Wednesday, August 12, 2026

De Dollarization: क्या डॉलर की बादशाहत होने वाली है खत्म? जानिए भारत पर कितना पड़ेगा असर

De Dollarization: दुनिया की आर्थिक व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर की ताकत को लेकर इन दिनों काफी चर्चा हो रही है। 2026 में डॉलर की कीमत में आई गिरावट,

दुनिया के केंद्रीय बैंकों की बदलती रणनीति और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने इस बहस को और तेज कर दिया है।

कई देशों की कोशिश है कि अंतरराष्ट्रीय कारोबार में सिर्फ डॉलर पर निर्भर न रहना पड़े। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अमेरिकी डॉलर की दशकों पुरानी बादशाहत अब खत्म होने की शुरुआत हो चुकी है?

हालांकि, मौजूदा हालात को देखें तो डॉलर कमजोर जरूर हुआ है, लेकिन अभी उसकी जगह लेने वाली कोई दूसरी करेंसी तैयार नहीं है।

डॉलर की कीमत में क्यों आई गिरावट?

डॉलर की कमजोरी के पीछे एक नहीं, बल्कि कई कारण हैं। अमेरिका की आर्थिक नीतियों को लेकर अनिश्चितता, बढ़ता सरकारी कर्ज, ब्याज दरों को लेकर उम्मीदें और दुनिया में बढ़ता तनाव इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।

2026 में डॉलर की कीमत में करीब 10 फीसदी तक की गिरावट देखने को मिली है। डॉलर इंडेक्स भी पिछले कुछ वर्षों के निचले स्तरों के आसपास पहुंचा है।

डॉलर में इस गिरावट का असर दुनिया के दूसरे बाजारों पर भी पड़ा है। निवेशक अब अमेरिकी अर्थव्यवस्था और सरकार की वित्तीय स्थिति को पहले से ज्यादा ध्यान से देख रहे हैं।

हालांकि, डॉलर की कीमत में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि दुनिया ने डॉलर का इस्तेमाल बंद कर दिया है।

क्या दुनिया के देश डॉलर से दूरी बना रहे हैं?

दुनिया के कुछ केंद्रीय बैंक अब अपने विदेशी मुद्रा भंडार में बदलाव कर रहे हैं। कई देश डॉलर के साथ-साथ सोने और दूसरी करेंसी को भी अपने रिजर्व में जगह दे रहे हैं।

खासकर दुनिया में बढ़ते युद्ध और राजनीतिक तनाव के बीच सोने को सुरक्षित निवेश माना जा रहा है।

लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि सभी देश डॉलर छोड़ने की तैयारी में नहीं हैं। डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली रिजर्व करेंसी है।

अंतरराष्ट्रीय कारोबार, बैंकिंग और निवेश में इसका इस्तेमाल बहुत बड़े स्तर पर होता है। इसलिए डॉलर से दूरी बनाने की प्रक्रिया अभी धीमी है।

पेट्रोडॉलर व्यवस्था में भी आया बदलाव

कई दशकों तक दुनिया के तेल कारोबार में अमेरिकी डॉलर का बड़ा दबदबा रहा है।

तेल की खरीद-बिक्री में डॉलर का इस्तेमाल होने की वजह से दुनिया के देशों को अपने पास डॉलर रखना पड़ता था। इससे अमेरिकी करेंसी की मांग लगातार बनी रहती थी।

अब कुछ देश तेल और दूसरे सामानों के कारोबार में अपनी स्थानीय करेंसी या दूसरी अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

इससे लंबे समय में डॉलर की मांग पर असर पड़ सकता है। हालांकि, अभी भी दुनिया के बड़े हिस्से में तेल कारोबार के लिए डॉलर का इस्तेमाल होता है।

रूस पर प्रतिबंधों के बाद बढ़ी चिंता

2022 में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने रूस के बड़े विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज कर दिया था।

इस घटना ने दूसरे देशों को भी सोचने पर मजबूर किया कि अगर उनके विदेशी भंडार किसी दूसरे देश की वित्तीय व्यवस्था में रखे हैं, तो संकट की स्थिति में उन पर प्रतिबंध लग सकता है।

इसके बाद कुछ देशों ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की मात्रा बढ़ाने पर ध्यान दिया। साथ ही, स्थानीय करेंसी में कारोबार करने की कोशिश भी तेज हुई।

यह डॉलर के लिए तुरंत बड़ा खतरा नहीं है, लेकिन लंबे समय में इससे वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव जरूर आ सकता है।

अमेरिका का बढ़ता कर्ज भी चिंता की वजह

अमेरिका का सरकारी कर्ज लगातार बढ़ रहा है। 2026 में यह 39 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका है। इस कर्ज पर अमेरिका को बड़ी रकम ब्याज के रूप में चुकानी पड़ रही है।

अगर आने वाले वर्षों में अमेरिकी सरकार का कर्ज और तेजी से बढ़ता है, तो इससे उसकी आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है।

डॉलर की ताकत सिर्फ अमेरिकी करेंसी होने की वजह से नहीं है, बल्कि इसके पीछे अमेरिकी अर्थव्यवस्था और उसके वित्तीय बाजारों पर दुनिया का भरोसा भी है।

इसलिए अगर अमेरिकी आर्थिक स्थिति लंबे समय तक कमजोर होती है, तो डॉलर की स्थिति पर भी असर पड़ सकता है।

भारत को डॉलर कमजोर होने से क्या फायदा होगा?

