Sunday, September 13, 2026

राहुल गाँधी: छात्रों से संवाद में सामने आई राहुल की नकारात्मक सोच, बच्चों को किया भ्रमित?

भविष्य की पीढ़ी में भ्रांति के बीज बोते राहुल गाँधी

राहुल गाँधी: एक राजनीतिक पर्यटन और बाल मन पर प्रहार

तमिलनाडु में एक निजी विद्यालय के कार्यक्रम में राहुल गाँधी की उपस्थिति और वहां छात्रों के साथ उनका संवाद एक बार पुनः यह सिद्ध करता है कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष के पास न तो विषयों की गंभीरता को समझने की दृष्टि है और न ही भविष्य की पीढ़ी को दिशा देने का सामर्थ्य।

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब एक राजनेता विद्यालयीन छात्रों के बीच जाता है, तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह राष्ट्र निर्माण, चरित्र निर्माण और सकारात्मक भविष्य की बात करेगा, परन्तु राहुल गाँधी के लिए यह भी अपनी कुंठा निकालने और राजनीतिक प्रोपेगेंडा फैलाने का एक मंच मात्र बनकर रह गया।

तमिलनाडु का यह दौरा, जो संभवतः चुनावी आहटों के बीच हुआ, राहुल गाँधी की उसी पुरानी कार्यशैली का परिचायक है जहाँ वे बिना किसी तैयारी और तथ्यात्मक आधार के गंभीर विषयों पर अनर्गल प्रलाप करते हैं।

जब एक आठवीं कक्षा का बालक उनसे रोबोटिक्स और एआई के कारण शिक्षा प्रणाली में बदलाव पर प्रश्न पूछता है, तो राहुल गाँधी का उत्तर न केवल विषयांतर होता है बल्कि वह अपनी ही पिछली सरकारों की विफलताओं को वर्तमान की आवश्यकता बताकर प्रस्तुत करने का हास्यास्पद प्रयास करते हैं।

विनिर्माण क्षेत्र और चीन का महिमामंडन: एक ऐतिहासिक विरोधाभास

राहुल गाँधी ने बालक के प्रश्न के उत्तर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तकनीकी बारीकियों पर बात करने के बजाय उत्पादन और विनिर्माण क्षेत्र पर प्रवचन देना उचित समझा, जो स्वयं में उनकी तकनीकी समझ के अभाव को दर्शाता है। वे कहते हैं कि हमें उत्पादन पर ध्यान देना होगा और चीन का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि आज हर वस्तु ‘मेड इन चाइना’ है, जिसे हमें बदलना होगा।

विडंबना यह है कि यह ज्ञान वे दे रहे हैं जिनके परिवार और पार्टी ने देश पर सर्वाधिक समय तक शासन किया और जिनके कार्यकाल में भारत के विनिर्माण क्षेत्र की रीढ़ तोड़ दी गई थी। वर्ष 2004 से 2014 के बीच यूपीए शासनकाल के दौरान भारत की नीतियां कुछ ऐसी थीं जिन्होंने घरेलू विनिर्माण को हतोत्साहित किया और आयात को बढ़ावा दिया।

उस कालखंड में तैयार माल पर आयात शुल्क शून्य या नगण्य रखा गया, जबकि कच्चे माल पर उच्च शुल्क था, जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में ‘इन्वर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर’ कहा जाता है। इस नीति ने भारत के लघु और मध्यम उद्योगों को बर्बाद कर दिया और चीन को भारतीय बाज़ार पर कब्ज़ा करने का खुला निमंत्रण दिया। आज जब वे चीन के प्रभुत्व की बात करते हैं, तो वे भूल जाते हैं कि यह भस्मासुर उन्हीं की नीतियों का परिणाम है।

एआई और तकनीक पर अज्ञानता का प्रदर्शन

जब प्रश्न एआई और रोबोटिक्स का था, तो राहुल गाँधी को यह स्वीकार करना चाहिए था कि यह चौथी औद्योगिक क्रांति का युग है जहाँ स्वचालन एक वास्तविकता है। एआई केवल एक सॉफ्टवेयर नहीं है, बल्कि यह उत्पादन की पूरी प्रक्रिया को पुनर्परिभाषित कर रहा है। राहुल गाँधी का यह कहना कि हमें कारीगरों और हाथ से काम करने वालों का सम्मान करना चाहिए, सुनने में भावनात्मक और आदर्शवादी लग सकता है, लेकिन यह उस तकनीकी प्रश्न का उत्तर नहीं है।

