जेन Z पीढ़ी की चिंताजनक तस्वीर
दिल्ली में सामने आए हालिया घटनाक्रम ने देश की आधुनिक पीढ़ी के व्यवहार, भाषा और सामाजिक समझ पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। इन युवाओं के आचरण ने शिक्षा व्यवस्था के साथ उन अभिभावकों की भूमिका पर भी बहस छेड़ दी है, जिन्होंने इन्हें समाज के लिए तैयार किया।
सार्वजनिक स्थानों पर दिखाई दी उद्दंडता, अभद्र भाषा, अनुशासनहीनता और आक्रामक व्यवहार ने व्यापक निराशा पैदा की है। यदि ऐसे युवा ही देश का भावी नेतृत्व और सामाजिक आधार बनने वाले हैं, तो भारत के भविष्य को लेकर चिंता स्वाभाविक रूप से अधिक गहरी होती दिखाई देती है।
जेन Z की पहचान या व्यवहार की विकृति
आधुनिक पीढ़ी को जेन Z जैसा विशेष नाम देकर अलग वर्ग में रखने की प्रवृत्ति ने उसके भीतर एक कृत्रिम पहचान भी विकसित की है। अनेक युवाओं को लगने लगा है कि इस वर्ग का हिस्सा बनने के लिए परंपरागत मर्यादाओं और सामान्य सामाजिक शिष्टाचार को तोड़ना आवश्यक है।

अश्लील भाषा बोलना, लोगों से बदतमीजी करना, विरोध के नाम पर उपद्रव करना और बिना किसी उत्तरदायित्व के किसी को कुछ भी कह देना आधुनिकता का प्रतीक बनाया जा रहा है। लड़कियों में भी लड़कों से अधिक आक्रामक और अभद्र दिखने की प्रतिस्पर्धा चिंताजनक रूप ले रही है।
शराब, सिगरेट और निजी अंगों से जुड़ी अश्लील चर्चाओं को स्वतंत्रता तथा आधुनिक सोच के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस मानसिकता ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक मर्यादा के बीच मौजूद अंतर को धुंधला कर दिया है, जिसका प्रभाव सार्वजनिक व्यवहार में स्पष्ट दिखाई देता है।
मनोरंजन माध्यमों ने गढ़ी आधुनिक युवा की छवि
पिछले कई दशकों से एमटीवी सहित विभिन्न मनोरंजन चैनलों ने रोडीज और स्प्लिट्सविला जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से आधुनिक युवा की एक विशेष छवि तैयार की। आक्रामकता, अपशब्द, संबंधों में अस्थिरता और विद्रोही व्यवहार को लोकप्रियता तथा आत्मविश्वास के रूप में लगातार प्रस्तुत किया गया।
मनोरंजन के नाम पर वर्षों तक दिखाई गई यही जीवनशैली अब वास्तविक सामाजिक व्यवहार में उतरती नजर आ रही है। स्क्रीन पर आकर्षक बनाकर पेश की गई उद्दंडता ने युवाओं के एक वर्ग को यह विश्वास दिलाया कि असभ्यता ही प्रभावशाली व्यक्तित्व और आधुनिक जीवन की पहचान है।
राजनीति और संगठनों को मिल रहा अवसर
राजनीतिक दल युवाओं को भावी मतदाता मानकर उनकी अनुचित मांगों, उग्र प्रदर्शनों और उपद्रवी गतिविधियों को सहन करने के लिए तैयार दिखाई देते हैं। इस राजनीतिक संरक्षण से अनुशासनहीन समूहों को प्रोत्साहन मिलता है और कानून तथा सामाजिक जिम्मेदारी का महत्व लगातार कमजोर पड़ता है।
इसी भीड़ की आड़ में वामपंथी समूह, देशविरोधी तत्व और विदेशी धन पर सक्रिय गैर सरकारी संगठनों के नेटवर्क अपने एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं। युवाओं के असंतोष और अपरिपक्वता का उपयोग करके सामाजिक अव्यवस्था को वैचारिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करना आसान हो जाता है।
अभिभावकों को संभालनी होगी जिम्मेदारी
इस स्थिति में सबसे पहली और निर्णायक जिम्मेदारी अभिभावकों की बनती है। बच्चों को केवल शिक्षा, सुविधा और स्वतंत्रता देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें भाषा, अनुशासन, उत्तरदायित्व, सामाजिक मर्यादा और असहमति व्यक्त करने के लोकतांत्रिक तरीके भी घर से ही सिखाने आवश्यक हैं।
सुधार के लिए अभी समय पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। परिवार अपने बच्चों के व्यवहार, मित्र मंडली, डिजिटल सामग्री और सामाजिक गतिविधियों पर जिम्मेदार निगरानी रखकर दिशा बदल सकते हैं। समय रहते हस्तक्षेप नहीं हुआ तो सामाजिक नुकसान से पहले स्वयं परिवारों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
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