भारत रूस सम्बन्ध
भारत और रूस के दशकों पुराने रिश्ते अब लड़ाकू विमानों, मिसाइलों और रक्षा सौदों से आगे निकलकर नागरिक विमानन की ओर बढ़ रहे हैं। रूस भारतीय बाजार में अपने क्षेत्रीय यात्री विमानों की बड़ी मौजूदगी चाहता है और इस दिशा में बातचीत निर्णायक दौर तक पहुंच गई है।
रूस की यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन के सीईओ वादिम बाडेखा के अनुसार पिछले छह महीनों के दौरान भारतीय कंपनियों के साथ बातचीत काफी तेजी से आगे बढ़ी है। संकेत मिल रहे हैं कि कुछ प्रस्ताव अब केवल चर्चा तक सीमित नहीं रहकर औपचारिक समझौतों का रूप ले सकते हैं।
नई दिल्ली में आयोजित इन्नोप्रोम इंडिया प्रदर्शनी इस पूरी रणनीति का महत्वपूर्ण केंद्र बन गई है। यहां रूस और भारत की 120 से अधिक कंपनियां भाग ले रही हैं और विमानन के साथ कई दूसरे औद्योगिक क्षेत्रों में भी नए समझौतों की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है।
यह आयोजन ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक पहले हो रहा है, इसलिए इसका रणनीतिक महत्व भी बढ़ गया है। भारत और रूस दोनों सरकारें औद्योगिक सहयोग को केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय निजी कंपनियों और संयुक्त विनिर्माण परियोजनाओं तक विस्तार देने की दिशा में काम कर रही हैं।
IL 114 300 पर सबसे बड़ी नजर
इस समय सबसे ज्यादा चर्चा रूस के IL 114 300 क्षेत्रीय यात्री विमान को लेकर है। यह टर्बोप्रॉप विमान मुख्य रूप से छोटी और मध्यम दूरी की उड़ानों के लिए तैयार किया गया है और रूस इसे भारतीय क्षेत्रीय विमानन बाजार के लिए उपयुक्त विकल्प मान रहा है।
रूसी कंपनियां भारतीय एयरलाइंस और विमान ऑपरेटरों के सामने IL 114 300 को सक्रिय रूप से पेश कर रही हैं। भारत में छोटे शहरों को जोड़ने वाली उड़ानों की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए रूस को उम्मीद है कि इस श्रेणी के विमानों के लिए बड़ा बाजार तैयार हो सकता है।
प्रस्तावित सौदों का आकार भी छोटा नहीं है। ओमकम एविएशन के लिए 50 विमान, एयर केरल के लिए 20 विमान और स्लीक एविएशन से जुड़े समझौता ज्ञापन के अंतर्गत 35 विमानों की संभावनाओं पर बातचीत सामने आई है।
यदि ये सभी प्रस्ताव आगे बढ़ते हैं तो केवल इन तीन संभावित व्यवस्थाओं में ही 105 विमानों का आंकड़ा बनता है। इससे यह संकेत मिलता है कि रूस भारत में क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए छोटे और मध्यम आकार के विमानों की मांग को दीर्घकालिक अवसर के रूप में देख रहा है।
भारत के छोटे शहरों के लिए क्यों अहम है यह विमान
IL 114 300 को रूस की यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन ने क्षेत्रीय यात्री सेवाओं के लिए विकसित किया है। इसकी भूमिका बड़े महानगरों के बीच लंबी दूरी की उड़ानों के बजाय छोटे शहरों, कम यात्री वाले मार्गों और क्षेत्रीय एयरपोर्टों को जोड़ने वाली सेवाओं में अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।
भारत जैसे विशाल देश में यह भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि अनेक छोटे और मध्यम शहर अभी भी नियमित और व्यावहारिक हवाई कनेक्टिविटी का इंतजार कर रहे हैं। बड़े जेट विमानों से हर कम यात्री वाले मार्ग पर आर्थिक रूप से सफल सेवा चलाना आसान नहीं है।