एआई और रोबोटिक्स के युग में यदि हम केवल पारंपरिक हस्तशिल्प की बात करेंगे और आधुनिक तकनीक को नहीं अपनाएंगे, तो भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाएगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने एआई मिशन और डिजिटल इंडिया के माध्यम से जिस तकनीकी क्रांति का सूत्रपात किया है, राहुल गाँधी उसे समझने में पूरी तरह असमर्थ दिखाई देते हैं।

वे आज भी उसी सोच में अटके हैं जहाँ वे तकनीक को रोजगार का शत्रु मानते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि तकनीक रोजगार के स्वरूप को बदल रही है, उसे समाप्त नहीं कर रही। एक बच्चे को एआई के प्रभाव के बारे में गलत जानकारी देना या उसे गुमराह करना बौद्धिक अपराध की श्रेणी में आता है।

पर्यावरण संरक्षण के नाम पर दोहरा चरित्र

एक अन्य प्रश्न में जब छात्रा ने पर्यावरण और अरावली की पहाड़ियों के संरक्षण पर प्रश्न पूछा, तो राहुल गाँधी ने तत्काल इसे ‘लालच’ से जोड़ दिया और विकास बनाम पर्यावरण की एक घिसी-पिटी बहस छेड़ दी। वे कहते हैं कि हम अपने पर्यावरण की बलि देकर विकास नहीं कर सकते और अरावली में जो हो रहा है वह अनियंत्रित लालच है।

यहाँ उनके पाखंड की पोल स्वयं उनके ही पार्टी के शासनकाल के तथ्यों से खुल जाती है। राजस्थान में जब अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी, तब अरावली क्षेत्र में खनन के पट्टे धड़ल्ले से आवंटित किए गए थे। जिस ‘लालच’ की बात राहुल गाँधी कर रहे हैं, क्या वह उनकी अपनी राज्य सरकार पर लागू नहीं होता? वामपंथी विचारधारा से प्रेरित होकर विकास कार्यों को रोकना और हर परियोजना में अड़ंगा लगाना कांग्रेस की पुरानी आदत रही है।

सभ्यता के विकास के लिए संसाधनों का दोहन एक अपरिहार्य आवश्यकता है। जिस भवन में वे खड़े होकर भाषण दे रहे हैं, जिस माइक का वे प्रयोग कर रहे हैं और जिस कैमरे से उनकी रिकॉर्डिंग हो रही है, वह सब उसी धरती के संसाधनों के दोहन से बने हैं। पर्यावरण और विकास में संतुलन आवश्यक है, परन्तु विकास को पूरी तरह से नकारना और उसे ‘लालच’ की संज्ञा देना एक अपरिपक्व मानसिकता का परिचायक है।

अनुशासनहीनता का महिमामंडन और गलत आदर्श

विद्यालयीन जीवन में अनुशासन का महत्व सर्वाधिक होता है, क्योंकि यही वह नींव है जिस पर एक जिम्मेदार नागरिक और सफल व्यक्ति का निर्माण होता है। परन्तु राहुल गाँधी छात्रों से कहते हैं कि वे अनुशासनहीन थे, शिक्षकों की बात नहीं मानते थे और हर बात पर प्रश्न उठाते थे। वे इसे अपनी ‘जिज्ञासु’ प्रवृत्ति बताकर महिमामंडित करते हैं।

भारतीय संस्कृति में अनुशासन को कभी भी दासता नहीं माना गया है, बल्कि इसे ‘स्व-शासन’ और आत्म-नियंत्रण का साधन माना गया है। ‘अनुशासन ही देश को महान बनाता है’ जैसे वाक्य हमारे विद्यालयों की दीवारों पर शोभा पाते हैं। राहुल गाँधी का यह कथन कि यदि आप बहुत अनुशासित होंगे तो आप सोच नहीं पाएंगे, पूर्णतः भ्रामक है। अनुशासन ही वह ढांचा प्रदान करता है जिसके भीतर रचनात्मकता फलती-फूलती है।

राहुल गाँधी का स्वयं का जीवन इस बात का प्रमाण है कि अनुशासनहीनता और निरंतर चंचलता ने उन्हें राजनीति में कभी भी गंभीरता से स्थापित नहीं होने दिया। 50 वर्ष की आयु पार करने के बाद भी यदि वे अपने राजनीतिक जीवन में कोई ठोस उपलब्धि नहीं हासिल कर पाए हैं, तो इसका एक बड़ा कारण उनके जीवन में अनुशासन और गंभीरता का अभाव है। वे बच्चों के सामने एक गलत उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं कि विद्रोही होना और नियमों को न मानना ही बुद्धिमत्ता की निशानी है।

