Nepal flood: नेपाल को अक्सर खूबसूरत पहाड़ों, हिमालय और प्राकृतिक संपदा के लिए जाना जाता है, लेकिन यही भौगोलिक खूबसूरती कई बार उसके लिए बड़ी चुनौती भी बन जाती है।
भूकंप, भूस्खलन, बाढ़, हिमस्खलन और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाएं नेपाल के लिए नई नहीं हैं। सवाल यह है कि आखिर इस छोटे से हिमालयी देश में आपदाओं का खतरा इतना ज्यादा क्यों है?
25 अप्रैल 2015 को आए 7.8 तीव्रता के गोरखा भूकंप ने नेपाल को गहरे जख्म दिए थे। इस भूकंप में करीब 9,000 लोगों की जान गई और बड़ी संख्या में घर, ऐतिहासिक इमारतें और सड़कें तबाह हुईं।
इसके बाद भी नेपाल को बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियर से जुड़ी कई गंभीर घटनाओं का सामना करना पड़ा।
अगस्त 2026 में भोटेकोशी क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर देश की भौगोलिक और पर्यावरणीय कमजोरियों को सामने ला दिया।
तो क्या नेपाल वाकई प्रकृति का ‘फेवरेट टारगेट’ है? असल में ऐसा कहना वैज्ञानिक तौर पर सही नहीं होगा।
नेपाल किसी प्राकृतिक आपदा का पसंदीदा निशाना नहीं है, बल्कि उसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है जहां कई प्राकृतिक खतरे एक साथ मौजूद हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इन खतरों के साथ जलवायु परिवर्तन और तेजी से हो रहा मानवीय विकास आपदा के जोखिम को और बढ़ा देते हैं।
1. टेक्टोनिक प्लेटों का टकराव बनाता है भूकंप का खतरा
नेपाल हिमालय के उस क्षेत्र में स्थित है जहां भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटें लगातार एक-दूसरे की ओर बढ़ रही हैं।
इन प्लेटों के बीच होने वाली हलचल से जमीन के भीतर लंबे समय तक तनाव जमा होता रहता है। जब यह तनाव अचानक बाहर निकलता है तो भूकंप आता है।
यही कारण है कि नेपाल और पूरा हिमालयी क्षेत्र दुनिया के प्रमुख भूकंप-संवेदनशील इलाकों में शामिल है। 2015 का गोरखा भूकंप इसी भूगर्भीय गतिविधि का बड़ा उदाहरण था।
इसके झटकों ने सिर्फ इमारतों को नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि पहाड़ों में बड़े पैमाने पर भूस्खलन को भी जन्म दिया।
भूकंप के बाद पहाड़ी ढलानों की स्थिरता प्रभावित होने से आगे भी भूस्खलन और दूसरी प्राकृतिक घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।
2. पहाड़ और गहरी घाटियां बढ़ाती हैं बाढ़ की रफ्तार
नेपाल की भौगोलिक बनावट बेहद अनोखी है। दक्षिण में अपेक्षाकृत समतल तराई का इलाका है, जबकि उत्तर की ओर कुछ ही दूरी में ऊंचे हिमालयी पहाड़ शुरू हो जाते हैं।
इस वजह से कई नदियां बेहद ऊंचाई वाले इलाकों से निकलकर संकरी और गहरी घाटियों से होकर तेजी से नीचे आती हैं।
नेपाल में हजारों छोटी-बड़ी नदियां और जलधाराएं हैं। सामान्य परिस्थितियों में ये नदियां जीवन और खेती के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं,
लेकिन जब अचानक भारी बारिश, हिमस्खलन या ग्लेशियर से बड़ी मात्रा में पानी नीचे आता है, तो यही संकरी घाटियां बाढ़ के लिए रास्ता बन जाती हैं।
तेज बहाव अपने साथ मिट्टी, पत्थर और मलबा भी बहाकर लाता है, जिससे बाढ़ का असर और ज्यादा विनाशकारी हो सकता है।
3. पिघलते ग्लेशियर बढ़ा रहे हैं नया खतरा