यहीं टर्बोप्रॉप विमान महत्वपूर्ण विकल्प बनते हैं। अपेक्षाकृत कम यात्री क्षमता, कम ईंधन खर्च और नियंत्रित संचालन लागत के कारण इन्हें ऐसे मार्गों पर चलाना संभव हो सकता है जहां बड़े जेट विमानों का संचालन एयरलाइंस के लिए घाटे का सौदा बन जाता है।
भारतीय विमानन कंपनियों के सामने लंबे समय से ऐसी मशीनों की आवश्यकता रही है जो छोटे मार्गों पर पर्याप्त क्षमता दें लेकिन उनका संचालन खर्च बहुत ज्यादा न हो। IL 114 300 को इसी जरूरत के संभावित समाधान के रूप में भारतीय बाजार में प्रस्तुत किया जा रहा है।
छह विमानों से शुरू हुई बातचीत अब बड़े सौदों तक
IL 114 300 को लेकर भारत और रूस के बीच बातचीत अचानक शुरू नहीं हुई है। जनवरी में हैदराबाद में आयोजित विंग्स इंडिया एविएशन एग्जीबिशन के दौरान इस विमान को भारतीय बाजार में लाने की दिशा में पहले ही एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक कदम उठाया जा चुका था।
उस समय यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन ने भारतीय कंपनी फ्लेमिंगो एयरोस्पेस के साथ छह IL 114 300 विमानों की संभावित आपूर्ति के लिए प्रारंभिक समझौता किया था। उस समझौते ने भारतीय क्षेत्रीय विमानन बाजार में रूसी विमान की संभावनाओं का पहला स्पष्ट संकेत दिया था।
अब इन्नोप्रोम इंडिया के दौरान चर्चा छह विमानों की संभावित आपूर्ति से कहीं आगे निकलती दिखाई दे रही है। दर्जनों विमानों से जुड़े प्रस्ताव सामने आने के बाद रूस भारतीय बाजार को प्रयोगात्मक अवसर नहीं बल्कि बड़े व्यावसायिक विस्तार के संभावित केंद्र की तरह देख रहा है।
अगर ये प्रस्ताव वास्तविक ऑर्डर में बदलते हैं तो भारतीय बाजार में रूसी नागरिक विमानों के लिए नया रास्ता खुलेगा। साथ ही भारतीय क्षेत्रीय एयरलाइंस को उन मार्गों के लिए एक और विकल्प मिलेगा जहां वर्तमान विमान बेड़े का संचालन आर्थिक रूप से कठिन साबित होता है।
क्षेत्रीय उड़ानों का गणित क्यों अलग है
भारत में बड़े यात्री विमानों की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन क्षेत्रीय विमानन का आर्थिक गणित अलग होता है। छोटे शहरों के बीच यात्रियों की संख्या कई मार्गों पर इतनी नहीं होती कि वहां बड़ी क्षमता वाले जेट विमानों को लगातार लाभ के साथ चलाया जा सके।
ऐसे मार्गों पर विमान की सीट क्षमता, ईंधन खपत, रखरखाव खर्च और एयरपोर्ट संचालन लागत बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। टर्बोप्रॉप विमानों का सबसे बड़ा फायदा यही है कि वे कम दूरी और अपेक्षाकृत कम यात्री संख्या वाले मार्गों पर बेहतर आर्थिक संतुलन दे सकते हैं।
भारत में कई घरेलू ऑपरेटर लंबे समय से ऐसे छोटे विमानों की तलाश में हैं जिन्हें क्षेत्रीय नेटवर्क में व्यावहारिक रूप से इस्तेमाल किया जा सके। रूस इसी खाली जगह में IL 114 300 को स्थापित करने की कोशिश कर रहा है और बड़े संभावित ऑर्डर इसी रणनीति का हिस्सा हैं।
यदि विमान भारतीय परिचालन परिस्थितियों, लागत और रखरखाव संबंधी आवश्यकताओं पर खरा उतरता है तो इसका उपयोग उन शहरों तक हवाई सेवाएं पहुंचाने में किया जा सकता है जहां बड़ी एयरलाइंस अभी नियमित विमान सेवा शुरू करने से हिचकती रही हैं।
केवल विमान बेचने की नहीं, भारत में बनाने की तैयारी
भारत रूस विमानन सहयोग की कहानी केवल IL 114 300 की बिक्री तक सीमित नहीं है। रूस अपने SJ 100 क्षेत्रीय जेट के भारत में स्थानीय उत्पादन की योजना पर भी तेजी से आगे बढ़ रहा है और इस विषय पर बातचीत काफी आगे पहुंच चुकी है।
यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन के अनुसार SJ 100 के स्थानीय उत्पादन से जुड़ी बातचीत लगभग 80 प्रतिशत तक पूरी हो चुकी है। यदि शेष मुद्दों पर सहमति बनती है तो निकट भविष्य में इसे लेकर एक औपचारिक समझौता सामने आने की संभावना जताई जा रही है।
इससे पहले यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बीच SJ 100 के संयुक्त लाइसेंस प्राप्त उत्पादन से संबंधित समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके हैं। इसलिए वर्तमान बातचीत पहले से तैयार औद्योगिक ढांचे को आगे बढ़ाने वाली अगली महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है।
SJ 100 एक आधुनिक क्षेत्रीय जेट विमान है। यदि इसका उत्पादन भारत में शुरू होता है तो यह केवल एक विदेशी विमान की स्थानीय असेंबली भर नहीं रहेगा, बल्कि तकनीक, विनिर्माण क्षमता और भविष्य की भारतीय एयरोस्पेस सप्लाई चेन के लिए महत्वपूर्ण परियोजना बन सकता है।
मेक इन इंडिया को मिल सकती है नई दिशा
भारत में SJ 100 के उत्पादन का सबसे बड़ा प्रभाव स्थानीय निर्माण क्षमता पर पड़ सकता है। यदि भारतीय कंपनियां विमान के महत्वपूर्ण हिस्सों और प्रणालियों का निर्माण देश के भीतर करने लगती हैं तो नागरिक विमान निर्माण का घरेलू औद्योगिक आधार मजबूत होने की संभावना बनेगी।
स्थानीय उत्पादन बढ़ने का दूसरा प्रभाव लागत पर दिखाई दे सकता है। विमान के अधिक हिस्से भारत में बनने से आयात पर निर्भरता कम हो सकती है और लंबी अवधि में उत्पादन लागत को नियंत्रित करने की संभावना बढ़ सकती है, हालांकि अंतिम तस्वीर समझौते की शर्तों पर निर्भर करेगी।
इस परियोजना से रोजगार और कौशल विकास के अवसर भी बढ़ सकते हैं। विमान निर्माण केवल अंतिम असेंबली तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें हजारों कलपुर्जे, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग, परीक्षण, गुणवत्ता नियंत्रण, रखरखाव और सप्लाई चेन से जुड़ी विस्तृत औद्योगिक व्यवस्था शामिल होती है।
यदि भारतीय उद्योग इस श्रृंखला में पर्याप्त हिस्सा हासिल करता है तो भविष्य में इन विमानों या उनके कलपुर्जों के निर्यात के अवसर भी खुल सकते हैं। यही कारण है कि स्थानीय उत्पादन को साधारण खरीद सौदे की तुलना में अधिक रणनीतिक महत्व दिया जा रहा है।
खरीदार और विक्रेता से आगे जाएगी साझेदारी
SJ 100 के स्थानीय उत्पादन पर बातचीत का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह भारत रूस संबंधों को केवल विमान खरीदने और बेचने की व्यवस्था तक सीमित नहीं रखेगा। इससे दोनों देशों के बीच संयुक्त विनिर्माण और तकनीकी साझेदारी का एक नया ढांचा तैयार हो सकता है।
रक्षा क्षेत्र में भारत और रूस लंबे समय से इसी प्रकार के सहयोग के कई मॉडल देख चुके हैं। लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर, मिसाइल प्रणालियां और दूसरे सैन्य प्लेटफॉर्म दशकों से दोनों देशों के रक्षा संबंधों की प्रमुख आधारशिला रहे हैं।
अब उसी औद्योगिक सहयोग के कुछ तत्व नागरिक विमानन क्षेत्र में लाने की कोशिश दिखाई दे रही है। अगर यह मॉडल सफल होता है तो भारत में रूसी नागरिक विमान केवल आयातित उत्पाद नहीं रहेंगे, बल्कि घरेलू उद्योग और उत्पादन व्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं।
