Fight Against Cancer: भारत में कैंसर के खिलाफ लड़ाई सिर्फ अस्पतालों और महंगे इलाज तक सीमित नहीं रह सकती।
असली चुनौती यह है कि बीमारी की पहचान उस समय हो, जब उसे हराना अभी संभव हो।
देश के कैंसर अस्पतालों में बड़ी संख्या में मरीज तब पहुंचते हैं, जब बीमारी एडवांस स्टेज में जा चुकी होती है।
ऐसे मामलों में इलाज न सिर्फ जटिल और महंगा हो जाता है, बल्कि मरीज के ठीक होने की संभावना भी काफी कम हो जाती है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कैंसर के इलाज के क्षेत्र में तेजी से प्रगति की है। आधुनिक सर्जरी, रेडिएशन थेरेपी और नए उपचार विकल्पों ने मरीजों के लिए उम्मीद बढ़ाई है।
लेकिन अगर बीमारी का पता ही बहुत देर से चले, तो अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं भी सीमित असर डाल पाती हैं।
यही वजह है कि कैंसर के खिलाफ भारत की अगली बड़ी लड़ाई अस्पतालों में नहीं, बल्कि अर्ली डिटेक्शन और प्रिवेंशन के मोर्चे पर होगी।
भारत में कैंसर का खतरा कितना बड़ा है?
Fight Against Cancer: कैंसर अब भारत के सामने मौजूद सबसे गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है।
अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में देश में करीब 15.33 लाख नए कैंसर केस सामने आए, जबकि लगभग 8.74 लाख लोगों की मौत कैंसर की वजह से हुई।
स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि पिछले दशक में बीमारी का बोझ लगातार बढ़ा है।
2015 से 2024 के बीच कैंसर के मामलों में करीब 10.4 फीसदी की वृद्धि हुई, जबकि कैंसर से होने वाली मौतों में लगभग 28.6 फीसदी का इजाफा दर्ज किया गया।
यानी चुनौती सिर्फ मरीजों की बढ़ती संख्या नहीं है। बीमारी का पता चलने और मरीज के इलाज तक पहुंचने के बीच की देरी भी एक बड़ा सवाल है।
अनुमान के मुताबिक, भारत में करीब हर नौ में से एक व्यक्ति को जीवनकाल में कैंसर होने का जोखिम है।
पूर्वोत्तर भारत के कुछ राज्यों में यह जोखिम 20 फीसदी से भी अधिक बताया गया है। देश की बढ़ती उम्र वाली आबादी और तेजी से बदलती जीवनशैली को देखते हुए आने वाले वर्षों में यह चुनौती और गंभीर हो सकती है।
कैंसर में देर से पहचान क्यों बन जाती है सबसे बड़ी बाधा?
डॉ.के मुताबिक, भारत में कैंसर के कई मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं, जब बीमारी के लक्षण काफी गंभीर हो चुके होते हैं।
शुरुआती दौर में कैंसर के कई लक्षण सामान्य बीमारियों जैसे लग सकते हैं।
ऐसे में लोग उन्हें नजरअंदाज करते रहते हैं या डॉक्टर के पास जाने में देरी करते हैं।
जब समस्या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगती है, तब जांच होती है और कई मामलों में तब तक कैंसर एडवांस स्टेज में पहुंच चुका होता है।
इस देरी का असर सिर्फ मरीज की जिंदगी पर नहीं पड़ता।
कैंसर का इलाज परिवार की आर्थिक स्थिति को भी बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कैंसर से जूझ रहे 75 फीसदी से ज्यादा परिवार इलाज के खर्च के कारण गंभीर आर्थिक दबाव में आ जाते हैं।
इस समस्या को समझने के लिए फेफड़ों के कैंसर का उदाहरण काफी महत्वपूर्ण है।
भारत में लंग कैंसर के मरीजों की पांच साल की सर्वाइवल रेट करीब 4 फीसदी बताई जाती है, जबकि जापान में यह लगभग 33 फीसदी है।
इस अंतर के पीछे सिर्फ इलाज की तकनीक को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता।
मरीज बीमारी की किस स्टेज पर अस्पताल पहुंचता है, यह भी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
समाधान की शुरुआत अस्पताल से नहीं, स्कूल से होनी चाहिए
Fight Against Cancer: कैंसर के खिलाफ प्रभावी रणनीति बनाने के लिए सबसे पहले बीमारी होने के बाद इलाज करने के बजाय उसे रोकने और समय रहते पकड़ने पर जोर देना होगा।
