर पर सोता है, मालिक का चेहरा चाटता है और उसके मलमूत्र की सफाई तक परिवार स्वयं करता है। धीरे धीरे उसे संतान जैसी पहचान मिलने लगती है।
इस जीवनशैली का एक व्यावहारिक पक्ष भी है। कुत्ते की औसत आयु मनुष्य से काफी कम होती है। एक पालतू पशु की मृत्यु के बाद दूसरा और फिर तीसरा उसकी जगह ले सकता है, लेकिन मनुष्य स्वयं लगातार वृद्धावस्था की ओर बढ़ता रहता है।
जवानी में कुत्ते की सेवा, बुढ़ापे में कौन देगा साथ?
युवा अवस्था में व्यक्ति स्वस्थ और आर्थिक रूप से सक्षम होता है। वह पालतू पशु की देखभाल में अपना समय, श्रम और बड़ी धनराशि लगा सकता है। लेकिन वृद्धावस्था में जब स्वयं देखभाल की आवश्यकता होगी, तब यही व्यवस्था जीवन के अकेलेपन का समाधान नहीं बन सकती।
हर चीज धन से खरीदी भी नहीं जा सकती। विदेश में जाकर आर्थिक रूप से सफल हो जाना सामाजिक संबंधों की गारंटी नहीं देता। व्यक्ति जिस समाज में प्रवासी बनकर रहता है, वहां परिवार, मित्रता और सामाजिक सहयोग की संरचना भारतीय सामाजिक व्यवस्था से काफी अलग हो सकती है।
उम्र बढ़ने के साथ परिवार और स्थायी मानवीय संबंधों की अनुपस्थिति कई लोगों के लिए अकेलेपन की चुनौती बढ़ा सकती है। ऐसे समय चिकित्सा, देखभाल और दैनिक सहायता की आवश्यकता भी बढ़ती है। इसलिए युवावस्था के फैसलों का मूल्यांकन केवल वर्तमान सुविधा देखकर नहीं किया जा सकता।
पशु प्रेम भारत के लिए कोई नई सीख नहीं
भारतीय संस्कृति को पशुओं से प्रेम करना आधुनिक दुनिया से सीखने की आवश्यकता नहीं है। यहां पशु पक्षी सदियों से सामाजिक और धार्मिक जीवन का हिस्सा रहे हैं। चूहे से लेकर सिंह तक विभिन्न जीवों को देवी देवताओं के वाहन के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
परंपरागत भारतीय जीवन में प्रतिदिन के भोजन से भी विभिन्न जीवों के लिए अंश निकालने की व्यवस्था रही है। चींटियों, कुत्तों और गौवंश तक को भोजन देने की परंपराएं इसका उदाहरण हैं। पशुओं के संरक्षण और उनके प्रति संवेदनशील व्यवहार को सामाजिक जीवन में स्पष्ट स्थान मिला।
लेकिन इस व्यवस्था में पशु प्रेम और मानवीय संबंधों के बीच अंतर भी स्पष्ट था। प्रत्येक जीव के लिए स्थान, व्यवहार और मर्यादा निर्धारित थी। पशुओं की रक्षा करना और उन्हें मनुष्य के पारिवारिक संबंधों का प्रत्यक्ष विकल्प बना देना दो बिल्कुल अलग सामाजिक अवधारणाएं हैं।
गौमाता से दूरी और कुत्ते को बिस्तर तक स्थान
भारतीय जीवन में गाय को केवल पशु नहीं माना गया। कृषि, दुग्ध व्यवस्था और पारंपरिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उसका केंद्रीय स्थान रहा है। दूसरी ओर कुत्ते सहित दूसरे पशुओं के प्रति भी दया और भोजन की व्यवस्था रही, लेकिन प्रत्येक जीव का स्थान अलग समझा गया।
आज एक विरोधाभास यह भी दिखाई देता है कि परंपरागत पशु संरक्षण को पिछड़ेपन से जोड़ दिया जाता है, जबकि पालतू कुत्ते पर भारी खर्च आधुनिकता का प्रतीक बन जाता है। गोबर से घृणा और कुत्ते का मल स्वयं साफ करना सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ा जाने लगा है।
समस्या कुत्ता पालने में नहीं, बल्कि उस मानसिकता में है जिसमें किसी विशेष पशु के प्रति प्रेम को आधुनिकता का प्रमाण बनाया जाए और बाकी जीवों को भोजन, उपयोग या उपेक्षा की वस्तु समझ लिया जाए। ऐसी चयनात्मक संवेदनशीलता पर सामाजिक बहस स्वाभाविक है।
अब कुत्ते को राखी, रिश्तों की मर्यादा पर नया सवाल
बदलती प्रवृत्ति अब रक्षाबंधन जैसे पारिवारिक पर्वों तक पहुंचती दिखाई देती है। सोशल मीडिया पर पालतू कुत्तों को राखी बांधने की तस्वीरें और वीडियो सामने आते रहते हैं। कहीं उनके लिए विशेष राखियां खरीदी जाती हैं और कहीं इस गतिविधि को भाई बहन के रिश्ते जैसा प्रस्तुत किया जाता है।
किसी व्यक्ति का अपने पालतू पशु से लगाव निजी विषय हो सकता है, लेकिन धार्मिक और सामाजिक पर्वों के मूल रिश्तों को पशुओं पर आरोपित करना अलग प्रश्न है। रक्षाबंधन केवल उपहार लेने देने का आयोजन नहीं, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक संबंधों से जुड़ी सांस्कृतिक परंपरा है।
