Saturday, December 6, 2025

Shashi Tharoor: UN में 30 साल की सेवा, अब भारत के डेलिगेशन की कमान थरूर के हाथ

Shashi Tharoor: हाल ही में भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर के बाद उसे वैश्विक मंचों पर बेनकाब करने के लिए सात सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल बनाए हैं। इनमें से एक डेलिगेशन का नेतृत्व कांग्रेस सांसद शशि थरूर करेंगे।

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ये प्रतिनिधिमंडल संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों का दौरा कर आतंकवाद पर भारत की स्थिति और ऑपरेशन सिंदूर की सफलता को दुनिया के सामने रखेंगे। इसके जरिए पाकिस्तान की भूमिका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया जाएगा।

थरूर के नाम पर राजनीतिक विवाद

Shashi Tharoor: हालांकि, थरूर के नाम पर राजनीतिक घमासान भी देखने को मिला। कांग्रेस का दावा है कि उसने इस प्रतिनिधिमंडल के लिए थरूर का नाम नहीं दिया, बल्कि बीजेपी ने उन्हें बिना अनुमति के शामिल कर लिया।

इसके बावजूद शशि थरूर ने खुद को नामित किए जाने पर सम्मानित महसूस करने की बात कही। कई विशेषज्ञों का मानना है कि थरूर की भाषाई दक्षता और अंतरराष्ट्रीय अनुभव उन्हें इस भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त बनाते हैं।

संयुक्त राष्ट्र में लंबा और प्रभावशाली करियर

Shashi Tharoor: शशि थरूर का संयुक्त राष्ट्र (UN) से जुड़ाव काफी पुराना और गहरा है। उन्होंने 1978 में अपने करियर की शुरुआत जिनेवा में यूएनएचसीआर (UNHCR) के स्टाफ मेंबर के रूप में की थी। इसके बाद उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में कई महत्वपूर्ण पदों पर करीब 30 वर्षों तक सेवाएं दीं।

1981-1984: सिंगापुर यूएनएचसीआर कार्यालय के प्रमुख

1998-2001: संयुक्त राष्ट्र महासचिव कार्यालय में डायरेक्टर ऑफ कम्युनिकेशन एंड स्पेशल प्रोजेक्ट्स

2002-2007: अवर महासचिव, कम्युनिकेशन एंड पब्लिक इंफॉर्मेशन

महासचिव पद के लिए भारत के उम्मीदवार भी रहे

Shashi Tharoor: 2006 में भारत सरकार ने शशि थरूर को संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद के लिए आधिकारिक उम्मीदवार बनाया था। इस दौड़ में वह सात उम्मीदवारों में दूसरे स्थान पर रहे, जबकि दक्षिण कोरिया के बान की मून विजेता बने। थरूर की इस उपलब्धि ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।

राजनीति में सक्रिय भूमिका

2009 में थरूर ने संयुक्त राष्ट्र को अलविदा कहकर भारतीय राजनीति में कदम रखा। वह कांग्रेस पार्टी से जुड़कर सांसद बने और विदेश नीति, संचार और अंतरराष्ट्रीय मामलों में लगातार मुखर भूमिका निभाते रहे हैं। आज भी वे संसद में भारत की विदेश नीति को मजबूती से रखने वाले नेताओं में गिने जाते हैं।

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