भोपाल गैस त्रासदी से तमिलनाडु तक: तमिलनाडु के तिरुवल्लूर से आई एक दर्दनाक खबर ने देश के औद्योगिक सेक्टर्स में मजदूरों की सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है।
यहाँ एक सीफूड प्रोसेसिंग फैक्ट्री में हुए जहरीले गैस रिसाव ने कई मासूम जिंदगियों को लील लिया।
यह हादसा सिर्फ एक तकनीकी खराबी का नतीजा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर उस सिस्टम की पोल खोलता है जहाँ आज भी गरीब और लाचार मजदूरों की जान को बेहद सस्ता समझकर सुरक्षा मानकों को ताक पर रख दिया जाता है।
तरक्की और मुनाफे की दौड़ में जमीनी स्तर पर काम करने वाले इन श्रमिकों की जिंदगी आज भी सबसे बड़े जोखिम पर है।
क्या है तमिलनाडु का पूरा मामला?
भोपाल गैस त्रासदी से तमिलनाडु तक: यह ताजा और दुखद घटना तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले की है।
यहाँ पेरियापालयम के पास स्थित एक प्राइवेट सीफूड प्रोसेसिंग यूनिट (झींगा और मछली प्रसंस्करण केंद्र) में अचानक बेहद जहरीली अमोनिया गैस का रिसाव (Leak) हो गया।
गैस इतनी तेज और जहरीली थी कि इसकी चपेट में आने से फैक्ट्री परिसर में मौजूद लोगों का दम घुटने लगा।
आधिकारिक स्वास्थ्य बुलेटिनों और शुरुआती प्रशासनिक बयानों के अनुसार, इस हादसे में झुलसकर और दम घुटने के कारण पाँच महिला श्रमिकों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि मीडिया और स्थानीय सूत्रों के मुताबिक यह संख्या सात तक बताई जा रही है।
इसके अलावा, 60 से भी ज्यादा मजदूर इस जहरीली हवा की चपेट में आकर गंभीर रूप से बीमार हो गए, जिन्हें तुरंत नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया।
इस हादसे का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि प्रभावित होने वाले अधिकांश लोग दूसरे राज्यों (जैसे ओडिशा, असम और झारखंड) से पेट पालने आए प्रवासी मजदूर थे।
क्युंकि रविवार को शिफ्ट न होने के बावजूद ये मजदूर फैक्ट्री के अंदर बने रिहायशी क्वार्टरों में ही रह रहे थे, इसलिए उन्हें संभलने का मौका तक नहीं मिला।
गैस फैलते ही लोगों को सांस लेने में भारी दिक्कत, आंखों में तेज जलन, चक्कर आना और उल्टी जैसी शिकायतें होने लगीं।
कई मजदूरों की हालत तो इतनी खराब थी कि अत्यधिक कंसंट्रेशन के कारण उनके नाक और मुंह से खून तक आने लगा।
आखिर कैसे हुआ यह भयानक रिसाव?