यदि हर सांस्कृतिक संबंध को केवल व्यक्तिगत भावना के आधार पर नए अर्थ दिए जाने लगें, तो समय के साथ उसका मूल सामाजिक स्वरूप धूमिल हो सकता है। आज कुत्ते को राखी बांधना मनोरंजक गतिविधि लगे, लेकिन लगातार प्रचार किसी नई सांस्कृतिक धारणा को जन्म दे सकता है।
कभी पूरा गांव रिश्तों की मर्यादा से जुड़ा था
भारतीय समाज में भाई बहन का संबंध केवल एक माता पिता से जन्मे बच्चों तक सीमित नहीं रहा। गांव, परिवार, गोत्र और सामाजिक संरचना के भीतर अनेक रिश्तों को भाई बहन की मर्यादा दी जाती थी। इन संबंधों के माध्यम से सामाजिक व्यवहार की सीमाएं भी निर्धारित होती थीं।
समगोत्रीय संबंधों तक में भाई बहन जैसी मर्यादा रखने की सामाजिक परंपरा कई क्षेत्रों में रही है। बदलते शहरी जीवन में रिश्तों का यह विस्तृत संसार लगातार सिकुड़ा है। अब अनेक परिवारों में रक्षाबंधन मुख्यतः सगे भाई बहनों तक सीमित होता दिखाई देता है।
ऐसे समय जब मानवीय रिश्तों का दायरा पहले ही छोटा हो रहा है, उन्हीं रिश्तों के सांस्कृतिक प्रतीकों को पशुओं तक विस्तारित करना गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। आवश्यकता मानवीय संबंधों को और कमजोर करने की नहीं, बल्कि उनकी सामाजिक उपयोगिता और मर्यादा समझने की है।
आसपास की संस्कृति धीरे धीरे बदलती है सोच
मनुष्य अपने आसपास के सामाजिक वातावरण से प्रभावित होता है। यदि अपने मूल सांस्कृतिक विश्वासों को लेकर स्पष्टता नहीं हो, तो दूसरी जीवनशैलियों की आदतें धीरे धीरे सामान्य लगने लगती हैं। विदेशों और महानगरों में बदलती पारिवारिक संरचना का प्रभाव भारत में भी स्पष्ट दिखाई देता है।
कई पश्चिमी समाजों में भारतीय अर्थों वाला विस्तृत भाई बहन, गोत्र, गांव और पारिवारिक संबंधों का ढांचा मौजूद नहीं है। ऐसी सामाजिक व्यवस्थाओं से जीवनशैली ग्रहण करते समय यह समझना आवश्यक है कि भारतीय समाज की अपनी ऐतिहासिक परिस्थितियां और संबंधों की अलग संरचना रही है।
आधुनिक होना अपनी परंपराओं के प्रत्येक अंतर को मिटा देना नहीं है। पशुओं से प्रेम और उनका संरक्षण आवश्यक है, लेकिन इसके लिए मनुष्य के रिश्तों को पशुओं के रिश्तों में बदलना जरूरी नहीं। संवेदनशीलता और सांस्कृतिक विवेक दोनों एक साथ बनाए रखे जा सकते हैं।
कहीं प्रगतिशीलता की दौड़ में मनुष्य ही पीछे न छूट जाए
पालतू पशु परिवार को आनंद, साथ और भावनात्मक जुड़ाव दे सकते हैं। उनका संरक्षण और उचित देखभाल सभ्य समाज की पहचान है। लेकिन जब पशु प्रेम को संतान, भाई बहन और दूसरे मानवीय रिश्तों के विकल्प के रूप में स्थापित किया जाए, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।
समाज को यह तय करना होगा कि आधुनिकता का अर्थ रिश्तों को समाप्त करना है या उन्हें समय के अनुसार मजबूत बनाना। संतान न करना व्यक्तिगत निर्णय है और पशु पालना भी निजी पसंद, लेकिन इन विकल्पों को श्रेष्ठ प्रगतिशील जीवन का मानक बनाना उचित निष्कर्ष नहीं है।
आज बच्चा नहीं चाहिए क्योंकि कुत्ता ही बच्चा है, फिर राखी के लिए भाई नहीं क्योंकि कुत्ता ही भाई है। यदि यही प्रवृत्ति सांस्कृतिक उपलब्धि बनकर प्रचारित होने लगी, तो आने वाली पीढ़ियों के सामने परिवार और रिश्तों की परिभाषा बिल्कुल अलग दिखाई दे सकती है।
हे प्रभु, ऐसी प्रगतिशीलता से बचाइए
पशुओं को प्रेम दीजिए, उनका संरक्षण कीजिए और उनके प्रति क्रूरता का विरोध कीजिए, लेकिन मनुष्य और पशु के संबंधों की प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक सीमाएं भी समझिए। हजारों वर्षों की सामाजिक संरचनाएं केवल फैशन या सोशल मीडिया की लोकप्रियता के आधार पर नहीं बनी हैं।
भारतीय संस्कृति ने जीवों के प्रति करुणा और मानवीय रिश्तों की मर्यादा दोनों को स्थान दिया है। चुनौती इनमें से किसी एक को चुनने की नहीं है। चुनौती यह है कि आधुनिकता के नाम पर करुणा को दिखावे और पारिवारिक संबंधों को अप्रासंगिक बनाने से बचाया जाए।
कुत्ते से प्रेम करने के लिए उसे बेटा या भाई घोषित करना आवश्यक नहीं है। वह एक जीव है और उसके प्रति करुणा अपने आप में पर्याप्त मूल्य है। मनुष्य के रिश्तों का अपना महत्व है। दोनों को मिलाना ही प्रगतिशीलता है, यह मानना आवश्यक नहीं।

