बीजेपी का चिदंबरम पर वार: ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण के बाद कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम की टिप्पणी पर बीजेपी ने तीखा पलटवार किया है।
पार्टी के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि प्रधानमंत्री ने वैचारिक स्तर पर नक्सली सोच को लेकर देश को आगाह किया था, लेकिन उनके बयान के कुछ ही समय बाद यह सामने आ गया कि इस मुद्दे पर किसकी क्या सोच है।
सुधांशु त्रिवेदी ने पी. चिदंबरम के उस बयान का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व जताया था।
बीजेपी नेता ने इसी टिप्पणी को लेकर कांग्रेस से सवाल किया कि आखिर नक्सलवाद और उससे जुड़ी विचारधारा को लेकर पार्टी की आधिकारिक सोच क्या है।
मनमोहन सिंह का हुआ जिक्र
बीजेपी प्रवक्ता ने इस दौरान पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पुराने बयान का भी उल्लेख किया। उन्होंने याद दिलाया कि मनमोहन सिंह नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बता चुके हैं।
त्रिवेदी ने कांग्रेस से सवाल किया कि नक्सलवाद को लेकर पार्टी मनमोहन सिंह के पुराने रुख को सही मानती है या फिर पी. चिदंबरम की मौजूदा टिप्पणी को। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
बीजेपी ने नक्सलवाद को लेकर किया दावा
सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली पिछली सरकारों के दौरान नक्सलवाद के प्रभाव का भी जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि उस दौर में देश के कई हिस्से नक्सली गतिविधियों से प्रभावित थे और इसे लेकर ‘रेड कॉरिडोर’ की चर्चा होती थी।
बीजेपी नेता ने दावा किया कि उस समय करीब 180 जिले नक्सली हिंसा से प्रभावित थे और हजारों लोगों की जान गई थी।
उन्होंने मौजूदा सरकार के प्रयासों को गिनाते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्थिति में बड़ा बदलाव आया है।
नक्सल प्रभावित जिलों में कमी का दावा
त्रिवेदी ने केंद्र सरकार की नक्सलवाद विरोधी रणनीति का जिक्र करते हुए दावा किया कि 31 मई 2026 तक नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या शून्य हो चुकी है।
उन्होंने कहा कि सरकार की सुरक्षा और विकास से जुड़ी योजनाओं के कारण कभी हिंसा से प्रभावित रहे इलाकों में अब सामान्य गतिविधियां बढ़ रही हैं।
उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के कार्यकाल का उदाहरण देते हुए बस्तर का भी उल्लेख किया। बीजेपी नेता के मुताबिक, जिस इलाके की पहचान लंबे समय तक नक्सली हिंसा से जुड़ी रही, वहां अब खेल और सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
बस्तर ओलंपिक का उदाहरण
सुधांशु त्रिवेदी ने बस्तर ओलंपिक को सरकार की नीतियों के असर का उदाहरण बताया।
उन्होंने कहा कि बस्तर जैसे क्षेत्र में खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन इस बात का संकेत है कि वहां हालात में बदलाव आया है और स्थानीय युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।
पीएम मोदी ने क्या कहा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2026 को लाल किले से दिए अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में नक्सलवाद का मुद्दा उठाया था।
उन्होंने कहा था कि हथियारबंद नक्सलवाद का प्रभाव देश में काफी कम हुआ है, लेकिन वैचारिक स्तर पर नक्सली सोच को बढ़ावा देने वाली प्रवृत्तियों को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है।
प्रधानमंत्री के इसी बयान के बाद ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर राजनीतिक बहस शुरू हो गई।
पी. चिदंबरम ने क्या प्रतिक्रिया दी?
प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर टिप्पणी की। उन्होंने लिखा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व है।
चिदंबरम की इस टिप्पणी के बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए सवाल खड़े किए हैं।
अब सियासी बहस इस बात पर केंद्रित हो गई है कि कांग्रेस नक्सलवाद और उससे जुड़ी वैचारिक सोच को लेकर किस रुख के साथ खड़ी है।