डॉलर की कमजोरी भारत के लिए कुछ मामलों में फायदेमंद हो सकती है। भारत विदेशों से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी खरीदता है।

अगर डॉलर कमजोर होता है और रुपये की स्थिति मजबूत रहती है, तो इन चीजों को खरीदने में भारत को कम रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं।

कच्चा तेल भारत के लिए खास महत्व रखता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल विदेशों से खरीदता है।

अगर डॉलर कमजोर होने के साथ तेल की कीमतों में भी ज्यादा बढ़ोतरी नहीं होती है, तो भारत का आयात बिल कम हो सकता है। इससे महंगाई को नियंत्रित करने में भी मदद मिल सकती है।

विदेशी निवेश बढ़ने का भी मिल सकता है फायदा

कमजोर डॉलर की स्थिति में भारत जैसे उभरते बाजार विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक हो सकते हैं। अगर निवेशकों को लगता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था बेहतर प्रदर्शन कर सकती है, तो भारत में विदेशी निवेश बढ़ सकता है।

विदेशी निवेश बढ़ने से शेयर बाजार और भारतीय कंपनियों को भी फायदा मिल सकता है।

हालांकि यह पूरी तरह डॉलर की कमजोरी पर निर्भर नहीं करता। वैश्विक बाजारों की स्थिति, भारत की आर्थिक वृद्धि और निवेशकों का भरोसा भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं।

लेकिन भारत को नुकसान भी हो सकता है

डॉलर की कमजोरी हर स्थिति में भारत के लिए फायदेमंद नहीं होगी। भारतीय कंपनियां जो विदेशों में सामान और सेवाएं बेचती हैं,

उन्हें नुकसान हो सकता है। खासकर आईटी, फार्मा, टेक्सटाइल और दूसरे निर्यात वाले कारोबारों पर इसका असर पड़ सकता है।

अगर रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले मजबूत होती है, तो विदेशों से मिलने वाली कमाई को रुपये में बदलने पर कंपनियों को पहले के मुकाबले कम रकम मिल सकती है। इससे कुछ निर्यात कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है।

रुपये के लिए बढ़ सकता है मौका

डॉलर पर दुनिया की निर्भरता कम होने की स्थिति भारत के लिए रुपये को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने का मौका भी बन सकती है।

भारत कई देशों के साथ स्थानीय करेंसी में कारोबार बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

इसका मतलब यह नहीं है कि भारत डॉलर को खत्म करना चाहता है। भारत का तरीका ज्यादा व्यावहारिक है।

वह चाहता है कि जरूरत पड़ने पर दूसरे देशों के साथ रुपये में भी व्यापार किया जा सके।

इससे डॉलर पर निर्भरता कुछ कम हो सकती है और रुपये की अंतरराष्ट्रीय भूमिका बढ़ सकती है।

क्या कोई दूसरी करेंसी डॉलर की जगह ले सकती है?

फिलहाल ऐसा कोई मजबूत विकल्प नजर नहीं आता जो पूरी तरह डॉलर की जगह ले सके। यूरो दुनिया की दूसरी बड़ी अंतरराष्ट्रीय करेंसी है, लेकिन उसका इस्तेमाल डॉलर से काफी कम है।

चीन का युआन भी अंतरराष्ट्रीय कारोबार में अपनी जगह बना रहा है, लेकिन अभी वह डॉलर की बराबरी नहीं कर पाया है।

सोना भी केंद्रीय बैंकों के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प बन रहा है। लेकिन सोने का इस्तेमाल रोजमर्रा के अंतरराष्ट्रीय कारोबार में डॉलर की तरह नहीं किया जा सकता।

यही वजह है कि डॉलर कमजोर होने के बावजूद उसकी जगह लेने वाली कोई एक करेंसी फिलहाल सामने नहीं आई है।

तो क्या खत्म हो जाएगी डॉलर की बादशाहत?

अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। डॉलर का दबदबा जरूर धीरे-धीरे कम हो सकता है, लेकिन उसके पूरी तरह खत्म होने की संभावना फिलहाल कम है।

डॉलर का इस्तेमाल दुनिया के व्यापार, बैंकिंग, निवेश और विदेशी मुद्रा भंडार में बड़े स्तर पर होता है।

आने वाले वर्षों में दुनिया की वित्तीय व्यवस्था में बदलाव जरूर देखने को मिल सकता है। डॉलर के साथ यूरो, युआन, रुपये और सोने की भूमिका बढ़ सकती है।

यानी भविष्य में एक ऐसी व्यवस्था बन सकती है जहां दुनिया किसी एक करेंसी पर पहले जितनी निर्भर न रहे।

भारत के लिए क्या होगा सबसे सही रास्ता?

भारत के लिए सबसे बेहतर रणनीति यही होगी कि वह डॉलर पर अपनी निर्भरता धीरे-धीरे कम करे, लेकिन उससे पूरी तरह दूरी बनाने की कोशिश न करे।

भारत को रुपये में अंतरराष्ट्रीय कारोबार बढ़ाने के साथ-साथ डॉलर, यूरो और दूसरी मजबूत मुद्राओं में भी अपने विकल्प बनाए रखने होंगे।

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Madhuri
Madhurihttps://reportbharathindi.com/
पत्रकारिता में 6 वर्षों का अनुभव है। पिछले 3 वर्षों से Report Bharat से जुड़ी हुई हैं। इससे पहले Raftaar Media में कंटेंट राइटर और वॉइस ओवर आर्टिस्ट के रूप में कार्य किया। Daily Hunt के साथ रिपोर्टर रहीं और ETV Bharat में एक वर्ष तक कंटेंट एडिटर के तौर पर काम किया। लाइफस्टाइल, इंटरनेशनल और एंटरटेनमेंट न्यूज पर मजबूत पकड़ है।
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