असम की ‘लक्ष्मीबाई’ कनकलता बरुआ: इतिहास केवल तारीखों से नहीं, बल्कि उन अनगिनत शहादतों से लिखा जाता है जिन्होंने अपने लहू से स्वाधीनता का मार्ग प्रशस्त किया।
असम के दर्रांग जिले के छोटे से गांव बारंगाबाड़ी में 22 दिसंबर 1926 को जन्मी कनकलता बरुआ ऐसी ही एक अमर वीरांगना थीं।
साधारण परिवार में जन्मीं और बचपन में ही मातृछाया खो चुकीं कनकलता का जीवन संघर्षों से भरा था, लेकिन विपरीत परिस्थितियों ने उनके भीतर एक अदम्य साहस को जन्म दिया।
बालमन में सुलगता क्रांति का बीज
असम की ‘लक्ष्मीबाई’ कनकलता बरुआ: गुलामी के उस दौर में अंग्रेजों के अत्याचार और भारतीयों पर होते अन्याय को कनकलता ने बहुत करीब से देखा था।
महात्मा गांधी के संदेशों और कांग्रेस के स्वाधीनता संकल्प से प्रेरित होकर उनके भीतर राष्ट्रप्रेम की अलख जगी।
वह महज दर्शक बनकर नहीं रहना चाहती थीं, बल्कि सक्रिय भूमिका निभाकर देश को बेड़ियों से मुक्त कराने का सपना देख रही थीं।
‘करो या मरो’ का आह्वान और ‘मृत्यु वाहिनी’ का संकल्प
1942 में जब गांधीजी ने ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन का शंखनाद किया, तो यह गूंज पूर्वोत्तर के गांवों तक पहुंची। कनकलता युवाओं के उस आत्मबलिदानी दस्ते ‘मृत्यु वाहिनी’ का हिस्सा बनीं, जिसका एकमात्र लक्ष्य देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करना था। उम्र महज 17 वर्ष थी, लेकिन मातृभूमि की रक्षा का संकल्प हिमालय जितना दृढ़ था।
20 सितंबर 1942: गोहपुर थाने का वो ऐतिहासिक संग्राम
असम की ‘लक्ष्मीबाई’ कनकलता बरुआ: देशभक्तों ने तय किया कि गोहपुर थाने की इमारत से औपनिवेशिक सत्ता का प्रतीक हटाकर तिरंगा फहराया जाएगा।
20 सितंबर 1942 को हाथों में तिरंगा लिए जब जनसैलाब निकला, तो उसका नेतृत्व 17 वर्षीय कनकलता कर रही थीं।
पुलिस की बंदूकों और गोली चलाने की सख्त चेतावनियों के बावजूद कनकलता के कदम नहीं थमे।
सीने में अंग्रेजी हुकूमत की गोली खाने के बाद भी उन्होंने तिरंगे को झुकने नहीं दिया।
उनके बलिदान के तुरंत बाद साथी मुकुंद काकती ने ध्वज को थामा और संघर्ष की मशाल जलती रही।
आज की पीढ़ी के लिए एक शाश्वत प्रेरणा
असम की ‘लक्ष्मीबाई’ कनकलता बरुआ: कनकलता बरुआ का बलिदान सिखाता है कि साहस उम्र का मोहताज नहीं होता। उनका जीवन कर्तव्यबोध, निडरता और नारी शक्ति के उस असीम सामर्थ्य का प्रतीक है, जो इतिहास की दिशा बदल सकता है।
आज के स्वतंत्र भारत में समाज, संविधान और राष्ट्र की गरिमा बनाए रखना ही इस वीर बेटी को सच्ची श्रद्धांजलि है।