डॉ. के मुताबिक, कैंसर के करीब आधे मामलों को रोकने की संभावना मौजूद है। लेकिन इसके लिए जागरूकता की शुरुआत उस उम्र से करनी होगी, जब जीवनशैली की आदतें बन रही होती हैं।
यही वजह है कि स्कूलों में हेल्थ एजुकेशन को महज एक अतिरिक्त विषय मानने के बजाय बच्चों के लाइफ स्किल्स का हिस्सा बनाया जाना जरूरी है।
खानपान, शारीरिक गतिविधि, मानसिक स्वास्थ्य, नशे से दूरी, वैक्सीनेशन और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषय बच्चों को कम उम्र से समझाए जाएं तो इसका फायदा सिर्फ कैंसर तक सीमित नहीं रहेगा।
ऐसी शिक्षा भविष्य में हृदय रोग, डायबिटीज, न्यूरोलॉजिकल बीमारियों और ब्लड वेसल से जुड़ी समस्याओं के खतरे को भी कम करने में मदद कर सकती है।
तीन हफ्ते से ज्यादा कोई लक्षण रहे तो नजरअंदाज न करें
कैंसर की शुरुआती पहचान को आसान बनाने के लिए आम लोगों को एक साधारण नियम याद रखने की जरूरत है—अगर कोई असामान्य लक्षण तीन हफ्ते से ज्यादा बना रहता है, तो डॉक्टर से सलाह लें।
इसका मतलब यह नहीं है कि तीन सप्ताह तक रहने वाला हर लक्षण कैंसर का संकेत है। लेकिन लंबे समय तक बने रहने वाले असामान्य बदलावों को नजरअंदाज करने के बजाय उनकी चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है।
यही वह जगह है जहां स्क्रीनिंग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। स्क्रीनिंग का उद्देश्य बीमारी के लक्षण आने से पहले ही संभावित कैंसर का पता लगाना है।
अब तक स्क्रीनिंग की व्यवस्था मुख्य रूप से सर्वाइकल, ब्रेस्ट और कुछ अन्य कैंसर के लिए ज्यादा केंद्रित रही है। लेकिन मेडिकल रिसर्च में अब ऐसे तरीकों पर भी काम हो रहा है, जो एक साथ कई तरह के कैंसर के संकेत तलाश सकें।
क्या एक ब्लड टेस्ट से कई कैंसर का पता चल सकता है?
मल्टी-कैंसर अर्ली डिटेक्शन यानी MCED टेस्ट कैंसर की शुरुआती पहचान के क्षेत्र में तेजी से उभरती तकनीक है।
इस तरह के टेस्ट का उद्देश्य खून के एक सैंपल में शरीर में मौजूद अलग-अलग कैंसर से जुड़े बायोलॉजिकल संकेतों को पहचानना है। जिन कैंसर के संकेतों की पहचान की जा सकती है, उनमें कोलोरेक्टल, लंग, लिवर, पैंक्रियाटिक, ओवेरियन, गैस्ट्रिक, एसोफेजियल, ब्रेस्ट, प्रोस्टेट और ब्लैडर कैंसर शामिल हैं।
जुलाई 2026 में अपोलो कैंसर सेंटर्स ने भारत में शील्ड मल्टी-कैंसर डिटेक्शन टेस्ट लॉन्च किया। यह टेस्ट 45 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों के लिए डिजाइन किया गया है। जायडस लाइफसाइंसेज और अपोलो हॉस्पिटल्स के बीच हुए समझौते के जरिए इसे देशभर में उपलब्ध कराने की दिशा में कदम उठाया गया है।
हालांकि, ऐसी तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने से पहले इसकी प्रभावशीलता, सटीकता और वास्तविक मरीजों पर इसके परिणामों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन जरूरी होगा। फिर भी, मल्टी-कैंसर डिटेक्शन कैंसर की शुरुआती पहचान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रिसर्च दिशा बनकर सामने आया है।
भारत को अपनी जरूरत के हिसाब से बनाना होगा कैंसर स्क्रीनिंग मॉडल
भारत जैसे विशाल और विविध देश में सिर्फ एक तरह की स्क्रीनिंग व्यवस्था से हर व्यक्ति तक पहुंचना मुश्किल है। शहरों में उपलब्ध सुविधाएं और ग्रामीण या दूरदराज के इलाकों की स्वास्थ्य व्यवस्था एक जैसी नहीं है।
इसलिए भारत को एक लेयर्ड कैंसर केयर मॉडल की जरूरत होगी।
गांवों और छोटे कस्बों में कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स लोगों को शुरुआती लक्षणों और जोखिम कारकों के बारे में जागरूक कर सकते हैं। डिजिटल रिस्क असेसमेंट टूल्स लोगों को अपने जोखिम को समझने में मदद कर सकते हैं।
