ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की ज़िद: व्हाइट हाउस के एक विवादित सोशल मीडिया पोस्ट ने आर्कटिक क्षेत्र की राजनीति में हलचल मचा दी है।
इस पोस्ट में ग्रीनलैंड को दो रास्तों के बीच खड़ा दिखाया गया है एक अमेरिका की ओर और दूसरा रूस व चीन के प्रभाव की ओर।
यह ग्राफिक ऐसे समय साझा किया गया, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार ग्रीनलैंड को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बताते हुए उसे हासिल करने की बात दोहरा रहे हैं।
पोस्ट के जरिए ग्रीनलैंड के सामने अमेरिका या रूस-चीन में से किसी एक को चुनने का संदेश दिया गया, जिस पर डेनमार्क और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
ट्रंप का दावा: सुरक्षा का सवाल
व्हाइट हाउस की इस पोस्ट के साथ राष्ट्रपति ट्रंप का एक पुराना बयान भी दोबारा साझा किया गया। इसमें ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड की जरूरत है।
उन्होंने लिखा कि यह उनके बनाए जा रहे “गोल्डन डोम” मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए बेहद जरूरी है।
ट्रंप का दावा है कि अगर ग्रीनलैंड अमेरिका के नियंत्रण में आ जाता है, तो नाटो और ज्यादा मजबूत हो जाएगा।
उन्होंने रूस और चीन का जिक्र करते हुए कहा कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड को अपने साथ नहीं जोड़ा, तो ये दोनों देश वहां अपना प्रभाव बढ़ा सकते हैं। ट्रंप ने साफ कहा कि अमेरिका ऐसा होने नहीं देगा।
वॉशिंगटन में अहम कूटनीतिक बैठक
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की ज़िद: ग्रीनलैंड को लेकर यह विवाद उस वक्त और बढ़ गया, जब 14 जनवरी 2026 को डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोके रासमुसेन,
ग्रीनलैंड की विदेश मंत्री विवियन मोट्ज़फेल्ड्ट ने व्हाइट हाउस में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मुलाकात की। यह बैठक करीब एक घंटे तक चली।
बैठक के बाद डेनमार्क के विदेश मंत्री ने कहा कि ग्रीनलैंड के मुद्दे पर अमेरिका और डेनमार्क के बीच अब भी बुनियादी मतभेद बने हुए हैं।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड को अपने नियंत्रण में लेने का विचार पूरी तरह गलत है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
हालांकि बातचीत खुलकर हुई, लेकिन किसी ठोस नतीजे पर सहमति नहीं बन पाई।
सुरक्षा पर सहयोग, कब्जे पर इनकार
मतभेदों के बावजूद दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर मिलकर बातचीत जारी रखी जाएगी।
इसके लिए एक उच्चस्तरीय समूह बनाने पर सहमति बनी है, जो आने वाले समय में सुरक्षा और सहयोग से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करेगा।
डेनमार्क ने स्पष्ट किया कि वह अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाने को तैयार है, लेकिन ग्रीनलैंड को अपने कब्जे में लेने की किसी भी कोशिश को वह सिरे से खारिज करता है।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों का कहना है कि ग्रीनलैंड के लोगों को अपने भविष्य का फैसला खुद करने का पूरा अधिकार है।
डेनमार्क की सैन्य तैयारी और यूरोप का समर्थन
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की ज़िद: अमेरिका के लगातार बयानों के बाद डेनमार्क ने ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने का फैसला किया है।
डेनमार्क के रक्षा मंत्री ने कहा कि इसका मकसद यह दिखाना है कि नाटो देश मिलकर आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा कर सकते हैं और इसके लिए किसी एक देश के कब्जे की जरूरत नहीं है।
इसी कड़ी में ग्रीनलैंड के उप प्रधानमंत्री म्यूटे एगेडे ने कहा कि नाटो के और सैनिक अब ग्रीनलैंड पहुंच रहे हैं।
उन्होंने बताया कि आने वाले दिनों में सैन्य उड़ानों और जहाजों की आवाजाही भी बढ़ेगी और यह तैनाती प्रशिक्षण अभ्यास के तौर पर की जा रही है।
यूरोप के कई देशों ने इस अभियान में खुलकर समर्थन दिया है। फ्रांस, जर्मनी और नॉर्डिक देशों ने पहले ही घोषणा की थी कि वे डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड में यूरोपीय सैन्य मिशन का हिस्सा बनेंगे।
स्वीडन और नॉर्वे ने अपने सैन्य अधिकारी भेजे हैं, जबकि ब्रिटेन और कनाडा ने भी सहयोग की पुष्टि की है।
इस बढ़ती सैन्य मौजूदगी को अमेरिका की अधिग्रहण संबंधी बयानबाजी के जवाब और आर्कटिक क्षेत्र में नाटो की एकजुटता के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
क्या है ट्रंप का ‘गोल्डन डोम’ प्लान
अमेरिका, इजराइल के आयरन डोम की तर्ज पर अपना नया मिसाइल डिफेंस सिस्टम “गोल्डन डोम” तैयार कर रहा है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के सिर्फ एक हफ्ते बाद इस बड़े प्रोजेक्ट का ऐलान किया था।
इसकी कुल लागत करीब 175 अरब डॉलर, यानी लगभग 14–15 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस सिस्टम के लिए 1200 से ज्यादा सैटेलाइट्स अंतरिक्ष में भेजी जाएंगी।
इनमें से 400 से 1000 सैटेलाइट्स दुश्मन मिसाइलों की पहचान और उनकी गतिविधियों पर नजर रखेंगी, जबकि करीब 200 इंटरसेप्टर सैटेलाइट्स उन मिसाइलों को अंतरिक्ष में ही मार गिराने के लिए तैनात होंगी।
ट्रंप का दावा है कि यह सिस्टम दुनिया के किसी भी हिस्से से दागी गई मिसाइलों को रोकने में सक्षम होगा और अंतरिक्ष से होने वाले हमलों से भी अमेरिका की रक्षा करेगा।
यह प्रोजेक्ट जनवरी में शुरू किया गया है और इसे 2029 तक पूरी तरह कार्यशील बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
इसकी जिम्मेदारी अमेरिकी स्पेस फोर्स के वरिष्ठ जनरल माइकल ग्यूटलेन को सौंपी गई है।
आगे क्या होगा
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की ज़िद: फिलहाल ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका, डेनमार्क और नाटो सहयोगी देशों के बीच तनाव बना हुआ है।
आने वाले हफ्तों में होने वाली बातचीत और सुरक्षा समूह की बैठकों से यह साफ होगा कि यह विवाद आपसी संवाद से सुलझता है या आर्कटिक क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव और गहराता है।