रूस के लिए भी यह व्यवस्था महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि किसी बड़े बाजार में स्थानीय उत्पादन केवल तत्काल बिक्री नहीं बढ़ाता बल्कि रखरखाव, कलपुर्जों, प्रशिक्षण और भविष्य की विमान खरीद से जुड़ा दीर्घकालिक व्यावसायिक संबंध तैयार करता है।
रूस के लिए भारत इतना महत्वपूर्ण क्यों
पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आए बदलावों के बीच रूस लगातार नए बाजार और औद्योगिक साझेदार तलाश रहा है। नागरिक विमानन के क्षेत्र में भारत उसके लिए बड़ी अर्थव्यवस्था, तेजी से बढ़ता विमानन बाजार और दीर्घकालिक मांग वाला महत्वपूर्ण विकल्प है।
भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते विमानन बाजारों में शामिल है और यहां महानगरों के साथ छोटे शहरों में भी हवाई यात्रियों की संख्या बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में क्षेत्रीय विमान बनाने वाली कंपनियों के लिए भारतीय बाजार स्वाभाविक रूप से आकर्षक बनता जा रहा है।
इन्नोप्रोम इंडिया को इसी बड़ी रणनीति के संदर्भ में देखा जा सकता है। इस आयोजन में केवल विमान सौदों पर चर्चा नहीं हो रही, बल्कि दोनों देशों के बीच औद्योगिक सहयोग को कई अलग क्षेत्रों में विस्तार देने के अवसरों पर भी काम हो रहा है।
120 से अधिक भारतीय और रूसी कंपनियों की भागीदारी यह भी दिखाती है कि संबंधों को केवल सरकारी सौदों पर आधारित रखने की सोच बदल रही है। निजी कंपनियां, औद्योगिक समूह और निर्माण क्षेत्र अब द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों में बड़ी भूमिका निभाने की तैयारी कर रहे हैं।
भारत की उड़ान योजना से जुड़ सकता है रूसी विमान
भारत सरकार की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी नीति का प्रमुख उद्देश्य छोटे और अपेक्षाकृत कम जुड़े शहरों को हवाई नेटवर्क में शामिल करना है। उड़ान योजना के तहत वर्षों से ऐसे मार्ग विकसित करने की कोशिश चल रही है जहां पहले नियमित वाणिज्यिक विमान सेवाएं उपलब्ध नहीं थीं।
रूसी क्षेत्रीय विमान यदि प्रतिस्पर्धी कीमत, पर्याप्त विश्वसनीयता और कम संचालन लागत के साथ भारतीय बाजार में आते हैं तो वे इस रणनीति में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं। खासकर ऐसे मार्गों पर जहां बड़े विमानों की सीट क्षमता आवश्यकता से काफी ज्यादा होती है।
इसके साथ यदि विमान निर्माण का कुछ हिस्सा भारत में स्थानांतरित होता है तो क्षेत्रीय कनेक्टिविटी की जरूरत और घरेलू विमान विनिर्माण के लक्ष्य एक साथ आगे बढ़ सकते हैं। इससे विमान खरीदने के साथ भारत अपनी दीर्घकालिक एयरोस्पेस उत्पादन क्षमता भी विकसित कर सकेगा।
हालांकि किसी विमान का भारतीय बाजार में व्यावसायिक रूप से सफल होना केवल उसकी तकनीकी क्षमता से तय नहीं होगा। एयरलाइंस के लिए विमान की वास्तविक कीमत, वित्तीय व्यवस्था, रखरखाव खर्च और लंबी अवधि में उपलब्ध तकनीकी सहायता समान रूप से निर्णायक साबित होगी।
रास्ते में बड़ी चुनौतियां भी
इन प्रस्तावों की संभावनाएं बड़ी हैं लेकिन रास्ता पूरी तरह आसान नहीं है। सबसे पहली चुनौती प्रमाणन और नियामक मंजूरी की होगी। किसी भी नए विमान को भारतीय वाणिज्यिक सेवाओं में उतारने से पहले कठोर सुरक्षा परीक्षणों और निर्धारित प्रमाणन प्रक्रियाओं से गुजरना आवश्यक होता है।
भारतीय विमानन नियामक व्यवस्था के मानकों को पूरा किए बिना किसी विमान की नियमित यात्री सेवा शुरू नहीं हो सकती। इसलिए संभावित खरीद समझौतों के बाद भी प्रमाणन, तकनीकी दस्तावेज और संचालन अनुमति की प्रक्रिया परियोजना की वास्तविक समयसीमा पर असर डाल सकती है।