इसके साथ ही AI आधारित सिस्टम एक्स-रे, स्कैन और मेडिकल रिपोर्ट्स में संदिग्ध संकेतों की पहचान में डॉक्टरों की सहायता कर सकते हैं। मोबाइल डायग्नोस्टिक यूनिट्स के जरिए जांच सुविधाओं को उन इलाकों तक पहुंचाया जा सकता है जहां बड़े अस्पताल मौजूद नहीं हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर जिला अस्पताल और बड़े कैंसर सेंटर तक मरीजों के लिए एक मजबूत रेफरल सिस्टम तैयार किया जाए, ताकि संदिग्ध केस सही विशेषज्ञ तक समय पर पहुंच सके।
AI और NITI Aayog की इमेजिंग बायोबैंक से बढ़ेगी उम्मीद
इस दिशा में भारत में डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका भी बढ़ रही है।
NITI Aayog 20,000 से ज्यादा कैंसर मरीजों की रेडियोलॉजी और पैथोलॉजी इमेजिंग का डेटाबेस तैयार कर रहा है। इस इमेजिंग बायोबैंक का उद्देश्य ऐसे AI टूल्स के विकास और ट्रेनिंग में मदद करना है, जो मेडिकल इमेज में संभावित कैंसर या संदिग्ध नोड्यूल्स को पहचानने में स्वास्थ्यकर्मियों और डॉक्टरों की सहायता कर सकें।
अगर ऐसी तकनीक को मजबूत प्राथमिक स्वास्थ्य नेटवर्क के साथ जोड़ा जाता है, तो छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में भी संदिग्ध मरीजों की पहचान करके उन्हें समय रहते विशेषज्ञ केंद्रों तक भेजना आसान हो सकता है।
2047 तक रिसर्च पर बढ़ेगा जोर
कैंसर के खिलाफ लंबी लड़ाई में सिर्फ मौजूदा तकनीक काफी नहीं होगी। लगातार नई रिसर्च और उसके परिणामों को जमीन पर लागू करना भी जरूरी है।
ड्राफ्ट नेशनल हेल्थ रिसर्च पॉलिसी 2026 में 2047 तक स्वास्थ्य अनुसंधान पर खर्च को मौजूदा स्तर की तुलना में 6.25 गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।
इसमें कैंसर के साथ-साथ टीबी, डायबिटीज, हृदय रोग और मानसिक स्वास्थ्य जैसी बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। AI, डिजिटल हेल्थ, डेटा साइंस, सेल थेरेपी और जीन थेरेपी जैसे उभरते क्षेत्रों पर भी ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
इसका सबसे बड़ा बदलाव यह हो सकता है कि स्वास्थ्य अनुसंधान केवल रिसर्च पेपर प्रकाशित करने तक सीमित न रहे, बल्कि उसका इस्तेमाल वास्तविक स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने में हो।
कैंसर के खिलाफ जीत का मतलब सिर्फ बेहतर अस्पताल नहीं
भारत ने कैंसर के इलाज के क्षेत्र में काफी प्रगति की है। आधुनिक मशीनें, बेहतर सर्जरी, रेडिएशन तकनीक और नए उपचार विकल्प आज देश में उपलब्ध हैं। लेकिन कैंसर के खिलाफ सफलता का पैमाना सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि हमारे पास कितने अत्याधुनिक अस्पताल हैं।
असल सवाल यह होना चाहिए कि कितने मरीजों को कैंसर की आखिरी स्टेज तक पहुंचने से पहले बचाया जा सका।
इसके लिए सरकार, मेडिकल कॉलेज, अस्पताल, टेक्नोलॉजी कंपनियां, रिसर्च संस्थान और कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स—सभी को एक साथ काम करना होगा।
स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा, लंबे समय तक बने रहने वाले लक्षणों को नजरअंदाज न करने की आदत, प्रभावी स्क्रीनिंग, मल्टी-कैंसर डिटेक्शन जैसी नई तकनीकें, AI आधारित डायग्नोस्टिक्स और मजबूत हेल्थ रिसर्च सिस्टम—इन सबको एक साथ जोड़ना होगा।
कैंसर के खिलाफ भारत की अगली बड़ी जीत शायद किसी नई दवा या मशीन से नहीं, बल्कि बीमारी को सही समय पर पकड़ लेने की क्षमता से आएगी।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत कैंसर का इलाज कितनी अच्छी तरह कर सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत कितने मरीजों को उस आखिरी स्टेज तक पहुंचने से पहले बचा सकता है।