भोपाल गैस त्रासदी से तमिलनाडु तक: हादसे के तुरंत बाद इस बात को लेकर जांच शुरू कर दी गई है कि आखिर इतनी सुरक्षित मानी जाने वाली यूनिट में यह चूक कैसे हुई।
शुरुआती तकनीकी रिपोर्ट्स और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक, अमोनिया गैस का इस्तेमाल आमतौर पर सीफूड को खराब होने से बचाने के लिए बड़े कोल्ड स्टोरेज और रेफ्रिजरेशन सिस्टम में एक इंडस्ट्रियल रेफ्रिजरेंट के रूप में किया जाता है।
आशंका जताई जा रही है कि इसी कूलिंग सिस्टम के एक मुख्य मेजरिंग वॉल्व (मापने वाले वॉल्व) में कोई तकनीकी खराबी आ गई थी या फिर सुरक्षा मानकों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया था, जिसके कारण यह गैस लीक हुई।
घटना की गंभीरता को देखते हुए नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स (NDRF) की 30 सदस्यीय टीम को विशेष उपकरणों के साथ मौके पर तैनात किया गया, जिसने किसी तरह गैस के फैलाव को काबू में किया।
भोपाल से लेकर तमिलनाडु तक: इतिहास खुद को दोहरा रहा है
इस हादसे के बाद सोशल मीडिया और आम जनता के बीच भारी गुस्सा देखा जा रहा है।
लोग कह रहे हैं कि जब 1984 के भोपाल हादसे ने पूरे देश को हिलाया था, तब बड़े-बड़े वादे किए गए थे कि ऐसी लापरवाही दोबारा कभी नहीं होगी।
लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। भोपाल के बाद भी हमारा देश लगातार फैक्ट्रियों से निकलने वाली जहरीली गैसों का शिकार बनता रहा है:
साल 2014: भिलाई स्टील प्लांट में अचानक हुए गैस रिसाव के कारण 6 कर्मचारियों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।
साल 2017: कानपुर के एक कोल्ड स्टोरेज प्लांट में भी अमोनिया गैस लीक हुई थी, जिसने 5 लोगों की जिंदगी खत्म कर दी।
साल 2020: विशाखापट्टनम का एलजी पॉलिमर प्लांट हादसा किसे याद नहीं होगा? वहां से निकली स्टायरीन गैस ने 12 से ज्यादा लोगों को मौत की नींद सुला दिया था और हजारों लोग आज भी उसके साइड-इफेक्ट्स झेल रहे हैं।
साल 2022: गुजरात के सूरत में एक औद्योगिक इलाके में जहरीली गैस की चपेट में आने से 6 कपड़ा मिल श्रमिकों की दर्दनाक मौत हुई।
साल 2023: पंजाब के लुधियाना के गियासपुरा इलाके में हाइड्रोजन सल्फाइड गैस के रिसाव ने एक साथ 11 लोगों की जान ले ली थी।
और अब साल 2026 में तमिलनाडु की यह सीफूड फैक्ट्री इस खूनी फेहरिस्त में नया नाम बन गई है।
इन सारे हादसों को गौर से देखें तो एक बात साफ हो जाती है हर बार गैस का नाम बदला, हादसे की जगह बदली, साल और तारीखें बदलीं, लेकिन अगर कुछ नहीं बदला तो वो थी इन बेकसूर मजदूरों की किस्मत।
आज भी देश की तरक्की और औद्योगिक विकास के नाम पर जमीनी स्तर पर काम करने वाले इन गरीब लोगों की जिंदगी दांव पर लगी हुई है।
प्रशासन की कार्रवाई और अधूरे सवाल
हादसे के बाद हमेशा की तरह राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इस घटना पर गहरा दुख जताते हुए मृतकों के परिवारों के लिए मुख्यमंत्री जन राहत कोष से ₹2-2 लाख की अनुग्रह राशि (Ex-gratia) देने की घोषणा की है।
साथ ही, फैक्ट्री के मालिक को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है और पुलिस ने आपराधिक लापरवाही का मामला दर्ज कर लिया है।
सरकार ने औद्योगिक सुरक्षा निदेशक और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों को मिलाकर एक हाई-लेवल जांच कमेटी भी बना दी है, जिसे जल्द से जल्द रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह मुआवजा और यह कमेटियां उन बिखरे हुए परिवारों को वापस ला पाएंगी? यहाँ सवाल सिर्फ किसी एक राज्य या एक फैक्ट्री का नहीं है।
सवाल उस पूरे लचर सिस्टम का है जो हर बड़े हादसे के बाद कुछ दिनों के लिए जागने का नाटक करता है, कड़े नियम बनाने के दावे करता है और फिर सब कुछ भूलकर गहरी नींद में सो जाता है।
जब तक फैक्ट्रियों के मालिकों और सुरक्षा ऑडिट करने वाले अधिकारियों की सीधी जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसों को रोक पाना मुमकिन नहीं है।
सबसे बड़ा और चुभने वाला सवाल तो यही है कि आखिर हमारा देश और हमारा प्रशासन पूरी तरह जागने के लिए और कितनी लाशों के गिरने का इंतजार कर रहा है?
यह भी पढ़े: पंकज त्रिपाठी के बड़े भाई पर जानलेवा हमला, AIIMS में चल रहा इलाज