नेपाल की आपदा चुनौती का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हिमालय के ग्लेशियरों से जुड़ा है। बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की चिंता लगातार बढ़ रही है।
बर्फ पिघलने से ऊंचाई वाले इलाकों में ग्लेशियल झीलों का आकार बढ़ सकता है।
इन झीलों के आसपास मौजूद प्राकृतिक बांध कमजोर होने पर अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर आ सकता है।
इस घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है।
ऐसी बाढ़ की खास बात यह है कि इसके लिए हमेशा निचले इलाकों में भारी बारिश होना जरूरी नहीं होता।
ऊंचे पहाड़ों पर ग्लेशियर का टूटना, बर्फ या चट्टानों का झील में गिरना और उससे पानी का अचानक बाहर निकलना भी नीचे बसे इलाकों में तबाही ला सकता है।
4. बदलता मौसम और चरम बारिश
मानसून नेपाल के लिए जीवनदायी है, लेकिन कई बार यही बारिश बड़ी आपदा का कारण बन जाती है।
कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने पर नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है और पहाड़ी ढलानों पर भूस्खलन का खतरा भी बढ़ जाता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के पैटर्न में बदलाव और चरम मौसमी घटनाओं को लेकर विशेषज्ञ लगातार चिंता जताते रहे हैं।
कभी बहुत कम समय में अत्यधिक बारिश होती है तो कभी लंबे समय तक मौसम अपेक्षाकृत सूखा रहता है। ऐसी अनियमितता आपदा प्रबंधन को और चुनौतीपूर्ण बना देती है।
5. इंसानी दखल ने बढ़ाया जोखिम
हर आपदा को सिर्फ प्रकृति की गलती मानना भी सही नहीं है। किसी प्राकृतिक घटना के आपदा में बदलने के पीछे इंसानी गतिविधियों की बड़ी भूमिका हो सकती है।
नेपाल के पहाड़ी इलाकों में सड़क निर्माण, अनियोजित शहरी विस्तार, जंगलों का नुकसान और संवेदनशील ढलानों पर निर्माण जैसी गतिविधियां जोखिम बढ़ा सकती हैं।
कई जगह सड़कें और दूसरी बुनियादी सुविधाएं ऐसे क्षेत्रों में बनाई गई हैं जहां भूस्खलन या बाढ़ का खतरा पहले से मौजूद है।
नदी के किनारे बढ़ती बस्तियां भी खतरा बढ़ाती हैं। जब नदी का पानी अचानक बढ़ता है तो उसके आसपास बने घर, पुल, सड़क और दूसरी संरचनाएं सीधे इसकी चपेट में आ सकती हैं।
आखिर नेपाल में बार-बार क्यों आती है तबाही?
नेपाल किसी ‘फेवरेट टारगेट’ की वजह से आपदाओं का सामना नहीं करता। असल वजह उसकी भौगोलिक स्थिति और कई जोखिमों का एक साथ मौजूद होना है।
एक तरफ सक्रिय टेक्टोनिक प्लेटें भूकंप का खतरा पैदा करती हैं, दूसरी तरफ ऊंचे और खड़ी ढलानों वाले पहाड़ भूस्खलन और तेज बहाव का जोखिम बढ़ाते हैं।
इसके ऊपर ग्लेशियरों में बदलाव, चरम मौसम और अनियोजित विकास स्थिति को और जटिल बना देते हैं।
नेपाल के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल आपदा आने के बाद राहत पहुंचाना नहीं, बल्कि उससे पहले जोखिम को कम करना है।
बेहतर चेतावनी प्रणाली, सुरक्षित निर्माण, वैज्ञानिक तरीके से सड़क और शहरों की योजना, जंगलों का संरक्षण और ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी जैसे कदम भविष्य में नुकसान को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
प्रकृति को रोका नहीं जा सकता, लेकिन वैज्ञानिक तैयारी और बेहतर योजना के जरिए उसके खतरे को आपदा बनने से काफी हद तक रोका जा सकता है।