दूसरी बड़ी चुनौती रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता होगी। एयरलाइन के लिए विमान खरीदना केवल पहली लागत है। किसी पूरे बेड़े को वर्षों तक सेवा में बनाए रखने के लिए इंजीनियरिंग समर्थन, कलपुर्जे, प्रशिक्षित तकनीशियन और मरम्मत केंद्रों का मजबूत नेटवर्क चाहिए।
यदि किसी विमान के कलपुर्जों की आपूर्ति में देरी होती है तो वह लंबे समय तक जमीन पर खड़ा रह सकता है और एयरलाइन को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए भारतीय ऑपरेटर किसी भी बड़े ऑर्डर से पहले सपोर्ट नेटवर्क की विश्वसनीयता जरूर परखेंगे।
मुकाबला भी आसान नहीं होगा
तीसरी चुनौती भारतीय क्षेत्रीय विमान बाजार में मौजूद अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा है। कई विदेशी विमान निर्माता पहले से इस बाजार में मौजूद हैं या अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए रूसी विमानों को केवल आकर्षक खरीद मूल्य के आधार पर सफलता मिलना निश्चित नहीं है।
एयरलाइंस विमान चुनते समय ईंधन दक्षता, प्रति सीट संचालन लागत, यात्री सुविधा, विश्वसनीयता और विमान की उपलब्धता जैसे कई पहलुओं का मूल्यांकन करती हैं। इनके साथ आफ्टर सेल्स सपोर्ट और स्पेयर पार्ट्स नेटवर्क भी अंतिम निर्णय में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
चौथी चुनौती वित्तीय व्यवस्था की है। दर्जनों विमानों के बड़े सौदों में खरीद मूल्य अरबों रुपये तक पहुंच सकता है। ऐसे में आसान ऋण सुविधा, लीजिंग व्यवस्था और आकर्षक वित्तीय पैकेज विमान निर्माता की बाजार सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
यदि रूस या संबंधित वित्तीय संस्थान भारतीय ऑपरेटरों को प्रतिस्पर्धी वित्तपोषण उपलब्ध करा पाते हैं तो सौदों के वास्तविक ऑर्डर में बदलने की संभावना बढ़ेगी। अन्यथा तकनीकी रूप से आकर्षक विमान भी महंगे वित्तपोषण के कारण एयरलाइंस के लिए कम उपयोगी साबित हो सकते हैं।
फिर भी छह महीनों की प्रगति ने बढ़ाई उम्मीद
इन तमाम चुनौतियों के बावजूद रूसी पक्ष भारत के नागरिक विमानन बाजार को लेकर आशावादी दिखाई देता है। पिछले छह महीनों में भारतीय कंपनियों के साथ हुई प्रगति और इन्नोप्रोम इंडिया के दौरान संभावित समझौतों को इसी बढ़ते विश्वास का संकेत माना जा रहा है।
यदि IL 114 300 से जुड़े बड़े ऑर्डर वास्तविक अनुबंधों में बदलते हैं और SJ 100 का भारत में स्थानीय उत्पादन भी शुरू होता है तो यह भारत रूस एयरोस्पेस संबंधों में अब तक के सबसे महत्वपूर्ण नागरिक विमानन विस्तारों में शामिल हो सकता है।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण होगा क्योंकि भारत रूस संबंधों में विमानन सहयोग का अर्थ अब तक मुख्य रूप से सैन्य प्लेटफॉर्म रहा है। नागरिक विमानों में बड़े स्तर की साझेदारी इस पुराने संबंध को एक नए आर्थिक और औद्योगिक आयाम में ले जाएगी।
इसके सफल होने पर भारतीय एयरलाइंस को क्षेत्रीय विमान बाजार में एक अतिरिक्त आपूर्ति स्रोत मिलेगा और भारतीय उद्योग को विमान निर्माण से जुड़ी नई तकनीक तथा उत्पादन अनुभव हासिल करने का अवसर मिल सकता है।
भारत के लिए तीन बड़े रणनीतिक लाभ
भारत के दृष्टिकोण से इस सहयोग का पहला बड़ा लाभ क्षेत्रीय हवाई कनेक्टिविटी में सुधार हो सकता है। यदि उपयुक्त क्षमता और कम संचालन लागत वाले विमान उपलब्ध होते हैं तो एयरलाइंस उन छोटे शहरों के लिए भी नई सेवाएं शुरू कर सकती हैं जहां अभी यात्री संख्या सीमित है।
