Wednesday, January 21, 2026

डॉ. बी. आर. अंबेडकर के बुर्क़ा संबंधी विचार

डॉ. बी. आर. अंबेडकर के बुर्क़ा संबंधी विचार:

यह उनकी 1945 में लिखी किताब के अंश का सरल हिंदी अनुवाद है.

“सड़कों पर चलती हुई ये बुर्क़ा पहनी महिलाएँ भारत में देखे जा सकने वाले सबसे भयानक दृश्यों में से एक हैं।”

“इस तरह का अलगाव मुस्लिम महिलाओं के शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाले बिना नहीं रहता।”

“वे आम तौर पर खून की कमी, टीबी और दाँत-मसूड़ों की बीमारी से पीड़ित रहती हैं। उनके शरीर कमजोर और बिगड़े हुए होते हैं—पीठ झुकी हुई, हड्डियाँ उभरी हुई, हाथ-पैर टेढ़े। पसलियाँ, जोड़ और लगभग सारी हड्डियों में दर्द रहता है। दिल की धड़कन तेज़ होना भी आम है।”

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“इस तरह की शारीरिक विकृति का नतीजा अक्सर प्रसव के समय असमय मृत्यु होता है।”

“पर्दा-प्रथा मुस्लिम महिलाओं को मानसिक और नैतिक पोषण से वंचित कर देती है।”

“स्वस्थ सामाजिक जीवन से वंचित होने के कारण नैतिक गिरावट शुरू हो जाती है। बाहरी दुनिया से पूरी तरह अलग रहने के कारण वे छोटी-छोटी पारिवारिक बातों और झगड़ों में उलझी रहती हैं, जिससे उनकी सोच संकीर्ण और सीमित हो जाती है।”

“वे अन्य समुदायों की महिलाओं से पीछे रह जाती हैं, किसी बाहरी गतिविधि में हिस्सा नहीं ले पातीं और गुलाम-सी मानसिकता तथा हीन भावना से दब जाती हैं।”

“उन्हें ज्ञान की इच्छा नहीं रहती, क्योंकि उन्हें सिखाया जाता है कि घर की चार दीवारों के बाहर किसी चीज़ में रुचि न लें।”

“खासकर पर्दा करने वाली महिलाएँ असहाय, डरपोक और जीवन की किसी भी लड़ाई के लिए अयोग्य हो जाती हैं। भारत में मुस्लिम समाज में पर्दा करने वाली महिलाओं की बड़ी संख्या को देखते हुए, पर्दा की समस्या की गंभीरता आसानी से समझी जा सकती है।”

“पर्दा के शारीरिक और बौद्धिक प्रभाव उसकी नैतिक क्षति की तुलना में कुछ भी नहीं हैं। पर्दा की जड़ पुरुष और महिला-दोनों की यौन प्रवृत्तियों को लेकर गहरे शक में है, और इसका उद्देश्य स्त्री-पुरुष को अलग रखकर इन्हें नियंत्रित करना है। लेकिन उद्देश्य पूरा होने के बजाय, पर्दा ने मुस्लिम पुरुषों की नैतिकता को नुकसान पहुँचाया है।”

“पर्दा के कारण मुस्लिम पुरुष का अपने घर की महिलाओं के अलावा किसी अन्य महिला से कोई संपर्क नहीं होता, और घर में भी संपर्क बहुत सीमित रहता है। इससे पुरुषों की नैतिकता पर बुरा असर पड़ना स्वाभाविक है। किसी मनोविशेषज्ञ की जरूरत नहीं यह समझने के लिए कि ऐसा सामाजिक ढाँचा अस्वस्थ यौन प्रवृत्तियों को जन्म देता है।”

“हिंदू सही कहते हैं कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सामाजिक संपर्क स्थापित करना कठिन है, क्योंकि ऐसा संपर्क एक ओर महिलाओं और दूसरी ओर पुरुषों के बीच संपर्क में बदल जाता है।”

“यह नहीं है कि पर्दा और उससे जुड़ी बुराइयाँ देश के कुछ हिस्सों में कुछ हिंदू वर्गों में नहीं मिलतीं। फर्क यह है कि मुसलमानों में पर्दा को धार्मिक पवित्रता प्राप्त है, जो हिंदुओं में नहीं है।”

“मुसलमानों में पर्दा की जड़ें हिंदुओं की तुलना में कहीं गहरी हैं और इसे हटाना तभी संभव है जब धार्मिक आदेशों और सामाजिक ज़रूरतों के बीच टकराव का सामना किया जाए।”

“पर्दा की समस्या मुसलमानों के लिए एक वास्तविक समस्या है—जबकि हिंदुओं के लिए नहीं। मुसलमानों द्वारा इसे समाप्त करने के किसी गंभीर प्रयास के प्रमाण नहीं मिलते।”

(Pakistan or Partition of India, 1945, पृष्ठ 230–231)

– दिलीप सी मंडल का मूल आलेख

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Mudit
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लेखक 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के अध्येता हैं। वे पिछले एक दशक से सार्वजनिक विमर्श पर विश्लेषणात्मक लेखन कर रहे हैं। सांस्कृतिक सन्दर्भ में समाज, राजनीति, विचारधारा, शिक्षा, धर्म और इतिहास के प्रमुख प्रश्नों के रिसर्च बेस्ड प्रस्तुतिकरण और समाधान में वे पारंगत हैं। वे 'द पैम्फलेट' में दो वर्ष कार्य कर चुके हैं। वे विषयों को केवल घटना के स्तर पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक आधार, वैचारिक पृष्ठभूमि और दीर्घकालीन प्रभाव के स्तर पर परखते हैं। इसी कारण उनके राष्ट्रवादी लेख पाठक को नई दृष्टि और वैचारिक स्पष्टता भी देते हैं। इतिहास, धर्म और संस्कृति पर उनकी पकड़ व्यापक है। उनके प्रामाणिक लेख अनेक मौकों पर राष्ट्रीय विमर्श की दिशा में परिवर्तनकारी सिद्ध हुए हैं। उनका शोधपरक लेखन सार्वजनिक संवाद को अधिक तथ्यपरक और अर्थपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
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