लोकतंत्र पर प्रहार का झूठा विलाप

सबसे आपत्तिजनक और चिंताजनक विषय वह है जब राहुल गाँधी अबोध बच्चों के सामने भारतीय लोकतंत्र के खतरे में होने का रोना रोते हैं। वे कहते हैं कि भारत में संस्थाओं पर हमला हो रहा है, लोगों की आवाज दबाई जा रही है और लोकतंत्र की नींव हिल रही है। यह वही रटा-रटाया भाषण है जो वे कैंब्रिज विश्वविद्यालय में देते हैं, वही बात वे जर्मनी में कहते हैं और अब वही जहर वे स्कूली बच्चों के दिमाग में भर रहे हैं।

एक लोकतांत्रिक देश में, जहाँ वे स्वयं को विपक्ष का नेता बताते हैं और देश भर में यात्राएं करते हैं, सरकार की आलोचना करते हैं, वहां वे किस आधार पर कहते हैं कि उनकी आवाज दबाई जा रही है? यह केवल एक राजनीतिक प्रोपेगेंडा है जिसे वे हर मंच से दोहराते हैं ताकि एक झूठा ‘नैरेटिव’ गढ़ा जा सके।

13-14 वर्ष के बच्चों, जिनका अभी राजनीतिक समाजीकरण भी ठीक से नहीं हुआ है, उनके सामने अपनी ही चुनी हुई सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करना राष्ट्रहित के विरुद्ध है। चुनाव आयोग, न्यायपालिका और संसद जैसी संस्थाओं की गरिमा को गिराना और बच्चों को यह बताना कि वे सुरक्षित नहीं हैं, एक अत्यंत निम्न स्तर की राजनीति है।

शिक्षा में निजीकरण और दोमुंहापन

शिक्षा के निजीकरण पर राहुल गाँधी का वक्तव्य उनके अंतर्विरोधों का एक और उदाहरण है। वे एक निजी विद्यालय के मंच पर खड़े होकर कहते हैं कि शिक्षा का निजीकरण नहीं होना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ देते हैं कि कुछ निजी स्कूल हो सकते हैं।

यह अस्पष्टता उनकी वैचारिक दरिद्रता को दर्शाती है। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी अनिवार्य है। सरकारी तंत्र की अपनी सीमाएं हैं और पिछले सत्तर वर्षों में सरकारी शिक्षा व्यवस्था, विशेषकर उच्च शिक्षा में, गुणवत्ता का जो ह्रास हुआ है वह किसी से छिपा नहीं है।

आरक्षण की राजनीति और वोट बैंक के तुष्टीकरण ने सरकारी शिक्षण संस्थानों की मेरिट को बुरी तरह प्रभावित किया है। ऐसे में यदि भारत को विश्व गुरु बनना है और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में अपनी जगह बनानी है, तो निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देना आवश्यक है। राहुल गाँधी का यह बयान कि सरकार को ही सब कुछ करना चाहिए, उस समाजवादी मानसिकता का प्रतीक है जिसने दशकों तक भारत की उद्यमिता और क्षमता को बेड़ियों में जकड़ कर रखा।

नकारात्मकता का विषपान

राहुल गाँधी का यह संवाद बच्चों को प्रेरित करने के बजाय उन्हें भ्रमित करने वाला अधिक था। उन्होंने न केवल ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा बल्कि अपनी राजनीतिक विफलताओं को छिपाने के लिए व्यवस्था को ही दोषी ठहराने का प्रयास किया।

एक राजनेता के रूप में उनकी जिम्मेदारी थी कि वे बच्चों में राष्ट्र के प्रति गौरव, अनुशासन और सकारात्मकता का भाव जगाते, परन्तु उन्होंने इसके विपरीत उनमें असंतोष, अविश्वास और नकारात्मकता के बीज बोने का कार्य किया। यह ‘सूडो-सेक्युलर’ और वामपंथी जमात का पुराना एजेंडा है कि वे संस्थाओं को भीतर से खोखला करने के लिए युवा मन को दूषित करते हैं।

राहुल गाँधी का यह आचरण यह सिद्ध करता है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हो रहे भारत के नवनिर्माण को पचा नहीं पा रहे हैं और अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए अब बच्चों का भी इस्तेमाल करने से नहीं चूक रहे हैं। राष्ट्र को ऐसे भ्रामक विमर्शों से सतर्क रहने की आवश्यकता है।

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Mudit
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लेखक भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर लेखन कर रहे हैं। समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास पर रिसर्च बेस्ड विश्लेषण में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। उनके शोधपरक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं।
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