सोमनाथ मंदिर के कलश का पवित्र कुंभाभिषेक
ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की 75वीं जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंदिर के भव्य शिखर पर स्थापित कलश का कुंभाभिषेक संपन्न किया।
यह विशेष अनुष्ठान देश के 11 पवित्र तीर्थों से लाए गए 1100 लीटर जल से किया गया। यह अभिषेक धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
शतभिषा नक्षत्र का शुभ योग
कुंभाभिषेक ज्येष्ठ कृष्ण नवमी तिथि और शतभिषा नक्षत्र में संपन्न हुआ। शतभिषा नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता भगवान वरुण हैं जो सनातन परंपरा में कलश स्वरूप में पूजे जाते हैं।
शतभिषा नक्षत्र में पहले भगवान शिव का रुद्राभिषेक और फिर मंदिर शिखर पर कलश का अभिषेक राष्ट्र के लिए अत्यंत मंगलकारी है। यह साक्षात वरुणदेव की आराधना है।
इस विशेष मुहूर्त में चंद्र और राहु दोनों ही शतभिषा नक्षत्र में विराजमान थे। यह खगोलीय योग अत्यंत दुर्लभ और शुभफलदायी है।
सोमनाथ और चंद्र का पवित्र संबंध
देश के पश्चिम में स्थित ज्योतिर्लिंग सोमनाथ का अर्थ है चंद्र के स्वामी। भगवान शिव चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण करते हैं।
जब चंद्र राहु के साथ राहु के ही शतभिषा नक्षत्र में पीड़ित हो, उस समय शतभिषा नक्षत्र के देवता वरुण का आह्वान और उनके कलश स्वरूप की पूजा राष्ट्र के लिए कल्याणकारी है।
विशाल समुद्र के तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर में यह अनुष्ठान और भी विशिष्ट हो जाता है। समुद्रराज वरुण की उत्ताल तरंगों से नमी युक्त वायुमंडल में भगवान सोमनाथ की सन्निधि में यह कुंभाभिषेक अद्भुत, अद्वितीय और अमोघ है। इस अनुष्ठान से भारत के लिए किसी भी प्रकार के भय का कोई कारण नहीं रहेगा, राष्ट्र का केवल मंगल होगा।
वरुण देव की महिमा और शक्ति
सम्राट वरुण ने ही अंधकार को दूर करके पृथ्वी को सूर्य के नीचे व्यवस्थित किया था। वरुण ने वनों के ऊपर अंतरिक्ष का विस्तार किया, घोड़ों में बल स्थापित किया, गायों में दूध का संचार किया और हृदयों में संकल्प की शक्ति प्रदान की। उन्होंने जलधाराओं में अग्नि, आकाश में सूर्य और पर्वतों पर सोमलता को स्थापित किया था।
वरुण देव मेघों की खिड़कियां नीचे की ओर खोलकर धरती और आकाश में जल बरसाते हैं। वे ही पर्वतों को मेघों से ढक देते हैं और प्रकृति की व्यवस्था संभालते हैं।
वरुण का विराट स्वरूप
आचार्य सायण के अनुसार मेघों में विद्यमान बिजली और समुद्रों में स्थित वडवानल वरुण देव के ही रूप हैं। वरुण अंतरिक्ष के मापदंड अपने पास रखते हैं और पृथ्वी से सूर्य तक की दूरी नाप लेते हैं।
वरुण की इस विशाल प्रज्ञा को कोई भी लांघ नहीं सकता है। यही कारण है कि समुद्रराज वरुण एक होते हुए भी हजारों नदियां अपना जल उड़ेलकर भी उन्हें पूर्णतः भर नहीं पाती हैं।
पश्चिम दिशा के अधिपति वरुणदेव अपने पाशों में बांधकर और अंकुश से बेधकर सागर के भी पार फेंक देने की शक्ति रखते हैं। वरुण देवता की कृपा से अखंड पृथ्वी पर राज्य प्राप्त हो जाते हैं क्योंकि वे समस्त बंधनों को काट देते हैं।
वरुणदेव का दिव्य स्वरूप
चन्द्रप्रभं पंकजसन्निषण्णं पाशांकुशाभीतिवरं दधानम्।
मुक्ताविभूषांचितसर्वगात्रं ध्यायेत् प्रसन्नं वरुणं विभूत्यै।
वरुण देव के शरीर की कांति चंद्रमा के समान उज्ज्वल है। वे कमल पुष्प पर विराजमान रहते हैं। उनके हाथों में पाश, अंकुश, अभय और वरमुद्रा सुशोभित रहती है।
उनका संपूर्ण शरीर मोतियों के आभूषणों से अलंकृत है। इस प्रकार प्रसन्न मुख श्री वरुण देवता का ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए ध्यान करना चाहिए। उनकी आराधना से समृद्धि और मंगल की प्राप्ति होती है।