दूसरा बड़ा लाभ घरेलू विनिर्माण क्षमता का विकास होगा। SJ 100 जैसी परियोजनाएं भारतीय कंपनियों को जटिल नागरिक विमान निर्माण प्रक्रिया से जोड़ सकती हैं और भविष्य में स्वदेशी या संयुक्त विमान परियोजनाओं के लिए आवश्यक औद्योगिक अनुभव विकसित करने में मदद कर सकती हैं।
तीसरा लाभ आपूर्ति स्रोतों में विविधता का है। भारत विमानन क्षेत्र में किसी एक देश या औद्योगिक समूह पर अत्यधिक निर्भरता कम करना चाहता है। रूस से नया विकल्प मिलने पर भारतीय एयरलाइंस और उद्योग के सामने विमानों तथा तकनीक के अधिक स्रोत उपलब्ध होंगे।
विविध आपूर्ति स्रोत रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि वैश्विक संकट, प्रतिबंध, युद्ध या सप्लाई चेन बाधाओं के समय किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता जोखिम बढ़ा सकती है। रूस के साथ साझेदारी भारत को एक अतिरिक्त विमानन औद्योगिक विकल्प दे सकती है।
रूस को भी मिलेगा विशाल बाजार
रूस के लिए भारत केवल विमान बेचने का बाजार नहीं है। यदि स्थानीय उत्पादन की व्यवस्था सफल होती है तो उसे ऐसे देश में दीर्घकालिक औद्योगिक मौजूदगी मिल सकती है जहां आने वाले वर्षों में घरेलू और क्षेत्रीय हवाई यात्रा तेजी से बढ़ने की संभावना बनी हुई है।
तकनीक साझा करने और स्थानीय निर्माण व्यवस्था विकसित करने से रूस भारतीय कंपनियों के साथ लंबे समय तक जुड़ा रह सकता है। इससे विमान बिक्री के बाद रखरखाव, प्रशिक्षण, स्पेयर पार्ट्स और संभावित भविष्य के नए मॉडल से जुड़ा व्यापक व्यावसायिक नेटवर्क विकसित किया जा सकता है।
ब्रिक्स जैसे मंचों पर भारत और रूस पहले से सहयोग करते रहे हैं। यदि इसी राजनीतिक और रणनीतिक समझ को औद्योगिक तथा तकनीकी परियोजनाओं में बदला जाता है तो दोनों देशों के संबंधों का आर्थिक आधार पहले की तुलना में कहीं अधिक विस्तृत हो सकता है।
इन्नोप्रोम इंडिया में संभावित समझौते इसलिए केवल कुछ विमानों की खरीद तक सीमित घटना नहीं होंगे। इनके पीछे क्षेत्रीय कनेक्टिविटी, विमान निर्माण, तकनीक, रोजगार, औद्योगिक निवेश और दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग की एक बड़ी तस्वीर दिखाई दे रही है।
जमीन पर उतरे समझौते तो बदल सकती है तस्वीर
IL 114 300 भारतीय क्षेत्रीय उड़ानों में प्रवेश करता है और SJ 100 का उत्पादन भारत में शुरू होता है तो दोनों परियोजनाएं एक दूसरे की पूरक बन सकती हैं। एक तरफ एयरलाइंस को नए विमान मिलेंगे और दूसरी तरफ भारत में निर्माण क्षमता विकसित होगी।
यह मॉडल सफल रहा तो भविष्य में भारत रूसी नागरिक विमानों के लिए केवल ग्राहक नहीं रहेगा। देश निर्माण, रखरखाव, कलपुर्जों, इंजीनियरिंग और संभावित निर्यात व्यवस्था में भी भागीदार बन सकता है, जिससे पूरे सहयोग का आर्थिक महत्व काफी बढ़ जाएगा।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि प्रस्तावित विमान सौदे वास्तविक अनुबंधों तक पहुंचते हैं या नहीं और SJ 100 के स्थानीय उत्पादन पर बची बातचीत कितनी जल्दी पूरी होती है। प्रमाणन, लागत और सपोर्ट व्यवस्था भी आगे की सफलता तय करेंगी।
लेकिन मौजूदा संकेत बताते हैं कि भारत और रूस नागरिक एयरोस्पेस में पहले से कहीं अधिक गंभीरता से आगे बढ़ रहे हैं। यदि योजनाएं धरातल पर उतरती हैं तो दशकों पुराना रक्षा सहयोग नागरिक विमानन और संयुक्त निर्माण के नए युग में प्रवेश कर सकता है।

