भारत का बड़ा फैसला: भारत ने एक बार फिर दुनिया को दिखा दिया है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय नियमों के पालन को लेकर कितना गंभीर है।
हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत ने रूस के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है, जिसमें वह अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आने वाली लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) बेचना चाहता था।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब मध्य-पूर्व (West Asia) में तनाव के कारण भारत को गैस की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
मुख्य बात: नियमों का पालन या सस्ती गैस?
भारत का बड़ा फैसला: रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में सस्ता कच्चा तेल खरीदा है, लेकिन LNG के मामले में स्थिति अलग है।
भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह रूस के ‘आर्कटिक एलएनजी 2’ (Arctic LNG 2) और ‘पोर्टोवाया’ (Portovaya) जैसे उन संयंत्रों से गैस नहीं खरीदेगा जिन पर अमेरिका ने कड़े प्रतिबंध लगाए हैं।
30 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली में रूसी उप ऊर्जा मंत्री पावेल सोरोकिन और भारत के पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के बीच हुई मुलाकात में भारत ने अपना रुख साफ कर दिया।
भारत का तर्क सीधा है: LNG की निगरानी करना कच्चे तेल की तुलना में कहीं अधिक आसान है, और भारत अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का उल्लंघन कर खुद को जोखिम में नहीं डालना चाहता।
‘कुनपेंग’ टैंकर की कहानी: बीच समंदर में फंसा रूसी जहाज
भारत के इस इनकार का असर तुरंत देखने को मिला।
रूस के ‘पोर्टोवाया’ संयंत्र से निकला ‘कुनपेंग’ (Kunpeng) नामक एक बड़ा LNG टैंकर, जो गुजरात के दहेज टर्मिनल की ओर बढ़ रहा था, अब सिंगापुर के पास समुद्र में खड़ा है।
क्षमता: 138,200 क्यूबिक मीटर।
स्थिति: भारत द्वारा अनुमति न मिलने के कारण इस जहाज को अपना रास्ता बदलना पड़ा। फिलहाल यह जहाज किसी निश्चित मंजिल के बिना समुद्र में ‘होल्ड’ पर है।
यह घटना दर्शाती है कि भारत अब किसी भी ऐसे सौदे में नहीं फंसना चाहता जिससे अमेरिका या यूरोपीय देशों के साथ उसके व्यापारिक रिश्तों पर आंच आए।
तेल और गैस में फर्क क्यों?
आपके मन में सवाल उठ सकता है कि भारत रूसी तेल तो धड़ल्ले से खरीद रहा है, फिर गैस से परहेज क्यों? इसके पीछे तकनीकी कारण हैं:
कच्चा तेल (Crude Oil): तेल को एक जहाज से दूसरे जहाज में बदला जा सकता है या दूसरे देशों के तेल के साथ मिलाया जा सकता है, जिससे उसकी पहचान छिपाना आसान होता है।
LNG: गैस को विशेष टैंकरों और टर्मिनलों की जरूरत होती है। सैटेलाइट के जरिए इन जहाजों की एक-एक मूवमेंट को ट्रैक किया जा सकता है। इसलिए LNG की ‘डार्क ट्रेडिंग‘ (पहचान छुपाकर व्यापार) करना लगभग नामुमकिन है।
भारत बनाम चीन: दो अलग रास्ते
भारत का बड़ा फैसला: जहाँ भारत प्रतिबंधों को लेकर सतर्क है, वहीं चीन ने इन प्रतिबंधों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है।
चीन रूस से हर तरह की गैस (प्रतिबंधित और गैर-प्रतिबंधित) खरीद रहा है।
इस तरह चीन रूस के लिए एक ‘संकटमोचक’ की भूमिका निभा रहा है, जबकि भारत एक संतुलित और जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी की तरह व्यवहार कर रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की ‘ऊर्जा अनुशासन’ की अपील
इस गैस संकट और वैश्विक अनिश्चितता को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक खास अपील की है। उन्होंने “एनर्जी डिसिप्लिन” (ऊर्जा अनुशासन) की बात कही है, जैसे:
वर्क फ्रॉम होम: जहाँ संभव हो, घर से काम करने को प्राथमिकता दें ताकि ईंधन की खपत कम हो।
विदेशी यात्राओं में कमी: अनावश्यक विदेशी दौरों और भव्य ‘डेस्टिनेशन वेडिंग’ से बचने की सलाह दी गई है ताकि विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange) बचाया जा सके।
सोना और तेल: पीएम ने लोगों से सोने और खाने के तेल के आयात पर निर्भरता कम करने का भी आग्रह किया है।
आगे क्या होगा?
भारत और रूस के बीच ऊर्जा संबंध खत्म नहीं हुए हैं।
भारत अभी भी रूस से वह LNG खरीदने को तैयार है जो प्रतिबंधों के दायरे में नहीं आती।
हालांकि, रूस की अधिकांश ‘साफ’ (Non-sanctioned) गैस पहले से ही यूरोपीय देशों के साथ लंबी अवधि के समझौतों में फंसी हुई है।
रूसी प्रतिनिधिमंडल जून 2026 में फिर से भारत आ सकता है।
भारत अब रूस के साथ खाद और अन्य क्षेत्रों में लंबी अवधि के समझौते करने की कोशिश कर रहा है, जो प्रतिबंधों से बाहर हों।
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