Monday, September 14, 2026

मसान की होली पर विवाद, क्यों डोम राजा परिवार ने की रोकने की मांग

मसान की होली पर विवाद: उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थित मणिकर्णिका घाट एक बार फिर सुर्खियों में है। यहाँ दशकों से चली आ रही ‘मसान की होली’ इस साल विवादों के घेरे में आ गई है।

डोम राजा परिवार के वंशज विश्वनाथ चौधरी ने जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर इस आयोजन पर रोक लगाने की मांग की है।

उनका कहना है कि यह परंपरा न तो शास्त्र सम्मत है और न ही महाश्मशान की गरिमा के अनुरूप। इस मुद्दे ने धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बहस को जन्म दे दिया है।

परंपरा की पृष्ठभूमि और धार्मिक मान्यता

मणिकर्णिका घाट को काशी का महाश्मशान माना जाता है, जहाँ दिन-रात अंतिम संस्कार होते हैं।

मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के बाद यहाँ चिता की राख से होली खेलने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है।

लोककथाओं के अनुसार, भगवान शिव विवाह के बाद माता गौरी को काशी लेकर आए थे।

उस अवसर पर शिवगणों की इच्छा पूरी करने के लिए उन्होंने श्मशान में ही उत्सव मनाने की अनुमति दी। समय के साथ यह आयोजन ‘मसान की होली’ के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

इस परंपरा में साधु-संत, अघोरी और स्थानीय लोग चिता की राख से एक-दूसरे को रंग लगाते हैं।

यह उत्सव जीवन और मृत्यु के दार्शनिक संबंध को दर्शाता है, जहाँ मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि मोक्ष का मार्ग माना जाता है।

डोम राजा परिवार और विद्वानों की आपत्ति

डोम राजा परिवार, जो सदियों से मणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार की परंपरा से जुड़ा है, ने इस आयोजन पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

विश्वनाथ चौधरी का कहना है कि किसी भी प्रमुख पुराण या शास्त्र में ‘मसान की होली’ का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता।

उनका तर्क है कि यह परंपरा अपेक्षाकृत नई है और इसे धार्मिक मान्यता का आधार नहीं दिया जा सकता।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आयोजन के दौरान कई बार हुड़दंग, नशाखोरी और अनुशासनहीनता देखने को मिलती है, जिससे श्मशान की पवित्रता भंग होती है।

डोम राजा परिवार ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने समय रहते कदम नहीं उठाया तो वे दाह संस्कार की प्रक्रिया तक रोकने पर विचार कर सकते हैं।

इस बयान ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है।

श्री काशी विद्वत परिषद का पक्ष

श्री काशी विद्वत परिषद से जुड़े कुछ विद्वानों ने भी इस आयोजन पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि धार्मिक परंपराओं को शास्त्रों के अनुरूप ही होना चाहिए।

यदि किसी परंपरा का प्रमाण प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता, तो उसे धार्मिक मान्यता देना उचित नहीं है।

परिषद के कुछ सदस्यों का मानना है कि श्मशान स्थल पर उत्सव का स्वरूप मर्यादित और संयमित होना चाहिए।

आयोजकों का तर्क और प्रशासन की भूमिका

दूसरी ओर, आयोजन से जुड़े लोग इसे काशी की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बताते हैं। उनका कहना है कि काशी स्वयं महाश्मशान है, जहाँ मृत्यु को भी उत्सव और मुक्ति के रूप में देखा जाता है।

उनके अनुसार, ‘मसान की होली’ जीवन की क्षणभंगुरता और मोक्ष की भावना को दर्शाती है, जो काशी की आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा है।

फिलहाल जिला प्रशासन दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में है। अधिकारियों का प्रयास है कि धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए शांति और व्यवस्था बनी रहे।

यदि आवश्यक हुआ तो आयोजन के स्वरूप में कुछ नियम और सीमाएँ तय की जा सकती हैं, ताकि परंपरा और मर्यादा के बीच सामंजस्य कायम रखा जा सके।

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Madhuri
Madhurihttps://reportbharathindi.com/
पत्रकारिता में 6 वर्षों का अनुभव है। पिछले 3 वर्षों से Report Bharat से जुड़ी हुई हैं। इससे पहले Raftaar Media में कंटेंट राइटर और वॉइस ओवर आर्टिस्ट के रूप में कार्य किया। Daily Hunt के साथ रिपोर्टर रहीं और ETV Bharat में एक वर्ष तक कंटेंट एडिटर के तौर पर काम किया। लाइफस्टाइल, इंटरनेशनल और एंटरटेनमेंट न्यूज पर मजबूत पकड़ है।
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